नेपाल में बाढ़ से धार्मिक पर्यटन ठप, पशुपतिनाथ और लुंबिनी के श्रद्धालुओं की संख्या में भारी गिरावट
हादसों और बाढ़ के कारण नेपाल के धार्मिक पर्यटन पर गहरा असर पड़ा है। पशुपतिनाथ, मनोकामना और लुंबिनी जैसे प्रमुख स्थलों पर श्रद्धालुओं की संख्या में भारी गिरावट आई है।

HighLights
हादसों और बाढ़ से नेपाल का धार्मिक पर्यटन प्रभावित।
पशुपतिनाथ, मनोकामना में श्रद्धालुओं की संख्या घटी।
होटल, परिवहन, फूल-प्रसाद कारोबार को नुकसान।
विश्वदीपक त्रिपाठी, काठमांडू (नेपाल)। घंटियों की आवाज है, धूप-अगरबत्ती की सुगंध भी, मंदिरों के पट खुले हैं, लेकिन श्रद्धालुओं की वह चहल-पहल नहीं, जो कुछ दिन पहले तक नेपाल के प्रमुख तीर्थस्थलों की पहचान थी।
पशुपतिनाथ में भारतीय कांवड़ियों की लंबी कतारें अब याद बन गई हैं। मनोकामना मंदिर तक पहुंचाने वाली केबल कार में आधे यात्री रह गए हैं। लुंबिनी में बुद्ध की जन्मस्थली के दर्शन की आस लेकर आने वाले भारत और श्रीलंका के पर्यटकों ने यात्राएं टाल दी हैं।
नेपाल के मंदिरों में दीप जल रहे हैं, आरती हो रही है और श्रद्धालु भगवान के सामने शीश भी झुका रहे हैं, लेकिन जिन रास्तों से देश-विदेश के भक्त इन धामों तक पहुंचते थे, उन पर अभी भय और अविश्वास का साया है।
बाढ़ ने नेपाल के धार्मिक पर्यटन की रफ्तार थाम दी है। पशुपतिनाथ मंदिर के बाहर प्रसाद की दुकान लगाने वाले रमेश थापा की आंखें अब मंदिर के रास्ते पर लगी रहती हैं। उनका कहना है कि पहले रोजाना लगभग 600 भारतीय श्रद्धालु आते थे। अब 50 भी मुश्किल से पहुंच रहे। स्थानीय श्रद्धालु पूजा के लिए आ रहे हैं, लेकिन बाहर की रौनक गायब है।
फूल-माला बेचने वाले शमशेर गुरुंग के लिए यह कमी सीधे चूल्हे तक पहुंच गई है। पहले रोज करीब 15 हजार रुपये की बिक्री होती थी, अब दो हजार रुपये जुटाना भी मुश्किल हो रहा है। श्रद्धालु नहीं आ रहे तो सुबह सजाई गई फूल-मालाएं शाम तक मुरझा जा रही हैं।

मनोकामना में भी आस्था की यात्रा पर हादसे का असर साफ दिख रहा है। शनिवार को पोखरा की ओर से केवल 10 भारतीय श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचे। रविवार को भारत या किसी दूसरे देश से एक भी श्रद्धालु नहीं आया।
केबल कार से मंदिर पहुंचने वालों की संख्या आधी रह गई है। काठमांडू-मुग्लिन मार्ग दो स्थानों पर क्षतिग्रस्त होने से आवागमन प्रभावित है। पोखरा होकर जाने वाला रास्ता भी बंद है। इसका सीधा असर मुक्तिनाथ जाने वाले यात्रियों पर पड़ा है।
धार्मिक यात्रा का सबसे बड़ा संकट कैलाश मानसरोवर जाने वाले श्रद्धालुओं के सामने है। रसुवागढ़ी मार्ग पूरी तरह ठप है। इस रास्ते से गए कई पर्यटकों के हताहत होने की आशंका भी है। ऐसे में जिन श्रद्धालुओं ने महीनों पहले यात्रा की तैयारी की थी, उनके सामने अब दर्शन की अधूरी आस और यात्रा रोक देने की मजबूरी है।
भैरहवा के कस्टम अधीक्षक हरिहर पौडेल के अनुसार, बाढ़ से पहले रोज औसतन 1200 धार्मिक पर्यटक नेपाल पहुंचते थे। अब यह संख्या घटकर 400 से 500 रह गई है। यानी करीब 60 प्रतिशत कमी आई है। सोनौली से काठमांडू और लुंबिनी जाने वाली बसें भी यात्रियों के इंतजार में खाली चल रही हैं।
भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी की शांति अब सामान्य आध्यात्मिक शांति से अलग महसूस हो रही है। लुंबिनी होटल संघ के अध्यक्ष लीलामणि शर्मा तथा भैरहवा के होटल व्यवसायी चंद्र प्रकाश श्रेष्ठ और किशोर जोशी ने बताया कि हादसे के बाद भारत और श्रीलंका के कई पर्यटकों ने अपनी यात्राएं रद कर दी हैं। होटल, परिवहन और तीर्थस्थलों के आसपास का कारोबार इसका असर झेल रहा है।
नेपाल पर्यटन बोर्ड के अनुसार, धार्मिक पर्यटन से देश को सालाना करीब 12 हजार करोड़ रुपये की आय होती है। मौजूदा त्रासदी के कारण अगले दो महीने तक धार्मिक पर्यटन में करीब 40 प्रतिशत नुकसान का अनुमान है। यानी मंदिरों में कम होती भीड़ का असर केवल दर्शन और पूजा तक सीमित नहीं है।
इससे उन हजारों परिवारों की रोजी-रोटी भी जुड़ी है, जिनकी सुबह श्रद्धालुओं के आने से होती है और दिन उनकी पूजा सामग्री की बिक्री से चलता है। आस्था की यात्रा फिर कब पूरी रफ्तार पकड़ेगी, इसका इंतजार मंदिरों के साथ उन दुकानदारों को भी है, जिनकी आजीविका श्रद्धालुओं के कदमों से जुड़ी है।
