लखनऊ में है एशिया का पहला महिला कॉलेज, स्थापना के 125 साल पूरे, क्या आप जानते हैं इसका नाम?
लखनऊ का आईटी कॉलेज, एशिया का पहला महिला कॉलेज, 18 अप्रैल 1870 को छह छात्राओं के साथ शुरू हुआ था। ...और पढ़ें

HighLights
आईटी कॉलेज एशिया का पहला महिला कॉलेज है।
18 अप्रैल 1870 को छह छात्राओं से हुई शुरुआत।
संस्थान मंगलवार को 125वां संस्थापक दिवस मनाएगा।
अखिल सक्सेना, लखनऊ। जिस दौर में बेटियों की शिक्षा समाज के लिए किसी बदलाव से कम नहीं थी, उसी दौर में अमीनाबाद के बीचों-बीच एक कमरे में छह लड़कियों से शुरू हुई छोटी-सी पहल ने इतिहास रच दिया।
18 अप्रैल 1870 को इसाबेला थोबर्न ने जिस स्कूल की नींव रखी थी, वही आगे चलकर आईटी कॉलेज के रूप में महिला शिक्षा की ऐसी मशाल बना, जिसकी रोशनी देश ही नहीं एशिया तक पहुंची। यही संस्थान एशिया का पहला महिला कॉलेज भी बना।
इस गौरवशाली यात्रा में संस्थान ने तमाम बेटियों को शिक्षा, आत्मविश्वास और अपने सपनों को उड़ान देने का मंच दिया। यहां से पढ़कर निकलीं तमाम छात्राएं विभिन्न क्षेत्रों में समाज में कॉलेज का मान बढ़ा रही हैं। मंगलवार को आईटी कॉलेज अपना 125वां संस्थापक दिवस मनाएगा।
कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्ध था कॉलेज
1886 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की देखरेख में यहां ललित कला की कक्षाएं शुरू हुई थीं। 1894 में यहां इलाहाबाद विश्वविद्यालय के साथ संबद्ध हो गया। प्राचार्य प्रो. नीरजा मसीह बताती हैं कि 1901 में कॉलेज की संस्थापिका इसाबेला थोबर्न का निधन हो गया था। उनकी स्मृति में संस्थापक दिवस मनाया जाता है।
ऐसे शुरू हुई यात्रा
- 18 अप्रैल 1870 को अमीनाबाद में पाठशाला के रूप में शुरुआत।
- छह छात्राओं का हुआ पंजीकरण।
- 12 जुलाई 1886 लालबाग में स्थानांतरित
- उसी समय स्कूल का नाम बदलकर लखनऊ विमेंस कॉलेज हुआ।
- 1922 से चांद बाग (वर्तमान स्थल आईटी चौराहा) में संचालन।
- 1905–1954 तक कॉलेज की प्रिंसिपल सारा चाको रहीं जो वर्ल्ड काउंसिल आफ चर्चेस की पहली महिला अध्यक्ष थीं।
- 4000 छात्राएं विभिन्न कोर्सों में हैं अध्ययनरत।
- 23 विभागों हैं करीब 100 शिक्षक
पढ़ाई और अनुशासन था
आईटी कॉलेज से 1976 से 1978 तक बीएससी बायो की पढ़ाई की। यहां एडमिशन पाना आसान नहीं होता था। पढ़ाई और अनुशासन में इस कॉलेज का कोई जोड़ नहीं था। मैं रजिया हाउस की कैप्टन रही। बेस्ट स्पोर्ट्समैन स्पिरिट और वीमेन लीडरिशप अचीवमेंट अवार्ड भी मिल चुका है।
-प्रो. निशि पांडेय, प्रोफेसर आफ एमिनेंस, लवि।
जहां छात्रा थीं वहीं शिक्षिका बनीं
यहां कैंपस के कोने-कोने में बिताई हुई यादें हैं। 1988 से 1991 तक बीएससी किया। हास्टल में रहकर पढ़ाई की। साथ में व्यक्तित्व विकास और लीडरशिप सहित काफी चीजें सीखीं। सेना में नौकरी के बाद 2008 में यहां शिक्षिका और अब प्राचार्य बनीं।
-प्रो. नीरजा मसीह, प्राचार्य
आगे बढ़ने की मिली प्रेरणा
12वीं की मेरिट से यहां 1984 में बीएससी में प्रवेश मिला था। डेविडसन मैम बाटनी और डा. हक सर जूलाजी पढ़ाते थे। बहुत अच्छा माहौल था। छात्राओं को हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाता था। मैं सरोजनी हाउस की वाइस प्रेसीडेंट भी रही।
-प्रो.फरजाना मेहंदी, प्रति कुलपति, एरा यूनिवर्सिटी
सपने पूरे करने का हौसला मिला
1990 से 1995 तक यहां 12वीं से लेकर बीए तक पढ़ाई पूरी की। शिक्षकों ने सपने पूरे करने, अपने आपको समझने और गलतियों से सीखने का मौका दिया। कॉलेज की बहुत सी यादें हैं। मेरी पहली किताब का दूसरे संस्कार का विमोचन इसी कॉलेज में हुआ।
-के.राशि बडालिया कुमार, फैकल्टी, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी।
