सड़क निर्माण धांधली की जांच को लेकर हाई कोर्ट की टिप्पणी, भाजपा विधायक के प्रति अधिक उदारता के बिना हो जांच
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुलतानपुर सड़क चौड़ीकरण की जांच जारी रखने का निर्देश दिया, भाजपा विधायक के प्रति उदारता पर ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
सुलतानपुर सड़क जांच जारी, भाजपा विधायक को विशेष छूट नहीं।
राहुल गांधी की नागरिकता चुनौती याचिका वापस लेने पर खारिज।
बदायूं कमेटी की विशेष अपील हाई कोर्ट ने अस्वीकार की।
जागरण संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सुलतानपुर में सड़क चौड़ीकरण व सुदृढ़ीकरण कार्य से जुड़ी जांच को जारी रखने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि जांच निष्पक्ष और पूर्वाग्रह रहित तरीके से होनी चाहिए। जांच की प्रक्रिया भी ऐसी होनी चाहिए, जिससे उसकी निष्पक्षता को लेकर किसी तरह का संदेह पैदा न हो।
पीठ ने जांच के दौरान संबंधित भाजपा विधायक के प्रति दिखाई जा रही अत्यधिक उदारता पर भी आपत्ति जताई। न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की पीठ ने यह आदेश सिद्धार्थ इन्फ्राहाइट प्राइवेट लिमिटेड की ओर से दाखिल रिट याचिका पर दिया।
याचिका में सुलतानपुर के विरसिंहपुर-पापरघाट-शाहपुर हरवंश मार्ग के चौड़ीकरण व सुदृढ़ीकरण कार्य की जांच के लिए जारी 10 अप्रैल के पत्र को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता ने सुलतानपुर सदर के भाजपा विधायक राज प्रसाद उपाध्याय उर्फ राज बाबू को निर्माण कार्य में हस्तक्षेप से रोकने और स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने 28 जुलाई को मुख्य अभियंता, लोक निर्माण विभाग, लखनऊ की ओर से अधिशासी अभियंता, पीडब्ल्यूडी सुलतानपुर को भेजे गए पत्र का हवाला दिया। आरोप लगाया गया कि शिकायतकर्ता विधायक होने के कारण उन्हें जांच में अत्यधिक सम्मान दिया जा रहा है और जांच के प्रत्येक कदम की जानकारी दी जा रही है।
दोनों पत्रों का अवलोकन करने के बाद कोर्ट ने कहा कि जांच जारी रहनी चाहिए, लेकिन विधायक के प्रति अत्यधिक उदारता के बिना। जांच पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए, ताकि किसी भी स्तर पर संदेह की स्थिति न बने। इन टिप्पणियों के साथ कोर्ट ने याचिका का निस्तारण कर दिया।
अनुकूल आदेश न होना ही चुनौती का पर्याप्त आधार नहीं
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कमेटी आफ मैनेजमेंट, अंजुमन इशाअत-ए-तालीम मुसलमानान-ए-बदायूं को राहत देने से इन्कार करते हुए विशेष अपील खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने एकलपीठ के 15 जुलाई और 29 जुलाई के आदेशों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि परिस्थितियों के आधार पर अंतरिम आदेश पारित करना एकलपीठ के विवेकाधिकार में है। केवल आदेश अपीलकर्ता के अनुकूल नहीं होने के आधार पर उसे चुनौती देने का पर्याप्त आधार नहीं बनता।
एकलपीठ ने 15 जुलाई को मामले को 29 जुलाई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करते हुए सहायक रजिस्ट्रार कार्यालय की ओर से की गई कार्रवाई को याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन कर दिया था। इसके बाद 29 जुलाई को मामले की सुनवाई 10 सितंबर को नए सिरे से करने के लिए सूचीबद्ध कर दी गई।
अपीलकर्ताओं की ओर से कहा गया कि 29 जुलाई को सुनवाई स्थगित करने का आदेश उनके अधिवक्ता के अनुरोध पर नहीं हुआ था। यह भी तर्क दिया गया कि 15 जुलाई का अंतरिम आदेश प्रभावी राहत देने वाला नहीं था। सहायक रजिस्ट्रार के आदेश की प्रकृति को देखते हुए उस पर रोक लगाई जानी चाहिए थी।
साथ ही एकलपीठ के समक्ष लंबित स्थगन अर्जी के निस्तारण का निर्देश देने की मांग की गई। राज्य की ओर से अपील की पोषणीयता पर प्रारंभिक आपत्ति उठाई गई। कहा गया कि एकलपीठ के आदेश प्रक्रियात्मक प्रकृति के हैं, इसलिए इनके खिलाफ विशेष अपील पोषणीय नहीं है।
खंडपीठ ने आदेश पत्र का अवलोकन करते हुए कहा कि उसमें स्पष्ट रूप से दर्ज है कि 29 जुलाई को सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध अपीलकर्ताओं के अधिवक्ता की ओर से किया गया था। कोर्ट ने अपीलकर्ताओं के अनुपूरक हलफनामे को भी स्वीकार नहीं किया।
दोनों आदेशों में हस्तक्षेप से इनकार कर विशेष अपील का निस्तारण कर दिया। स्थगन अर्जी के निस्तारण के लिए एकलपीठ को निर्देश देने की मांग पर कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं को यह अनुरोध स्वयं एकलपीठ के समक्ष करना होगा। ऐसा अनुरोध किए जाने पर एकलपीठ उस पर उचित विचार करेगी।
राहुल गांधी की नागरिकता को चुनौती देने वाली याचिका वापस लेने पर खारिज
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कांग्रेस नेता व रायबरेली के सांसद राहुल गांधी की भारतीय नागरिकता को चुनौती देने वाली याचिका याचिकाकर्ता के वापस लेने के बाद खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अब्धेश कुमार चौधरी की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिकाकर्ता राहुल गांधी के ब्रिटिश नागरिक होने के आरोप के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज अदालत के समक्ष पेश नहीं कर सका।
अशोक पांडे व एक अन्य की ओर से दाखिल याचिका में राहुल गांधी के सांसद के रूप में बने रहने के अधिकार को चुनौती देते हुए क्वो वारंटो (आप किस अधिकार से इस पद पर काम कर रहे हैं?) जारी करने की मांग की गई थी। दावा किया गया था कि वह ब्रिटिश नागरिक हैं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि इसी मुद्दे पर 2015 और 2019 में भी याचिकाएं दाखिल की जा चुकी हैं। 2015 की याचिका हाई कोर्ट की समन्वय पीठ ने खारिज करते हुए कहा था कि नागरिकता संबंधी शिकायत के निस्तारण के लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 9(2) के तहत केंद्र सरकार के समक्ष जाना होगा। 2019 में भी केंद्र सरकार के समक्ष प्रतिनिधित्व करने की स्वतंत्रता दी गई थी।
वर्तमान याचिका में आरोप लगाया गया था कि राहुल गांधी ने 2003 में ब्रिटेन में पंजीकृत कंपनी बैकआप्स लिमिटेड में स्वयं को निदेशक और प्रमुख शेयरधारक बताते हुए ब्रिटिश नागरिक घोषित किया था। हालांकि कोर्ट के आधार पूछने पर याचिकाकर्ता कंपनी या ब्रिटेन के रजिस्ट्रार आफ कंपनीज के रिकार्ड अथवा ब्रिटिश नागरिकता संबंधी कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सका।
कोर्ट ने कहा कि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का पत्र भी आरोप प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके बाद याचिकाकर्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे स्वीकार करते हुए कोर्ट ने याचिका वापस लिए जाने के रूप में खारिज कर दी।
