बुद्ध की तपोभूमि से अंतरराष्ट्रीय विकास हब तक, बदल रही है महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर की तस्वीर
भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर अब अंतरराष्ट्रीय विकास हब के रूप में उभर रही है। यहां अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, ...और पढ़ें

HighLights
कुशीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा अब हर मौसम में उड़ान भरने में सक्षम।
कृषि विश्वविद्यालय और मेडिकल कॉलेज से शिक्षा-स्वास्थ्य में बड़ा सुधार।
केले के रेशे से उत्पाद, महिला सशक्तिकरण और आजीविका का नया स्रोत।
डिजिटल डेस्क, कुशीनगर। भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली और शांति व करुणा के वैश्विक संदेश की पावन भूमि कुशीनगर आज उत्तर प्रदेश के विकास मानचित्र पर एक नई पहचान गढ़ रही है। अस्सी वर्ष की अवस्था में जहाँ भगवान बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था, वह पावन धरा आज केवल आध्यात्मिक शांति की तलाश में आने वाले देश-विदेश के श्रद्धालुओं का केंद्र ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, मेडिकल कॉलेज, कृषि विश्वविद्यालय और उद्योग आधारित विकास का एक सशक्त मॉडल बनकर उभर रही है।
वैश्विक धार्मिक पर्यटन और सर्वकालिक हवाई कनेक्टिविटी
कुशीनगर पूरी दुनिया के बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए तीसरा सबसे पवित्र स्थल है, जहाँ जापान, थाईलैंड, वियतनाम, श्रीलंका, ताइवान, कंबोडिया और म्यांमार जैसे देशों से हर साल हजारों की संख्या में श्रद्धालु नमन करने पहुँचते हैं। महापरिनिर्वाण मंदिर, रामभार स्तूप और फाजिलनगर जैसी धरोहरों के बीच पर्यटकों की सुगमता के लिए लगभग 377 करोड़ रुपये की लागत से कुशीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट का निर्माण किया गया है। हाल ही में इस हवाई अड्डे को कैट-आइज और इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (ILS) जैसी आधुनिक तकनीकों से लैस किया गया है, जिससे अब दिन-रात और किसी भी मौसम में यहाँ अंतरराष्ट्रीय उड़ानें और विमान सुरक्षित लैंड कर सकते हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ऐतिहासिक बदलाव
कभी इंसेफेलाइटिस और कालाजार जैसी गंभीर बीमारियों के दंश के लिए जाने जाने वाले इस पूर्वांचल क्षेत्र में अब स्वास्थ्य और शिक्षा की बुनियादी संरचना पूरी तरह बदल चुकी है। करीब 750 करोड़ रुपये की लागत से महात्मा बुद्ध कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना की जा रही है, जो कुशीनगर, देवरिया, महाराजगंज, गोरखपुर और बलिया सहित पूर्वांचल के 10 जिलों के युवाओं और शोधार्थियों के लिए क्रांतिकारी साबित होगा। इसके साथ ही, जिला अस्पताल से संबद्ध राजकीय मेडिकल कॉलेज का संचालन शुरू हो चुका है, जहाँ अत्याधुनिक ट्रॉमा व क्रिटिकल केयर सेंटर, डायलिसिस यूनिट और नर्सिंग कॉलेज की व्यवस्था की गई है, जिससे गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए अब बड़े शहरों की निर्भरता समाप्त हो गई है।
केले के रेशे से 'ओडीओपी' और महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल
कृषि प्रधान जिला होने के नाते कुशीनगर में धान, गेहूं और गन्ने के साथ-साथ लगभग 21 हजार हेक्टेयर में केले की व्यापक खेती होती है। 'एक जिला एक उत्पाद' (ODOP) योजना के तहत केले के बेकार समझे जाने वाले तनों से रेशा निकालकर हैंडबैग, योगा मैट, रस्सियां, गमले और पेन स्टैंड जैसे हस्तशिल्प उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। हरिहरपुर जैसे गांवों में स्थानीय उद्यमियों द्वारा ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है, जिससे कभी खेत का कचरा माना जाने वाला तना अब हजारों परिवारों की आजीविका और समृद्धि का जरिया बन चुका है।
निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था
पूर्व की 'गन्ना, गंडक और गुंडा' वाली पहचान को पीछे छोड़ते हुए कुशीनगर में अब फोरलेन सड़कों, स्टेट हाईवे और कप्तानगंज जैसे स्टेशनों से वंदे भारत रेल कनेक्टिविटी के जरिए व्यापारिक गतिविधियों को नई रफ्तार मिली है। इन्वेस्टर्स समिट में लगभग 1300 करोड़ रुपये के एमओयू (MOU) और बुद्धिस्ट कॉन्क्लेव में 600 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्तावों ने यहाँ औद्योगिक संभावनाओं को पंख दिए हैं। इसके साथ ही, जिले की 72 मॉडल ग्राम पंचायतों द्वारा खुद की आय अर्जित करने के अभिनव प्रयासों से गाँव-देहात की अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो रही है, जिससे कुशीनगर 'बढ़ते उत्तर प्रदेश' के संकल्प को साकार करता हुआ आगे बढ़ रहा है।
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