Vulture Awareness Day: जटायु के वंशजों पर संकट, दवाओं ने घटाई गिद्धों की आबादी, Kanpur Zoo में बनेगा प्रजनन केंद्र
गिद्धराज जटायु के वंशज दवाओं के असर और धीमी प्रजनन दर के कारण अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहे ...और पढ़ें

HighLights
दवाओं के असर से गिद्धों की आबादी लगातार घट रही है
कानपुर चिड़ियाघर में गिद्ध प्रजनन और संरक्षण केंद्र बनेगा
बीएनएचएस और चिड़ियाघर गिद्धों के संरक्षण को मिलकर काम करेंगे
जागरण संवाददाता, कानपुर। International Vulture Awareness Day: माता सीता की रक्षा के लिए रावण से युद्ध करने वाले गिद्धराज जटायु के वंशज अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। प्रकृति के इन सफाई कर्मियों की घटती आबादी पर्यावरण संतुलन के लिए भी खतरा बन रही है। प्रतिबंधित दवाओं की वजह से इनकी मौत हो रही है। मृत्यु के अनुपात में जन्मदर कम होने से इनकी संख्या घट रही है। इनको बचाने के प्रयास तो किए जा रहे हैं लेकिन बहुत अच्छे परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं।
गिद्धों के संरक्षण व उनके प्रजनन के लिए बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी व कानपुर के चिड़ियाघर ने मिलकर प्रयास शुरू किए हैं। चिड़ियाघर में गिद्ध प्रजनन केंद्र स्थापित करने की भी कवायद चल रही है। अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस पर पांच सितंबर को चिड़ियाघर में गिद्धों के संरक्षण को लेकर कार्यशाला भी आयोजित की जाएगी।
जानवरों के शरीर में पहुंचने वाली हानिकारक दवाओं के असर से गिद्धों की आबादी खत्म होती जा रही है। इनको बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन इसका कोई खास असर नहीं हो रहा है। गिद्धों को नुकसान पहुंचाने वाली चार हानिकारक दवाओं पर प्रतिबंध तो लगा दिया गया है लेकिन यह चोरी छिपे बिक रही हैं। जिन जानवरों के शरीर में यह दवाएं डाली जाती है, मरने के बाद उनका मांस खाकर गिद्ध भी मर जाते हैं।
इनको बचाने की कवायद शुरु हुई है। बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) व चिड़ियाघर इसको लेकर जागरूकता अभियान शुरू कर रहें हैं। गिद्धों को बचाने की अपील करने के साथ उनके संरक्षण के लिए भी प्रयास किए जा रहें हैं। चिड़ियाघर में वर्तमान समय में छह गिद्ध हैं। चिड़ियाघर निदेशक डा. कन्हैया पटेल व बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी की विज्ञानी अल्का दुबे कहती हैं कि गिद्धों की संख्या नहीं बढ़ी तो यह स्थिति काफी गंभीर हो सकती है।
अल्का दुबे बताती हैं कि गिद्धों को लेकर समाज में भ्रांतियां भी हैं, इनको दूर कर लोगों को इनके संरक्षण के प्रति जागरूक करना बहुत जरूरी है। गिद्धों की घटती संख्या पर बात की जाए तो उत्तर प्रदेश में पांच वर्ष पहले 800 के करीब गिद्ध थे,इनकी संख्या सिमट कर 300 के आस-पास रह गई है। वे बताती हैं कि गोरखपुर में जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र बनाया गया है। इस तरह के प्रदेश में और भी केंद्र बनाने की जरूरत है। गिद्धों की प्रजनन व संरक्षण के लिए चिड़ियाघर का प्राकृतिक वातावरण काफी अनुकूल है। यहां प्रजनन केंद्र स्थापित कर गिद्धों की संख्या बढ़ाने के लिए कार्य किया जाएगा।
मादा गिद्ध वर्ष में एक बार देती है अंडा
गिद्धों की संख्या तेजी से वृद्धि न होने के पीछे उनकी प्रजनन की सुस्त गति भी है। मादा गिद्ध वर्ष में एक बार ही अंडा देती है। इस कारण अन्य पक्षियों की तुलना में उनकी संख्या भी तेजी से नहीं बढ़ती है। गिद्धों का आहार मृत जीव होते हैं। इनकी वजह से संक्रमण का खतरा कम करने में सहायता मिलती है। गिद्ध का अस्तित्व मिटने से पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य दोनों पर इसका असर पड़ेगा।
इन दवाओं की वजह से गिद्धों की जा रही जान
गिद्धों की जान डायक्लोफेनाक, एसीक्लोफेनाक, कटोप्रोफेन, निमेसुलाइड दवाओं की वजह से जा रही है। प्रतिबंध के बाद भी यह दवाएं बाजार में मिलती हैं। अल्का दुबे बताती हैं कि इन दवाओं से प्रभावित मृत जानवरों का मांस खाकर गिद्धों की 72 घंटे में मौत हो जाती है। ये प्रतिबंधित दबाएं चोरी छिपे बिक रही है।
भारत में गिद्धों की ये प्रजातियां पाई जाती
चिड़ियाघर के निदेशक डा. कन्हैया पटेल बताते हैं कि भारत में गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती है। इनमें ओरिएंटल व्हाइट बैक्ड गिद्ध, लंबी चोंच वाला गिद्ध पतली चोंच वाला गिद्ध, लाल सिर वाला गिद्ध, इजिपशियन गिद्ध, हिमालयन ग्रिफन गिद्ध, यूरेशियन ग्रिफन गिद्ध, सिनेरियस गिद्ध, बियर्डेड गिद्ध शामिल हैं। गिद्धों की सभी प्रजातियां संकटग्रस्त हैं
उत्तर प्रदेश में छह प्रजातियों के गिद्ध, सभी संकटग्रस्त
प्रभागीय वन अधिकारी आकांक्षा जैन ने बताया कि उत्तर प्रदेश में गिद्धों की छह प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें मिस्र का गिद्ध, लंबी चोंच वाला गिद्ध, भारतीय गिद्ध, सफेद पीठ वाला गिद्ध, लाल सिर वाला गिद्ध, हिमालयी गिद्ध शामिल हैं। गिद्धों के संरक्षण के लिए सभी को योगदान देना होगा। कहीं गिद्ध दिखाई दे तो इसकी सूचना वन विभाग को दें ताकि उसका संरक्षण किया जा सके।
गिद्धों की घटती संख्या का यह भी कारण
वनों की कटाई, शहरीकरण की वजह से गिद्धों का प्राकृतिक आवास कम हो रहा है। उनको घोंसला बनाने के लिए अनुकूल जगह भी नहीं मिल रहीं।
