बुंदेलखंड की मिट्टी और जलवायु में छिपी दलहन क्रांति की संभावना, चना- अरहर समेत इन फसलों का बनेगा मजबूत केंद्र
दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए प्रति हेक्टेयर उपज बढ़ाना, गुणवत्तापूर्ण बीज और नई तकनीक किसानों तक पहुंचाना जरूरी है, ...और पढ़ें

HighLights
प्रति हेक्टेयर उपज बढ़ाना दलहन आत्मनिर्भरता की कुंजी
बुंदेलखंड दलहन उत्पादन का मजबूत केंद्र बन सकता है
जलवायु परिवर्तन से निपटने को नई तकनीक, बीज आवश्यक
जागरण संवाददाता, कानपुर। देश को दलहन उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए केवल फसल का रकबा बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। सीमित भूमि में प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाने, किसानों तक गुणवत्तापूर्ण बीज और नई तकनीक पहुंचाने के साथ बदलते मौसम की चुनौतियों से निपटना होगा।
यह बात रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी के कुलपति डॉ. अशोक कुमार सिंह ने भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (आइआइपीआर) के 34वें स्थापना दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में कही। इस अवसर पर आइआइपीआर के निदेशक डा. जीपी सिंह, महानिदेशक उपकार संजय सिंह व अलायंस आफ बायोवर्सिटी एंड सिएट के कंट्री डायरेक्टर डा. जय चंद्र राणा मौजूद थे।
दलहन उत्पादन और किसानों की चुनौतियों पर बातचीत में डा. सिंह ने कहा कि देश में दलहनों की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिकों और किसानों को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने कहा कि दलहन का रकबा बढ़ाए बिना भी प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में वृद्धि कर उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए उन्नत और प्रमाणित बीज, बीज उपचार, जैव उर्वरकों के प्रयोग, संतुलित पोषण और कीट-रोग प्रबंधन जैसी वैज्ञानिक विधियों को खेत तक पहुंचाना जरूरी है।
बुंदेलखंड में दलहन उत्पादन की बड़ी संभावना
उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड की मिट्टी और जलवायु दलहन फसलों के लिए अनुकूल है। यहां चना, अरहर, मूंग, उड़द और मसूर के उत्पादन की व्यापक संभावनाएं हैं। कम पानी में खेती, सूखा सहनशील किस्मों और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देकर इस क्षेत्र को दलहन उत्पादन का मजबूत केंद्र बनाया जा सकता है।
दलहल खेती के लिए बदलता मौसम बड़ी चुनौती
डॉ. सिंह ने कहा कि बदलता मौसम दलहन खेती के सामने नई चुनौती बनकर उभर रहा है। अनियमित वर्षा, सूखे की स्थिति, बढ़ता तापमान और नई बीमारियां उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों को जलवायु सहनशील और रोग प्रतिरोधी किस्मों के विकास पर विशेष ध्यान देना होगा। साथ ही किसानों तक मौसम आधारित कृषि सलाह समय पर पहुंचानी होगी।
कम लागत वाली तकनीक से बढ़ेगी पैदावार
उन्होंने दलहन उत्पादन में बीज उपचार और जैव उर्वरकों के उपयोग को महत्वपूर्ण बताया। कहा कि राइजोबियम जैसे लाभकारी सूक्ष्मजीवों के प्रयोग से पौधों की पोषण क्षमता बेहतर होती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। उन्नत बीज, वैज्ञानिक फसल प्रबंधन और संतुलित पोषण को अपनाकर किसान लागत नियंत्रित करते हुए उत्पादन बढ़ा सकते हैं।
संस्थानों, विभागों और किसानों के बीच समन्वय जरूरी
उन्होंने कहा कि कृषि विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, कृषि विभाग और किसानों के बीच बेहतर समन्वय से दलहन उत्पादन में तेजी लाई जा सकती है। नई किस्मों और तकनीकों को प्रयोगशालाओं तक सीमित रखने के बजाय खेतों तक पहुंचाना होगा। तभी देश दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकेगा।
