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    कारगिल विजय दिवस 2026: 'वापस आऊंगा, तिरंगा लहराकर या लिपटकर', कैप्टन मनोज पांडेय ने मां से कहे थे ये आखिरी शब्द

    Updated: Sun, 26 Jul 2026 07:33 AM (IST)

    कारगिल युद्ध में लखनऊ के कई जांबाजों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, जिनकी यादें आज भी उनके परिवारों के जेहन में ताजा हैं। कैप्टन मनोज पांडेय जैसे वीर स ...और पढ़ें

    बलिदानी कैप्टन मनोज पांडेय।

    बलिदानी कैप्टन मनोज पांडेय।

    HighLights

    1. कैप्टन मनोज पांडेय को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

    2. लखनऊ के कई सैनिकों ने कारगिल युद्ध में सर्वोच्च बलिदान दिया।

    3. बलिदानियों के परिवार आज भी उनके शौर्य पर गर्व करते हैं।

    निशांत यादव, लखनऊ। सन 1999 में 26 जून को कारगिल युद्ध अपने चरम पर पहुंच चुका था। अल्फा कंपनी का नेतृत्व कर रहे कैप्टन मनोज पांडेय रणक्षेत्र में थे। कैप्टन मनोज का उस दिन जन्मदिन था। परिवार से खराब सेटेलाइट नेटवर्क के बीच कुछ सेकेंड की बात हुई। बोले आप लोग चिंता न करना, दुश्मन पर तिरंगा लहराकर आऊंगा या उससे लिपटकर।

    आखिर एक सप्ताह के बाद बेटा दुश्मन को परास्त करते हुए वीर गति को प्राप्त हुआ। सन 1999 में हुए कारगिल युद्ध में शहर के कई जांबाजों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। आज भी उनके परिवार के जेहन में इन बलिदानियों की यादें ताजा हैं।

    बेटे के बलिदान पर गर्व

    जिस यूपी सैनिक स्कूल से पढ़कर कैप्टन मनोज पांडेय सैन्य अफसर बने, वह संस्थान अब बेटे के नाम से जाना जाता है। कैप्टन मनोज पांडेय यूपी सैनिक स्कूल के बोर्ड को देख पिता गर्व से अभिभूत हो उठते हैं। वीरता का सर्वोच्च पदक परमवीर चक्र मरणोपरांत बेटे को मिलने पर पिता कहते हैं कि कैप्टन मनोज का यह सपना था, जब सेना में चयन के लिए उनसे सलेक्शन बोर्ड ने पूछा कि आप सेना में क्यों जाना चाहते हैं ? 

    तब मनोज ने कहा था कि वह परमवीर चक्र प्राप्त करने के लिए सेना में शामिल होना चाहते हैं। खालूबार को दुश्मन से मुक्त कराते हुए तीन जुलाई 1999 को तीन बकरों को ध्वस्त कर वह चौथे बंकर की ओर बढ़े, लेकिन दुश्मन की गोली उनको लगी।

    खबरें और भी

    बीमार पत्नी को छोड़कर गए रणभूमि में

    बीमार पत्नी कमला द्विवेदी को देखने घर आए लांसनायक केवलानंद द्विवेदी को 26 मार्च 1999 को सेना से तार मिला। तार में बिना देरी जम्मू-कश्मीर में अपनी यूनिट पहुंचने के आदेश थे। उन्हाेंने एक तरफ पत्नी और दोनों नन्हें बच्चों को देखा और दूसरी ओर तार को। आखिर तार लेकर वह चले गए। कमला द्विवेदी को 30 मई 1999 को आखिरी बार केवलानंद द्विवेदी के फोन पर हुई बात याद है। तब केवलानंद द्विवेदी ने पत्नी से कहा कि मातृभूमि की रक्षा के लिए कारगिल के अग्रिम मोर्चे पर जा रहा हूं। तुम बच्चों और परिवार का ख्याल रखना। छह जून की रात दुश्मन से आमने सामने की लड़ाई में केवलानंद द्विवेदी बलिदानी हो गए।

