बिहार के 'जंगलराज' की तर्ज पर यूपी में भाजपा का 'गुंडाराज' दांव, सपा के पुराने दौर को मुद्दा बनाने की रणनीति
भाजपा उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए अपनी रणनीति के तहत सपा के कथित 'गुंडाराज' और दंगों के दौर ...और पढ़ें

HighLights
भाजपा सपा के कथित 'गुंडाराज' को चुनावी मुद्दा बना रही है।
यह रणनीति बिहार के 'जंगलराज' फॉर्मूले पर आधारित है।
युवा मतदाताओं को सपा शासनकाल की याद दिलाना मुख्य लक्ष्य।
दिलीप शर्मा, लखनऊ। दस साल की सत्ता के बाद भाजपा, विधान सभा चुनाव में अपने कामकाज के साथ विपक्ष के पुराने शासनकाल को भी चुनावी कसौटी बनाने की तैयारी में है। बिहार में करीब दो दशक की नीतीश सरकार के बावजूद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने जिस तरह लालू-राबड़ी शासनकाल के 'जंगलराज' को चुनावी विमर्श में बनाए रखा था, उत्तर प्रदेश में भी भाजपा उसी राजनीतिक फार्मूले पर आगे बढ़ती दिख रही है।
फर्क सिर्फ इतना है कि बिहार में 'जंगलराज' मुद्दा बना था और उप्र में सपा शासनकाल का कथित 'गुंडाराज' और दंगों का दौर इस रणनीति का केंद्र है। पिछले कुछ दिनों में गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयानों में इसकी निरंतरता, इसी रणनीति का हिस्सा है।
भाजपा एक ओर अपने दस साल के कामकाज को पिछली सरकार से बेहतर बताने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर संभावित सत्ता विरोधी भावनाओं के बीच मतदाताओं को पुराने विकल्प की याद भी दिलाना चाहती है।
सपा सरकार के कथित गुंडाराज और तुष्टीकरण का उल्लेख
इस रणनीति की झलक 26 अक्टूबर को मुख्यमंत्री के बिठूर में दिए संबोधन में देखी जा सकती है। करीब 45 मिनट के भाषण में उन्होंने अधिकांश समय सपा सरकार के कथित गुंडाराज, तुष्टीकरण और सांप्रदायिक दंगों का उल्लेख किया। 30 अक्टूबर को भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में अमित शाह ने मुलायम सिंह यादव के शासनकाल का संदर्भ जोड़कर इस विमर्श को विस्तार दिया।
अयोध्या में वर्ष 1990 में कारसेवकों पर फायरिंग का उल्लेख कर कहा कि जनता सपा प्रमुख की तीसरी पीढ़ी को भी इसके लिए माफ नहीं करेगी। वहीं तीन नवंबर को लखनऊ में 'लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ' पदयात्रा में शिवराज सिंह चौहान ने भी सपा सरकार के दौर को निशाने पर लिया। आरोप लगाया कि उस समय प्रदेश में कमीशन, क्राइम और करप्शन का बोलबाला था।
राजनीतिक भाषणों के साथ भाजपा के डिजिटल क्रिएटिव में भी 'सपा सरकार बनाम भाजपा सरकार' छाया हुआ है। कहीं अतीक अहमद के माफिया साम्राज्य के मुकाबले उसकी बेनामी संपत्तियों पर कार्रवाई, पुराने दौर में निवेशकों की कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता और मौजूदा समय में पर्यटन विकास, कब्रिस्तानों पर खर्च के मुकाबले महानवमी का अवकाश और 1990 के घटनाक्रम के मुकाबले राम मंदिर निर्माण को रखकर भी 'तब और अब' का अंतर समझाया जा रहा है।
भाजपा की इस रणनीति का प्रमुख लक्ष्य युवा मतदाता भी हैं। वर्ष 2027 में ऐसे मतदाताओं की बड़ी संख्या होगी, जिन्हें 2012 से 2017 और उससे पहले के सपा शासनकाल का प्रत्यक्ष राजनीतिक अनुभव नहीं है। छोटे वीडियो आदि के माध्यम से भाजपा नई पीढ़ी के सामने उस दौर की अपनी राजनीतिक व्याख्या पहुंचाना चाहती है।
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बिहार में भी राजग की ओर से जारी कई प्रचार वीडियो सीधे 'जंगलराज' की याद दिलाने पर केंद्रित थे। करीब 20 साल की नीतीश सरकार के बावजूद राजग ने लालू-राबड़ी के शासनकाल को चुनावी चर्चा में बनाए रखा था। अब उप्र में इसे ही दोहराने की कोशिश है। हालांकि इसका असर कितना होगा, यह मतदाताओं के वर्तमान अनुभव और पुराने शासनकाल की स्मृतियों के बीच बनने वाले संतुलन पर निर्भर करेगा।
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