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मथुरा: 72 साल की तपस्या, रमेश बाबा पीछे छोड़ गए ब्रज सेवा का विराट संसार; अब उत्तराधिकारी होंगे ये

By Vineet Kumar Mishra Edited By: Prateek Gupta
Published: Wed, 07 Oct 2026 12:41 PM (IST)

संत रमेश बाबा ने 72 वर्षों की तपस्या से ब्रज में सेवा का विशाल संसार स्थापित किया, जिसमें गो-संरक्षण, यमुना ...और पढ़ें

पर्यावरण संरक्षण के लिए पहल करने वाले पद्मश्री रमेश बाबा। फाइल फोटो

पर्यावरण संरक्षण के लिए पहल करने वाले पद्मश्री रमेश बाबा। फाइल फोटो

विनीत मिश्र, मथुरा। संत रमेश बाबा...। ब्रज का वह नाम..जिसने मानगढ़ की एकांत गुफा में साधना की, तो मिसाल बनी। ब्रज की विरासत को संरक्षित करने की मुहिम चलाई, तो जन-जन की आवाज बनी। कान्हा और राधा के ब्रज को बचाने की यह एक संत की 72 वर्षों की तपस्या है। संत रमेश बाबा तो चले गए, लेकिन उनके पीछे सेवा का विराट संसार है।

अब उनकी सेवाओं के इस विराट संसार को उनके उत्तराधिकारी ब्रज शरण दास उर्फ राज बाबा विस्तार देंगे। रमेश बाबा मूलरूप से प्रयागराज के बलुआगंज के रहने वाले थे। पंडित बलदेव प्रसाद शुक्ल के घर उनका 1938 में जन्म हुआ। एकलौते बेटे थे और एक बड़ी बहन तारकेश्वरी देवी थीं। बचपन से ही उन्हें अध्यात्म में रुचि थी। पहली बार वर्ष 1953 में जगद्गुरु कृपालु जी महाराज के साथ बरसाना आए थे। फिर यहां मन बसा रहा।

कुछ दिन रहे और फिर लौट गए। लेकिन घर पर मन नहीं रमा। मां हेमेश्वरी देवी से लगाव था, बहुत हिम्मत कर परिवार का बंध छोड़ दिया। 1954 में बरसाना आए तो फिर लौटकर नहीं गए। वह बरसाना में ही मानपुर गांव में स्थित चौपाल पर ठहरे। फिर ठिकाना बना ब्रह्मांचल पर्वत का मान मंदिर। तब मान मंदिर जहान डाकू का अड्डा था। कई बार उसने बाबा को परेशान किया, लेकिन उन्होंने मंदिर नहीं छोड़ा।

वहीं रहकर एक गुफा में साधना की। फिर बाबा के कहने पर डाकू ही स्थान छोड़ गया। पहले बाबा राधारानी मंदिर में मृदंग बजाते थे। फिर ब्रज और यहां के लोगों से उनका लगाव बढ़ गया। इन 72 वर्षों में रमेश बाबा ने ब्रज में सेवा का विराट संसार बनाया। गहवरवन में पेड़ों की कटान और ब्रह्मांचल पर्वत के साथ ही राजस्थान की प्राचीन पहाड़ियों पर अवैध खनन हुआ तो 1990 में आंदोलन शुरू किया, अनशन पर बैठे।

उन पर हमला हुआ, पर डिगे नहीं। वर्ष 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने अवैध खनन रोकने का आदेश दिया। 2007 में बाबा ने गोसंरक्षण की पहल की, तो आज साठ हजार गाय उनकी गोशाला में हैं। 2011 में यमुना जल को प्रदूषण मुक्त कराने को प्रयागराज से दिल्ली तक पदयात्रा की, तो फिर यहां कई कारवां कई बार चला। ब्रज को न छोड़ने का संकल्प था, तो कहीं और नहीं गए।

मान मंदिर आश्रम में करीब डेढ़ सौ ऐसी गोपिकाएं रहती हैं, जिन्होंने कृष्ण और राधा-रानी को अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्हें बाबा ने संरक्षण दिया। वर्ष 1988 में ब्रज चौरासी कोस की राधारानी ब्रजयात्रा शुरू की। आज प्रतिवर्ष 20 हजार श्रद्धालु यात्रा करते हैं।

पूरी यात्रा में रहने और भोजन का प्रबंध बाबा की ओर से होता रहा। अपनी सेवा की इस विरासत को संभालने के लिए उन्होंने नौ मार्च 2024 को अपने उत्तराधिकारी के रूप में ब्रज शरण दास उर्फ राज बाबा का पट्टाभिषेक किया।

सबको अलग-अलग जिम्मेदारी

ब्रज शरण दास बाबा के उत्तराधिकारी हैं, लेकिन वह मान मंदिर की वर्तमान व्यवस्थाओं की कमान संभाल रहे हैं। माता जी गोशाला की व्यवस्था भी उन्हीं के कंधों पर है। मान मंदिर के सचिव सुनील सिंह राधारानी ब्रजयात्रा का संचालन करते हैं। मान मंदिर गुरुकुल में रहने वाले बच्चों की देखभाल राधाकांत शास्त्री करते हैं।

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