उत्तर प्रदेश की BSc पास दो सहेलियों ने नौकरी छोड़ शुरू की 'फ्लोर मिल', लिखी आत्मनिर्भरता की नई कहानी
लखीमपुर खीरी की दो सहेलियों ज्योति वर्मा और शैलजा ने नौकरी के बजाय उद्यमी बनने का रास्ता चुना।

दो सहेलियों ने लिखी आत्मनिर्भरता की नई कहानी।
HighLights
ज्योति और शैलजा ने शुरू की 'श्री कान्हा भोग' आटा मिल।
प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग योजना से मिला 16 लाख का ऋण।
अपने उद्यम से कई परिवारों को दिया आर्थिक सहारा और रोजगार।
राकेश मिश्र, लखीमपुर। हुनर, हौसले और मेहनत के दम पर आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिखी जा सकती है। इसकी मिसाल हैं दो सहेलियां ज्योति वर्मा और शैलजा, जिन्होंने नौकरी की तलाश में भटकने के बजाय खुद उद्यमी बनने का रास्ता चुना।
बीएससी तक पढ़ाई करने वाली 25 वर्षीय ज्योति ने अपनी हमजोली शैलजा के साथ मिलकर फ्लोर मिल स्थापित की। आज उनकी इकाई से न केवल उनके सपनों को उड़ान मिली है, बल्कि कई परिवारों की आजीविका भी जुड़ी है। ब्रांडेड कंपनियों के बीच उनका ‘श्री कान्हा भोग’ आटा अपनी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
दोनों सहेलियों के सामने कारोबार शुरू करने में सबसे बड़ी चुनौती पूंजी की थी। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना के तहत 16 लाख रुपये का ऋण लेकर अपने उद्यम की नींव रखी।
परिवार के सदस्य भी कर रहे मदद
आधा चाट गांव में एक बीघा जमीन लीज पर लेकर फ्लोर मिल स्थापित की और उत्पादन शुरू किया। शुरुआती चुनौतियों के बीच कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए लगातार मेहनत की। परिवार के सदस्य भी उद्योग के संचालन में हाथ बंटा रहे हैं, जिससे उनका हौसला और मजबूत हुआ है।

शैलजा वर्मा।
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अपने रोजगार से दूसरों को भी सहारा
ज्योति और शैलजा की पहल की खास बात यह है कि उन्होंने स्वरोजगार को केवल अपनी कमाई का जरिया नहीं बनाया। फ्लोर मिल में गेहूं की धुलाई और सफाई जैसे कार्यों के लिए आधा दर्जन महिलाओं को रोजगार मिला है। वहीं, जिले भर में उत्पाद की आपूर्ति से जुड़े कामों में नौ अन्य लोग भी आजीविका अर्जित कर रहे हैं। इस तरह छोटी-सी पहल कई परिवारों के लिए आर्थिक संबल बन रही है।
सरकारी योजना से मिली उड़ान
सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाई स्थापित करने के लिए मिला ऋण दोनों सहेलियों के सपने को साकार करने में अहम साबित हुआ। श्री कान्हा भोग आटे को बाजार में स्थापित करने और बड़ी कंपनियों के बीच अपनी जगह बनाने की चुनौती उनके सामने है। इसके बावजूद दोनों का प्रयास जारी है।

ज्योति वर्मा।
ज्योति और शैलजा की कहानी बताती है कि सफलता के लिए नौकरी ही एकमात्र विकल्प नहीं है। सही योजना, मेहनत और वित्तीय सहयोग मिले तो छोटे शहरों और गांवों में भी रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। खुद आत्मनिर्भर बनने के साथ दूसरों को रोजगार देना ही उनकी इस पहल की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
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