विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

दीवाली पर घर-घर घूमने वाली सोहन पापड़ी का अनाेखा इतिहास, 90 साल पहले छप्पर की झोपड़ी में हुई थी खोज

Published: Sun, 27 Sep 2026 06:50 PM (IST)

सोहन पापड़ी, जिसकी शुरुआत 90 साल पहले एक झोपड़ी से हुई थी, अब इंटरनेशनल ट्रेड शो तक पहुंच गई है।

News Article Hero Image

HighLights

  1. मैनपुरी की सोहन पापड़ी का 90 साल पुराना इतिहास।

  2. सेठ नारायण दास ने 1936 से पहले की थी शुरुआत।

  3. अब 'एक जिला, एक व्यंजन' में शामिल, इंटरनेशनल ट्रेड शो तक।

जागरण संवाददाता, मैनपुरी। मैनपुरी की पहचान सिर्फ क्रांतिकारी इतिहास, साहित्य और माटी से ही नहीं है। यहां की मिठास भी दूर तक अपनी पहचान बना रही है। फिर बात जब सोहन पापड़ी की हो, तो स्वाद की ऐसी तस्वीर सामने आती है, जिसका नाम लेते ही मुंह में मिठास घुलने लगती है।

महीन रेशों जैसी बनावट, घी की खुशबू और मुंह में जाते ही घुल जाने वाला स्वाद इसे अन्य मिठाइयों से अलग और खास पहचान देता है। यही कारण है कि नौ दशक पहले झोपड़ी के नीचे शुरू हुआ मिठास बांटने का सफर अब इंटरनेशनल ट्रेड शो तक अपनी धमक बना रहा है।

90 वर्ष से भी ज्यादा पुरानी सोहन पापड़ी की कहानी

नारायण मिष्ठान भंडार (एनएमबी) की स्वादिष्ट और मनभावन सोहन पापड़ी को प्रदेश सरकार द्वारा एक जिला, एक व्यंजन में मैनपुरी के अनोखे स्वाद के रूप में शामिल किया गया। भले जिले में मिठास की पहचान बनी हो, लेकिन इसके बनने तक की कहानी 90 वर्ष से भी ज्यादा पुरानी है।

सेठ नारायण दास ने 1936 से पहले सराफा बाजार में छप्पर की झोपड़ी से इसका निर्माण और बिक्री आरंभ की थी। गांव से मटकों में लाने वाले शुद्ध देशी घी, बेसन और मैदा के मिश्रण से तैयार वर्तमान सोहन पापड़ी तब पीली मिठाई के नाम से बिकती थी। पीढ़ियां बदलीं, स्वाद की पसंद बदली, बाजार का रंग भी बदला, लेकिन मिठाई की लोकप्रियता लगातार बढ़ती चली गई। अब इसे एक जिला, एक व्यंजन में भी स्थान मिल चुका है।

ऐसी मिठास- जिसमें घुला है हुनर और परंपरा

मैनपुरी आने वाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो, जिसने सोहन पापड़ी का स्वाद न चखा हो। बाहर से आने वाले लोगों के लिए यह मिठाई सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि मैनपुरी की यादों को साथ ले जाने का माध्यम भी बन गई है। किसी के हाथ में पैकेट बनकर यह रिश्तेदारों तक पहुंचती है तो किसी के सफर की मिठास बनकर दूसरे शहर जाती है।

sonpapdi

90 वर्ष की यह यात्रा बताती है कि किसी शहर की पहचान सिर्फ उसकी इमारतों और इतिहास से नहीं बनती, बल्कि उन स्वाद से भी बनती है, जिन्हें पीढ़ियां अपने साथ आगे ले जाती हैं। सोहन पापड़ी भी ऐसी ही मिठास है- जिसमें घुला है हुनर, परंपरा, अपनी मिट्टी की खुशबू और बुजुर्गों की दी हुई रेसिपी।

मेहनत के हाथों में गुंथता है आटा, तब बढ़ती मिठास

एनएमबी के संचालक रज्जन गुप्ता बताते हैं कि सोहन पापड़ी की खूबी सिर्फ उसकी मिठास में नहीं, बल्कि उसे तैयार करने की पारंपरिक कला में भी छिपी है। बेसन, मैदा, चीनी और देशी घी का संतुलित मेल इसके स्वाद को खास बनाता है। कारीगरों के हाथों की मेहनत से तैयार होने के बाद जब इसके महीन रेशे आकार लेते हैं तो मिठाई देखने में भी उतनी ही आकर्षक लगती है, जितनी खाने में।

स्वाद के सफर पर अब चौथी पीढ़ी की यात्रा

रज्जन बताते हैं कि सोहन पापड़ी की शुरुआत उनके दादा सेठ नारायण दास ने छोटी झोपड़ी से की थी। तब पीली बरफी या पीली मिठाई के नाम से यह बिकती थी। धीरे-धीरे मिठास की यात्रा आगे बढ़ी और उनके पिता हरिश्चंद्र ने इसके जायके को आगे बढ़ाया।

उनके बाद रज्जन गुप्ता ने सोहन पापड़ी को अपने बाबा सेठ नारायण दास के नाम से ही एनएमबी ब्रांड बनाकर लोगों के बीच प्रस्तुत किया। लोगों को स्वाद भाया और सोहन पापड़ी मैनपुरी की छोटी गली से दूसरे जिलों और प्रदेश तक पहुंच गई। वर्तमान में चौथी पीढी में अब रज्जन गुप्ता के पुत्र क्षितिज स्वरूप और पारस स्वरूप इसकी यात्रा को यादगार बनाने में जुट गए हैं।

यह भी पढ़ें- दीपावली से पहले तीन हजार लीटर सरसों का तेल, दो क्विंटल सोहन पापड़ी जब्त; जांच के ल‍िए भेजे गए 11 सैंपल

देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।