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एक बार न्यायिक कार्रवाई शुरू करने के बाद मजिस्ट्रेट दोबारा नहीं खोल सकता प्रकरण: इलाहाबाद हाई कोर्ट

Published: Fri, 11 Sep 2026 08:35 PM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि न्यायिक मजिस्ट्रेट एक बार कार्रवाई शुरू करने ...और पढ़ें

एक बार मामले पर न्यायिक कार्रवाई शुरू करने के बाद मजिस्ट्रेट दोबारा नहीं खोल सकता प्रकरण: हाई कोर्ट।

एक बार मामले पर न्यायिक कार्रवाई शुरू करने के बाद मजिस्ट्रेट दोबारा नहीं खोल सकता प्रकरण: हाई कोर्ट।

HighLights

  1. मजिस्ट्रेट एक बार शुरू कार्रवाई के बाद मामला दोबारा नहीं खोल सकते।

  2. प्रोटेस्ट अर्जी पहले के आदेश की समीक्षा या पुनर्विचार का माध्यम नहीं।

  3. आरोपपत्र पर धाराओं को जोड़ना या घटाना मजिस्ट्रेट का अधिकार नहीं।

विधि संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि किसी मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट एक बार कार्रवाई शुरू करने के बाद उसी मामले को बाद में दाखिल प्रोटेस्ट अर्जी के आधार पर दोबारा नहीं खोल सकता। पहले पारित आदेश की समीक्षा या उसमें बदलाव भी इसी प्रक्रिया के तहत नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस रिपोर्ट पर आधारित मामले में आरोपपत्र पर कार्रवाई तय करते समय मजिस्ट्रेट अपने स्तर से धाराओं को जोड़ या घटा भी नहीं सकता।न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह ने यह आदेश गोंडा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 22 मई को पारित आदेश को निरस्त करते हुए दिया।

कोर्ट ने कहा कि प्रोटेस्ट अर्जी पहले के आदेश की समीक्षा या पुनर्विचार का माध्यम नहीं बन सकती। मामला गोंडा के नवाबगंज थाने में वर्ष 2025 में दर्ज मुकदमे से जुड़ा था। एफआईआर में अखिलेश सिंह, शेखर सिंह और अल्पना सिंह को आरोपित बनाया गया था।

विवेचना के बाद पुलिस ने अखिलेश और शेखर के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया, जबकि अल्पना के पक्ष में अंतिम रिपोर्ट लगाई गई।मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 17 नवंबर 2025 को आरोपपत्र पर कार्रवाई करते हुए अखिलेश को भारतीय न्याय संहिता की धारा 115(2), 351(2), 352, 324(2) और 109(1) तथा शेखर को धारा 115(2), 351(2) और 352 के तहत तलब किया था। इसके बाद अल्पना के खिलाफ अंतिम रिपोर्ट के विरोध में प्रोटेस्ट अर्जी दाखिल की गई।

इस पर 22 मई को मजिस्ट्रेट ने अल्पना के साथ शेखर को भी अतिरिक्त धाराओं में दोबारा तलब कर लिया। अल्पना ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट अपने पहले आदेश की समीक्षा नहीं कर सकता।

आरोपपत्र पर कार्रवाई करते समय धाराओं को अपने स्तर से जोड़ना या घटाना भी उचित नहीं है। इन्हीं आधारों पर कोर्ट ने 22 मई का आदेश निरस्त कर दिया और निचली अदालत को कानून के अनुसार आगे की कार्यवाही करने का निर्देश दिया।

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