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Janmashtami 2026: 1950 की अनोखी परंपरा, 75 साल पुरानी 100 से अधिक मूर्तियों से सजती है झांकी; दिखते हैं कृष्ण-राम के प्रसंग

Published: Fri, 04 Sep 2026 09:14 PM (IST)

कानपुर के विश्नोई परिवार में 75 साल पुरानी जन्माष्टमी की परंपरा आज भी जीवंत है, जहाँ 1950 में शुरू हुई ...और पढ़ें

घर पर सजाई गई जन्माष्टमी की झांकी। जागरण

घर पर सजाई गई जन्माष्टमी की झांकी। जागरण

HighLights

  1. 75 साल पुरानी जन्माष्टमी झांकी परंपरा कानपुर में

  2. 100 से अधिक प्राचीन मूर्तियों से सजती है झांकी

  3. कृष्ण-राम के जीवन प्रसंगों को दर्शाती है यह झांकी

स्नेहा दुबे, कानपुर। जन्माष्टमी सिर्फ एक पर्व नहीं बल्कि आस्था की वो परंपरा है जो सदियों से न सिर्फ मनाते आ रहे बल्कि संजोए भी हुए हैं। शारदा नगर के विश्नोई परिवार में करीब 75 साल से चली आ रही अनोखी परंपरा आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।

वर्ष 1950 के आसपास मिट्टी के खिलौनों से शुरू हुई झांकी अब 100 से अधिक पुरानी मूर्तियों की अनमोल विरासत बन चुकी है। हर जन्माष्टमी पर इन मूर्तियों में कृष्ण जन्म से लेकर गोवर्धन धारण और कंस वध तक के प्रसंग जीवंत हो उठते हैं। खास बात यह है कि परिवार इस परंपरा के जरिए नई पीढ़ी को धर्म, मर्यादा और अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ रहा है।

Janmashtami live

सात दशक पहले मिट्टी के खिलौनों से शुरू हुई एक छोटी-सी परंपरा आज विश्नोई परिवार की अनमोल विरासत बन चुकी है। 75 साल पुरानी 100 से अधिक मूर्तियां हर जन्माष्टमी पर घर में सजती हैं। उम्रदराज हो चुकी इन मूर्तियों को जब शारदा नगर निवासी ज्ञानेंद्र विश्नोई और उनके बेटे पुष्कर झांकी में सजाते हैं तो पुरानी यादें और धार्मिक आस्था फिर जीवंत हो उठती हैं।

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उन्होंने बताया कि पिता स्व. जगदीश प्रसाद ने वर्ष 1950 के आसपास झांकी सजाने की शुरुआत की थी। सात बेटों पिता की उस परंपरा को आगे बढ़ाया और आज भी निभा रहे हैं। झांकी में कृष्ण जन्म, माखन चोरी, पूतना वध, गोवर्धन धारण, नाग नथैया, कंस वध, कृष्ण-सुदामा मिलन और गीता उपदेश के दृश्य शामिल हैं। रामलीला से जुड़े ताड़का वध, राम विवाह, शबरी के बेर, सीता हरण और अशोक वाटिका के प्रसंग भी सजाए जाते हैं। परिवार का उद्देश्य नई पीढ़ी को धर्म, मर्यादा और अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है।

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इस तरह संजोई झांकी

एक बड़ा-सा बक्सा खुलता है और उसमें से रुई में लिपटी मिट्टी की छोटी-छोटी मूर्तियां बाहर आने लगती हैं। किसी के हाथ में बांसुरी है तो कोई गाय के साथ खड़ा है। कहीं राम-सीता नजर आते हैं तो कहीं हनुमान संजीवनी लेकर दौड़ते दिखाई देते हैं। सात दशक से अधिक पुरानी इन मूर्तियों को देखकर शारदानगर के ज्ञानेंद्र विश्नोई के चेहरे पर यादों की चमक आ जाती है। वह बताते हैं, 'इन्हें हमारे पिता ने संभालकर रखा था, अब हम बच्चों को इनकी कहानी बताते हैं।'

 

