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PM मत्स्य संपदा योजना से कुशीनगर में बढ़ा मछली कारोबार, लेकिन जैविक खेती अब भी बड़ी चुनौती

Published: Fri, 06 Nov 2026 09:02 AM (IST)

कुशीनगर में मत्स्य पालन कारोबार तेजी से बढ़ा है, जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिला है और उत्पादन में वृद्धि ...और पढ़ें

कुशीनगर के रोहू व कतला प्रजाति की मछलियों का बाहर की मंडी में बढ़ी है मांग। सांकेतिक तस्वीर

कुशीनगर के रोहू व कतला प्रजाति की मछलियों का बाहर की मंडी में बढ़ी है मांग। सांकेतिक तस्वीर

HighLights

  1. कुशीनगर में मत्स्य पालन कारोबार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

  2. पारंपरिक तरीकों से होता है मत्स्य पालन, जैविक व्यवस्था नहीं।

  3. रासायनिक खाद, दवाओं के उपयोग से मछली गुणवत्ता प्रभावित होती है।

जागरण संवाददाता, पडरौना। कुशीनगर में जैविक मत्स्य पालन के लिए जरूरी स्वच्छ जल, जैविक चारा, प्रमाणित मत्स्य बीज, रोग नियंत्रण और प्रमाणन की कोई व्यवस्था नहीं है। यहां परंपरागत तरीके से जलाशयों व प्राकृतिक जलस्रोतों में यह कारोबार चल रहा है। इसमें अप्रमाणित बीज, रासायनिक खाद, दवाओं और सामान्य चारे का इस्तेमाल होता है। जनपद में जैविक मत्स्य पालन के लिए जरूरी स्वच्छ जल, जैविक चारा, प्रमाणित मत्स्य बीज, रोग नियंत्रण और प्रमाणन की कोई व्यवस्था नहीं हैं।

सरकार की ओर से 2015 से 2020 तक चलाई गई नीली क्रांति योजना ने कुशीनगर में मत्स्य पालन कारोबार को ठांव दिया तो उसके बाद शुरू हुई प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना व मुख्यमंत्री मत्स्य पालन योजना कारोबार को ऊंचाई दी। योजनाओं का लाभ लेकर जनपद के 3100 मत्स्य पालकों ने रोजगार का बाजार खड़ा किया है और अपने परिवार के लिए समृद्धि के द्वार खोला।

पिछले पांच वर्षों में जनपद में 7000 टन मछली का उत्पादन बढ़ा है तो लगभग 30 हजार लोगों को रोजगार भी मिला है। कुशीनगर में 2625 तालाबों में मत्स्य पालन कारोबार संचालित किया जा रहा है, इससे 3100 मत्स्य पालक जुड़े हुए हैं।

जनपद की मांग को पूरा करने के साथ ही यहां की मछलियां गोरखपुर व बिहार की मंडियों में भी भेजी जा रही हैं। 2021 में 24568 टन, 2022 में 26785 टन, 2023 में 28800 टन, 2024 में 30100 टन और 2025 में 31500 टन मछली का उत्पादन हुआ है। यहां की रोहू व कतला प्रजाति की मछलियों की मांग बाहर की मंडियों में अधिक है।

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एक तालाब की बात की जाए तो मत्स्य पालक के परिवार के सदस्यों के अलावा तीन-चार दैनिक मजदूर व छह-सात मछली बेचने वालों को रोजगार मिल रहा है। जनपद में 2625 तालाबों के हिसाब से लगभग 30 हजार लोगों के परिवार का खर्च चल रहा है। यहां रोहू, कतला, नैनी, कामन कार्प, सिल्वर, सिल्वर, बिगगेड, ग्रास, पंगेसियस (बैकर), रूप चंदा समेत अन्य प्रजाति की मछलियों का पालन होता है।

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कुशीनगर में पिछले पांच वर्षों में मछली का कारोबार तेजी से बढ़ा है। जनपद की मांग पूरी करने के साथ ही बाहर की मंडियों में भी यहां की मछलियां जा रही हैं। दूसरे प्रदेशों से अब यहां नाम मात्र की मछलियां मंगाई जा रही है। हालांकि रासायनिक उत्पादों व दवाओं के प्रयोग से मछलियों की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसका मानव शरीर पर चार से पांच प्रतिशत तक असर पड़ता है। जैविक मत्स्य पालन अभी कुशीनगर में नहीं हो रहा है।

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-एके मौर्य, सहायक निदेशक मत्स्य

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