    संचार नेटवर्क जोड़कर हुए बलिदानी

    लखनऊ के फातिमा अस्पताल में जन्मे कैप्टन आदित्य मिश्र 19 जून 1999 को अपनी यूनिट लद्दाख स्काउट के साथ बटालिक सेक्टर पहुंचे। कैप्टन आदित्य मिश्र ने जांबाजी से प्वाइंट 5203 को दुश्मनों के कब्जे से मुक्त कराया। वह कब्जे में आए बंकर में संचार नेटवर्क बिछाने दोबारा वहां पहुंचे तब ही वहां छिपे हुए दुश्मनों ने हमला कर दिया। कैप्टन आदित्य दुश्मन से मोर्चा लेते हुए बलिदानी हो गए। उनके पिता ले. जनरल जीएस मिश्र भी वरिष्ठ सैन्य अधिकारी थे।

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    छुट्टी छोड़कर ज्वाइन की यूनिट

    मेजर रीतेश शर्मा मई 1999 में आर्मी ट्रेनिंग कालेज महू में एक स्पेशल ट्रेनिंग कर रहे थे। ट्रेनिंग पूरी हुई और पिता एसपी शर्मा से बात करने के बाद मेजर रीतेश 15 दिनों की छुट्टी पर लखनऊ अपने घर आए थे। सूचना मिली कि कारगिल क्षेत्र में जाट रेजीमेंट की पेट्रोलिंग टुकड़ी का कुछ पता नहीं चल रहा है। वह वापस अपनी यूनिट 17 जाट रेजीमेंट पहुंचे। मेजर रीतेश प्वाइंट 4875 के बाद छह व सात जुलाई की रात मश्कोह घाटी को फतह करते समय घायल हो गए। जिस पर यूनिट को मश्कोह सेवियर का खिताब दिया गया।

    खेल-खेल में बने फौजी

    कारगिल युद्ध में लखनऊ में पहला बलिदान 15 मई 1999 को राइफलमैन सुनील जंग का हुआ था। मां बीना महत बताती हैं कि घर पर किसी को पता नहीं था। सुनील मात्र 16 साल की उम्र में सेना में भर्ती हो गया। उसे भी उसके पिता नरनारायण जंग वाली 1/11 गोरखा राइफल्स में शामिल किया गया। सुनील स्कूली दिनों में फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में फौजी ड्रेस पहनना पसंद करता था। कारगिल युद्ध से कुछ दिन पहले ही वह घर आया था। वापस जाते हुए बोला था मां जल्दी आऊंगा, मां का बेटे के आने का इंतजार खत्म नहीं हुआ। बेटा मातृभूमि की रक्षा करते हुए बलिदानी हो गया। मां कहती हैं कि इस जन्म में सुनील ने धरती माता के बेटे होने का फर्ज पूरा किया, अगले जन्म में वह मेरा बेटा बनकर अपने फर्ज को पूरा इसका इंतजार रहेगा।

    इन जांबाजों ने भी दिखाया था दम

    फ्लाइंग ऑफिसर गुंजन सक्सेना 

    कारगिल युद्ध में फ्लाइंग आफिसर गुंजन सक्सेना के साथ उनके भाई कर्नल अंशुमान ने भी मोर्चा संभाला था। गुंजन सक्सेना और अंशुमान दोनों ही एक साथ सन 1996 में कमीशंड हुए थे। गुंजन की बहादुरी पर जाह्नवी कपूर अभिनीत फिल्म 'गुंजन सक्सेना : द कारगिल गर्ल' बनी है।

    कर्नल जीपीएस कौशिक

    तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडीज 13 जून 1999 को कारगिल पहुंचे। कर्नल जीपीएस कौशिक के साथ उनके भाई वायुसेना अधिकारी एसपीएस कौशिक भी कारगिल युद्ध लड़ रहे थे। कर्नल कौशिक ने पाकिस्तानी गोलीबारी के बीच अमेरिका के सीनेटर डान बाउंसकी को कारगिल में करीब 100 किलोमीटर तक रेकी करायी थी। इसकी रिपोर्ट अमेरिका के सीनेट में सौंपी थी।

    कर्नल जेके चौरसिया

    यूपी सैनिक स्कूल के छात्र-कैडेट रहे कर्नल जेके चौरसिया को 30 जून की रात उफनाई नदी से होते हुए वह टुकड़ी के साथ पहाड़ी पारकर सीमा के करीब पहुंचे। भारी गोलीबारी के बीच पाकिस्तानी सेना के हथियारों के स्टोर को उन्होंने उड़ा दिया। एक बंकर को भी तबाह किया, मगर लौटते समय एक बारूदी सुरंग पर पैर पडऩे से हुए ब्लास्ट में वह घायल हो गए।