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    यूजीसी के नए बिल के विरोध में डॉक्टर भी उतरे, बोले- इलाज के समय नहीं पूछते मरीज की जाति

    Updated: Wed, 28 Jan 2026 09:38 PM (IST)

    लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में डॉक्टरों, रेजिडेंट्स, छात्रों और नर्सिंग स्टाफ ने यूजीसी के नए बिल का विरोध किया। प्रदर्शनकार ...और पढ़ें

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    HighLights

    1. केजीएमयू में डॉक्टरों, छात्रों ने यूजीसी बिल का विरोध किया

    2. बिल को सामान्य वर्ग के खिलाफ, भेदभावपूर्ण बताया गया

    3. प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार से बिल वापस लेने की मांग की

    जागरण संवाददाता, लखनऊ। यूजीसी के नए बिल को लेकर डॉक्टरों में भी भारी आक्रोश है। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में बुधवार को बड़ी संख्या में चिकित्सकों, छात्र-छात्राओं एवं नर्सिंग स्टाफ ने विरोध प्रदर्शन किया।

    डॉक्टरों का कहना है कि यह बिल उच्च शिक्षण संस्थानों में सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं और संकाय सदस्यों के खिलाफ है। हम लोग इलाज करते समय किसी मरीज की जाति-धर्म नहीं पूछते हैं। समानता के भाव से सेवा करते हैं। केंद्र सरकार को इस निर्णय पर विचार करना होगा।

    दोपहर करीब एक बजे कुलपति कार्यालय के सामने भारी तादाद में शिक्षकों, रेजिडेंट और कर्मचारियों ने एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन किया। केजीएमयू में शिक्षक संघ के महासचिव डॉ. संतोष कुमार ने कहा, यूजीसी का नया बिल कैंपस में जाति-आधारित भेदभाव को कम करने की बजाय बढ़ावा देगा।

    ऐसे में इसको सरकार को वापस लेना ही पड़ेगा, नहीं तो भविष्य में स्थिति गंभीर हो सकती है। ट्रामा सेंटर के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अमिय अग्रवाल ने कहा है कि यह बिल समझ के परे है। जो बिल पहले कांग्रेस सरकार लाना चाहती थी, यह उसी का एक स्वरूप है।

    इस कानून के तहत सामान्य वर्ग के व्यक्ति को नैसर्गिक न्याय का अधिकार नहीं दिया गया है। क्या यह मान लिया गया है कि सामान्य वर्ग के लोग अत्याचारी होते हैं? इस निर्णय को तत्काल वापस लेना होगा।

    वहीं, ट्रामा सर्जरी विभाग के प्रो. डॉ. समीर मिश्रा का कहना है कि नए बिल से तो यह स्पष्ट है कि सामान्य वर्ग के व्यक्ति को अत्याचारी मान लिया गया है। इस बिल में सामान्य वर्ग को कहीं जगह ही नहीं दी गई है।

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    यदि शिक्षण संस्थानों के लिए कोई कानून बनाना है तो ऐसी कमेटी में वहां के शिक्षक और कर्मचारियों को भी रखना चाहिए, तभी समानता की बात लागू हो पाएगी। डॉ. नवनीत चौहान ने आरोप लगया कि यह कानून विधि व तर्क संगत नहीं है।

    नए बिल के अनुसार, सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं को ही गलत मान लिया गया है। ऐसे कानून लागू होने से हमारे बच्चों का भविष्य खतरे में होगा। प्रो. विभा सिंह ने कहा है कि हम इस बिल का विरोध करते हैं और सरकार तत्काल वापस लेने की अपील करते हैं।

    ट्रामा सेंटर के पूर्व प्रभारी डॉ. संदीप तिवारी ने कहा कि जब समाज में समरसता आ रही है, तब इस तरह का नियम आया है, जो कतई उचित नहीं है। यह भेदभाव पैदा करने वाला है। हम सामान्य वर्ग से हैं, हमने कभी भी इलाज करते समय किसी की जाति और धर्म को नहीं देखा। ऐसे में सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ यूजीसी का नया नियम अस्वीकार है।