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चवन्नी' से 'इकन्नी' तक का तंज,अखिलेश के बयान को रालोद ने बनाया 'जाट अस्मिता' का मुद्दा; संगीत सोम ने बढ़ाई सियासी हलचल

Updated: Sun, 30 Aug 2026 01:22 AM (IST)

अखिलेश यादव की 'चवन्नी' टिप्पणी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट अस्मिता की राजनीति को गरमा दिया है। रालोद और ...और पढ़ें

चवन्नी से इकन्नी तक का तंज।

चवन्नी से इकन्नी तक का तंज।

HighLights

  1. अखिलेश की 'चवन्नी' टिप्पणी ने जाट अस्मिता को छुआ।

  2. रालोद-भाजपा ने इसे जाट सम्मान से जोड़कर भुनाया।

  3. सपा अंकित बालियान हत्याकांड को मुद्दा बना रही है।

जागरण संवाददाता, लखनऊ। सालों पहले चलन से बाहर हुई ‘चवन्नी’ भले ही मतदाता के किसी काम की नहीं, परंतु सत्ता की दौड़ में शामिल राजनीतिक दल ‘चवन्नी’ को भुनाने की कोशिश में पूरी तरह जुट गए हैं। ‘चवन्नी’ से एक आने वाले वार तक ‘16 आना’ राजनीति हो रही है। सब कोशिश में हैं कि उनका सिक्का चल जाए और चुनावी बयार में ‘16 आना’ वोट मिल सके।

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पुराने सहयोगी रालोद अध्यक्ष जयन्त चौधरी पर ‘चवन्नी को रुपया’ बनाने वाला तंज किया, तो उन्होंने इसे जाट समाज के सम्मान से जोड़ दिया और फिर भाजपा के पूर्व विधायक संगीत सोम ने कहा कि जिन्हें अखिलेश ने चवन्नी कहा, वे 2027 में उन्हें ‘एक आने (इकन्नी) का भी नहीं छोड़ेंगे।’ बात यहीं नहीं रुकी।

शामली के हरियाणवी गायक अंकित बालियान की हत्या के मामले में पीड़ित पिता की अखिलेश यादव से बातचीत ने पश्चिमी यूपी की राजनीति में सपा की सक्रियता को नया संदर्भ दे दिया। अखिलेश ने परिवार को न्याय की लड़ाई में हरसंभव मदद का भरोसा दिया और जाट समाज के बालियान गोत्र पर जोर देकर जातीय राजनीति को गोत्र के स्तर तक ले जाने के संकेत भी दे दिए।

साफ है कि ‘चवन्नी’ संग छिड़ी इस राजनीतिक लड़ाई में असली निशाना पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जाट-किसान राजनीतिक आधार है। सपा प्रमुख का ‘चवन्नी’ वाला तंज पुराने गठबंधन के राजनीतिक हिसाब-किताब को चुनावी मंच पर फिर खोलना था, लेकिन अब रालोद और भाजपा जैसी पार्टियां इसे सीधे जाटों के सम्मान से जोड़कर पश्चिम यूपी में सपा की रणनीति को पीछे धकेलने में जुटी हैं।

पश्चिमी यूपी में भाजपा की राजनीति लंबे समय से जाट, गुर्जर, त्यागी, सैनी समेत विभिन्न किसान और ओबीसी समूहों को साथ रखने की रही है। रालोद के साथ आने के बाद जाट आधार को गठबंधन के भीतर सुरक्षित रखना भाजपा की प्राथमिकता है। इसलिए सोम का हमला केवल अखिलेश पर नहीं, बल्कि उस पुराने जाट-मुस्लिम-सपा समीकरण पर भी है, जिसे वर्ष 2022 में सपा ने पश्चिमी यूपी में आजमाया था।

सपा, जाटों से दूरी बढ़ने का जोखिम लेने को तैयार नहीं। ऐसे में चवन्नी वाले बयान को गठबंधन टूटने के ‘दर्द’ से जोड़कर, केवल ‘तंज’ कहा जा रहा है। अब अंकित बालियान हत्याकांड ने सपा को कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाने का अवसर दे दिया है। सपा सांसद इकरा हसन और विधायक नाहिद हसन पीड़ित परिवार से मिले।

शुक्रवार को अंकित के पिता सतवीर सिंह ने अखिलेश यादव से फोन पर बातचीत की। इसके बाद सपा प्रमुख ने एक्स पर जो पोस्ट की उसमें, ‘जाट समाज’ की जगह ‘बालियान समाज’ शब्द प्रयोग किया। बालियान, जाट समाज का एक प्रमुख गोत्र है। गोत्र के उल्लेख से माना जा रहा है कि सपा इस मुद्दे को अब नया रंग देने की कोशिश में है। सपा प्रमुख के बयान को जयन्त द्वारा संवेदनहीन बताने से भी स्पष्ट है कि रालोद भी इस रणनीति को समझ रहा है।

रालोद के लिए चुनौती है कि वह इसे जातीय ध्रुवीकरण बनने से रोके और किसान-जाट हितों की राजनीति के साथ जोड़े। फिलहाल ‘चवन्नी’ का विवाद जितना खिंच रहा है, उसका राजनीतिक मूल्य उतना ही बढ़ रहा है। हालांकि वर्ष 2027 में सवाल यह नहीं होगा कि चवन्नी कौन है? सवाल यह होगा कि पश्चिमी यूपी के मतदाता की 16 आने की राजनीतिक ताकत किसके पक्ष में जाती है।

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