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जनरलगंज से शुरू हुई परंपरा

यह विश्नोई परिवार पहले जनरलगंज में रहता था और ये मूर्तियां उनके परिवार की विरासत से जुड़ी हैं जो करीब 75 साल पुरानी है। वर्ष 1950 के आसपास ज्ञानेंद्र के पिता स्व. जगदीश प्रसाद ने घर में मिट्टी के खिलौनों से झांकी सजाने की शुरुआत की थी। सात बेटों में से एक ज्ञानेंद्र अब अपने बेटे सीए पुष्कर विश्नोई के साथ शारदानगर स्थित घर में उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। जन्माष्टमी आते ही बक्से खुलते हैं और एक-एक कर पुरानी मूर्तियां बाहर निकलती हैं।

 

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सबसे पहले कृष्ण का जन्म दृश्य

झांकी के सामने पहुंचते ही सबसे पहले कृष्ण जन्म का दृश्य दिखाई देता है। आगे यमुना किनारे बाल कृष्ण की लीला, माखन चोरी और गाय चराते कान्हा नजर आते हैं। कहीं नटखट कृष्ण ऊखल से बंधे हैं तो कहीं गोवर्धन पर्वत उठाए खड़े हैं। नाग नथैया, कंस का दरबार और कंस वध के दृश्य भी अपनी कहानी खुद कहते नजर आते हैं। आगे बढ़ने पर कृष्ण-सुदामा का प्रेम, ब्रज की होली, राधा-कृष्ण का महारास और गोपियों से जुड़े प्रसंग दिखाई देते हैं। एक दृश्य में श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश देते हैं तो दूसरे में भीष्म पितामह दिखाई देते हैं।

 

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मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से जुड़ी कथा

झांकी यहीं खत्म नहीं होती। दूसरी ओर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की कथा सजी है। राम और निषादराज का मिलन, ताड़का वध, गुरु सेवा, धनुष परीक्षा और राम विवाह के दृश्य क्रम से रखे गए हैं। आगे शबरी के बेर, सोने का हिरण, कपटी रावण का साधु वेश, सीता हरण, अशोक वाटिका और लक्ष्मण मूर्छा के प्रसंग दिखाई देते हैं। हनुमानजी को संजीवनी लाते हुए और लव-कुश के दृश्य भी इस विरासत का हिस्सा हैं।

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राजनेताओं की भी झांकी

ज्ञानेंद्र बताते हैं कि इन धार्मिक प्रसंगों के साथ परिवार ने उस दौर के सामाजिक और ऐतिहासिक जीवन को भी मूर्तियों में सहेज लिया। संग्रह में शिव बारात, साधु मंडली, हरिश्चंद्र-तारामती, कारगिल युद्ध और विक्रम-बेताल के दृश्य हैं। वहीं प्रथम स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराते पं. जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी और मौलाना आजाद की मूर्तियां इतिहास की झलक दिखाती हैं। कानपुर क्लब, गोल चौराहा, पुलिस बैंड, चाट की दुकान, मदारी-बंदर, सपेरा और कैरम खेलते बच्चों के दृश्य उस समय के शहर और समाज की तस्वीर सामने रखते हैं।

सुरक्षित रखना बड़ी चुनौती

इतनी पुरानी मूर्तियों को सुरक्षित रखना भी अपने आप में चुनौती है। ज्ञानेंद्र बताते हैं कि हर मूर्ति को कागज में लपेटकर बड़े बक्से में रखा जाता है। उनके बीच रुई और मुलायम फोम लगाया जाता है, ताकि वर्षों पुरानी मिट्टी की मूर्तियां टूटने से बची रहें। जन्माष्टमी पर इन्हें निकालकर साफ किया जाता है और फिर झांकी में सजाया जाता है।

पिता से मिली जिम्मेदारी

ज्ञानेंद्र के लिए यह केवल जन्माष्टमी की सजावट नहीं, बल्कि पिता से मिली जिम्मेदारी है। वह कहते हैं कि झांकी के जरिए परिवार और समाज के बच्चों को बताया जाता है कि श्रीराम और श्रीकृष्ण ने किस तरह मर्यादा का पालन किया और धर्म की रक्षा की। सात दशक पुरानी ये मूर्तियां हर साल यही संदेश देती हैं कि समय बदल सकता है, लेकिन आस्था और विरासत को संभालने वाली परंपराएं पीढ़ियों तक जीवित रह सकती हैं।

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