विश्व प्रवासी पक्षी दिवस विशेष: घटती हरियाली और बढ़ते प्रदूषण से प्रवासियों पक्षियों ने बनाई दूरी
लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान में प्रवासी पक्षियों की संख्या शहरीकरण, घटती हरियाली और प्रदूषण के कारण तेजी से घट रही है। ...और पढ़ें

HighLights
लखनऊ जू में 73 से सिमटकर 20-25 रह गईं प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां
आर्द्रभूमियों और हरित क्षेत्रों को संरक्षित करने से बच सकती हैं कई दुर्लभ प्रजातियां
गौरी त्रिवेदी, लखनऊ। एक समय था जब नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान और उसके आसपास का इलाका विदेशी परिंदों की चहचहाहट से आबाद था। झीलों, हरियाली और खुले आसमान के बीच दर्जनों प्रवासी पक्षी हजारों किलोमीटर का सफर तय कर लखनऊ प्राणि उद्यान पहुंचते थे, लेकिन अब तेजी से बढ़ते शहरीकरण, घटती हरियाली, सिकुड़ते जलाशयों और बढ़ते प्रदूषण ने इन परिंदों की दुनिया बदल ही दी है। कभी यहां करीब 73 प्रजातियों के प्रवासी व मुक्त विचरण करने वाले पक्षी बड़ी संख्या में दिखाई देते थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर करीब 20 से 25 प्रजातियों तक सिमट गई है। विश्व प्रवासी पक्षी दिवस के मौके पर इस तरह का बदलाव पर्यावरण के लिए गंभीर चेतावनी माना जा रहा है।
नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान के उपनिदेशक डॉ. उत्कर्ष शुक्ला ने बताया कि पहले लखनऊ और आसपास के क्षेत्रों में पर्याप्त प्राकृतिक जल स्रोत, पेड़-पौधे और शांत वातावरण हुआ करता था, जिससे साइबेरिया, मध्य एशिया और यूरोप के कई हिस्सों से पक्षी आकर यहां महीनों तक रुकते थे। कई पक्षी यहां घोंसले बनाते, अंडे देते और बच्चों को जन्म भी देते थे। बीते दो दशकों में तेजी से बढ़ती आबादी और निर्माण कार्यों ने उनके प्राकृतिक आवास को प्रभावित किया है।
डॉ. उत्कर्ष का कहना है कि अब भी कई पक्षी हर वर्ष अक्टूबर से फरवरी के बीच यहां पहुंचते हैं, लेकिन उनकी संख्या और प्रजातियों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इसके बावजूद चिड़ियाघर परिसर पक्षियों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थान बना हुआ है। यहां पेड़ों और जल स्रोतों को संरक्षित रखने, दाना-पानी की व्यवस्था करने तथा घायल पक्षियों के उपचार की व्यवस्था की जाती है। यही कारण है कि कुछ पक्षी हर साल लौटकर यहां आते हैं। प्रवासी पक्षियों की संख्या में गिरावट केवल पक्षियों का संकट नहीं बल्कि पर्यावरणीय असंतुलन का संकेत है। यदि समय रहते आर्द्रभूमियों और हरित क्षेत्रों को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में कई दुर्लभ प्रजातियां पूरी तरह गायब हो सकती हैं।
क्या होते हैं प्रवासी पक्षी?
प्रवासी पक्षी वे पक्षी होते हैं, जो मौसम, भोजन और प्रजनन की अनुकूल परिस्थितियों की तलाश में हर वर्ष हजारों किलोमीटर की यात्रा करते हैं। सर्दियों के मौसम में अत्यधिक ठंड से बचने और भोजन की उपलब्धता के कारण ये गर्म क्षेत्रों की ओर आते हैं। मौसम बदलने के बाद वे दोबारा अपने मूल स्थान लौट जाते हैं।
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कहां-कहां से आते हैं प्रवासी पक्षी?
मुख्य रूप से साइबेरिया, मंगोलिया, चीन, यूरोप, मध्य एशिया और हिमालयी क्षेत्रों से लखनऊ और उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में प्रवासी पक्षी आते हैं। इनमें कई जल पक्षी और दुर्लभ प्रजातियां शामिल होती हैं। जलवायु के अंतर होने के कारण साइबेरियन पक्षी हजारों किलोमीटर लंबी उड़ान भरकर भारत पहुंचते हैं, क्योंकि यहां भोजन आसानी से उपलब्ध हो जाता है।
लखनऊ जू में दिखने वाली प्रमुख प्रजातियां
लखनऊ जू परिसर में मोर, जांधिल, धूसर धनेश, गौरैया, हीरामन तोता, फाख्ता, उल्लू, बुलबुल, बगुला, शिकरा, टिटिहरी, हरियल, अबाबील, नीलकंठ, कठफोड़वा, मैना, पपीहा, चील, दयाल, भरद्वाज, मुनिया, शक्करखोरा सहित अन्य स्थानीय व प्रवासी पक्षी देखे जाते हैं। पहले इनकी विविधता और संख्या काफी अधिक थी, लेकिन अब कई प्रजातियां बहुत कम दिखाई देती हैं।