यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 14, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
विभाजन का दर्द... पाकिस्तान से आकर कानपुर में बसे थे सिंधी शरणार्थी; आज भी नहीं भुला पाते बंटवारे का वह दौर
भारत-पाकिस्तान के विभाजन को 77 वर्ष पूरे हो चुके हैं। लेकिन पाकिस्तान से भारत आए लोगों की Independence Day 2024 आंखों में आज भी विभाजन की विभीषिता का ...और पढ़ें

HighLights
- स्वतंत्रता दिवस पर विभाजन की विभीषिका की यादें हो जातीं ताजा
- सिंधी शरणार्थी दलेलपुरवा, रामबाग में आकर बसे, नई सड़क पर खोली दुकानें
- 1965 में रिफ्यूजी मार्केट में मिली दुकानें, मेहनत कर आत्मनिर्भर बने
मोहम्मद दाऊद खान,
1965 में आवंटित की गई थी दुकानें
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19 वर्ष की आयु में परिवार के साथ पाकिस्तान के जिला दादू से आए थे। अब 93 वर्ष के हैं। वहां से शहर आने तक बहुत परेशानियां उठानी पड़ीं। यहां आर्यनगर में किराने का व्यापार शुरू किया। बोरियां भी बेचीं। अब आर्यनगर में डिपार्टमेंटल स्टोर है।
पाकिस्तान के सिंध में रोहिणी जिले से विभाजन के बाद शहर आ गए। विभाजन की विभीषिका स्वयं देखी। जिंदगी की गाड़ी खींचने के लिए पी रोड पर खोमचा लगाया। रात-दिन की मेहनत से धीरे-धीरे हालात सुधरते गए। अब 94 वर्ष की आयु हो चुकी है। पी रोड पर ही रसगुल्ला व दोसा की दुकान है।
देश के विभाजन के दौरान पाकिस्तान से आए सिंधी समुदाय ने जिंदगी की गाड़ी चलाने के लिए कड़ी मशक्कत की। कई सिंधी उधार दूध, चाय पत्ती लाते तथा चाय बनाकर बेचते। उससे मिलने वाली धनराशि के मुनाफे से घर का खर्च चलाते।
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