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1857 का संग्राम: जब राजा दिग्विजय सिंह के खौफ से अपनी छावनी छोड़कर भाग खड़े हुए थे अंग्रेज

Published: Sat, 15 Aug 2026 07:00 AM (IST)

राजा दिग्विजय सिंह ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, अंग्रेजों को मड़ियांव छावनी छोड़ने पर मजबूर किया। उन्होंने कई युद्धों में अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।


HighLights

  1. राजा दिग्विजय ने 1857 में मड़ियांव छावनी पर हमला कर अंग्रेजों को भगाया।

  2. उन्होंने चिनहट और रेजीडेंसी युद्धों में अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी।

  3. गद्दारी से गिरफ्तार होकर कालापानी की सजा मिली, सेलुलर जेल में निधन।

जागरण संवाददाता, लखनऊ। सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले राजा दिग्विजय ने मात्र 15 साल की उम्र में ही राजगद्दी संभाल ली थी। 27 वर्ष की उम्र में वह देश की आजादी के लिए उठी इस क्रांति में शामिल हो चुके थे। उनका इतना डर था कि अंग्रेज छावनी छोड़कर भाग गए थे।

देश को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद कराने में बहुत से ऐसे नायक रहे, जिन्होंने लड़ते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। इनमें राजा दिग्विजय सिंह का नाम भी इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज है। महोना तालुका के उमरिया गांव में राजा दिग्विजय सिंह का किला बना था। पत्नी राजरानी लखीमपुर के धौरहरा राजघराने से थीं, लेकिन उनके कोई संतान नहीं थी।

राजा के अधिकार में लखनऊ के कुर्सी तहसील में 45 गांव थे, लेकिन 1857 में बहुत से गांव पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया तो राजा ने उनके खिलाफ युद्ध की योजना बनानी शुरू की। 30 मई को मड़ियांव छावनी में हमला बोल दिया। कई अंग्रेज अफसरों के बंगले जला कर उनकी संपत्तियां जब्त कर लीं, जिसके बाद अंग्रेजों को रेजीडेंसी में कैद होने के लिए मजबूर होना पड़ गया था।

अंग्रेजों की बजा दी थी ईंट से ईंट 

राजा ने मड़ियांव छावनी में अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। उनकी दहशत की वजह से अंग्रेज छावनी छोड़ भाग निकले थे। मड़ियांव क्रांति के बाद चिनहट और रेजीडेंसी के युद्ध में राजा दिग्विजय सिंह ने अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी थी।

अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध जारी रखते हुए अपनी दो तोप और 400 लड़ाकों के साथ राजा ने लोहे वाले पुल पर मोर्चा संभालते हुए रेजीडेंसी पर गोलाबारी शुरू कर दी, जिसमें चीफ कमिश्रनर हेनरी लारेंस घायल हो गया था। कुछ समय बाद उसकी मौत हो गई। रेजीडेंसी में आज भी उस समय की कई तोपें रखी हैं। अवध की क्रांति में बख्शी का तालाब (बीकेटी) का भी नाम आता है। पहली दिसंबर को बीकेटी की लड़ाई में कई अंग्रेज अफसर घायल हो गए थे।

अंग्रेजों ने राजा को पकड़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नाकाम रहे। लड़ाई के दौरान दो दिसंबर को जब अंग्रेजों ने राजा के किले को अपने कब्जे में ले लिया तो वह घाघरा नदी पाकर कर बेगम हजरत महल से जा मिले। युद्ध करते हुए नेपाल चले गए, लेकिन 1865 में रसोइया शत्रोहन प्रसाद ने गद्दारी कर दी और अंग्रेजों ने राजा को सीतापुर से गिरफ्तार कर लिया।

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उनके खिलाफ मड़ियांव छावनी की क्रांति में अंग्रेज की हत्या, महोना थाने को फूंकने, टिकैतगंज बाजार पर हमला बोलने, यूरोपियन कैदियों की हत्या सहित कई मामलों में आपराधिक मुकदमे दर्ज किए गए। उन्हें 25 अक्टूबर 1865 में आजीवन कारावास के लिए कालापानी की सजा हुई। फिर 25 जनवरी 1877 में सेलुलर जेल में भेज दिया गया। सन 1906 में राजा की मौत हो गई।