विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

6 साल तक बेड पर रहे आयुष, आज देश के लिए जीता गोल्ड तो माता-पिता की आंखों में छलके खुशी के आंसू

By Amit Tiwari Edited By: Praveen Vashishtha
Published: Wed, 21 Oct 2026 01:14 PM (IST)

Asian Para Games 2026: एशियन पैरा गेम्स में आयुष वर्मा ने स्वर्ण पदक जीतकर अपने परिवार के वर्षों के संघर्ष ...और पढ़ें

परिवार के साथ आयुष (बाएं)।

परिवार के साथ आयुष (बाएं)।

HighLights

  1. सड़क हादसे ने छीन ली थी चलने-फिरने की क्षमता।

  2. आयुष की जीत ने परिवार को दिया गर्व का अवसर।

जागरण संवाददाता, मेरठ। जिस बेटे को कभी माता-पिता को गोद में उठाना पड़ता था, जो अपने आप बैठ भी नहीं सकता था, जिसकी देखभाल के लिए परिवार को दिन-रात उसके पास रहना पड़ता था, आज उसी बेटे ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगे का मान बढ़ाया है।

एशियन पैरा गेम्स में आयुष वर्मा के स्वर्ण पदक जीतने की खबर ने मेरठ के ऋषि नगर स्थित चित्रकूट एन्क्लेव में रहने वाले उनके परिवार की वर्षों की पीड़ा को खुशी में बदल दिया है। बेटे की इस उपलब्धि पर पिता अनिल कुमार वर्मा की खुशी शब्दों में बयां नहीं हो रही। इस पल का इंतजार तो कई साल से था।

आयुष की सफलता सिर्फ एक स्वर्ण पदक की कहानी नहीं है। यह उस परिवार के संघर्ष, मां की ममता, पिता की चिंता, भाइयों के अथक सहयोग और उस हौसले की कहानी है, जिसने जिंदगी की सबसे कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा।

m8

आयुष के माता-पिता।  

एक हादसे ने बदल दी पूरी जिंदगी

अनिल कुमार वर्मा के अनुसार वर्ष 2014 में आयुष की जिंदगी में ऐसा हादसा हुआ, जिसने पूरे परिवार को झकझोर दिया। उस समय आयुष करीब 24 वर्ष के थे और नोएडा में सैमसंग कंपनी में नौकरी करते थे। वह बाइक से लौट रहे थे। इसी दौरान वाहन पर सामान रखने के लिए लगा कैरियर उखड़कर उनके ऊपर गिर गया।

हादसे में आयुष उछलकर डिवाइडर से जा टकराए। उनके साथ मौजूद बड़े भाई को भी गंभीर चोटें आईं। हादसे में आयुष के सिर में गंभीर चोट आई। सिर फट गया था और रीढ़ की हड्डी में चोट के कारण उनकी शारीरिक स्थिति बेहद नाजुक हो गई। हाथ में प्लेट और पैर में राड डालनी पड़ी।

पिता बताते हैं कि हादसे के समय आयुष का हीमोग्लोबिन घटकर ढाई रह गया था। परिवार के सामने बेटे की जान बचाने और उसे दोबारा सामान्य जीवन की ओर लाने की बड़ी चुनौती थी।

छह साल तक हर पल बेटे के साथ रहा परिवार

अनिल कुमार बताते हैं कि हादसे के बाद आयुष की हालत ऐसी थी कि वह न खुद बैठ सकते थे और न ही अपने आप करवट बदल पाते थे। खाना खिलाने से लेकर उठाने, सुलाने और दैनिक जरूरतों तक के लिए परिवार पर निर्भर रहना पड़ता था। करीब छह साल तक परिवार को उनकी 24 घंटे देखभाल करनी पड़ी। पिता की आवाज में उस दौर की बेबसी साफ झलकती है।

वह बताते हैं कि आयुष को खड़ा करने की कोशिश की जाती थी, लेकिन शुरुआत में कोई खास परिणाम नहीं मिलता था। लंबे समय तक बिस्तर पर रहने के कारण उनके शरीर पर गहरे घाव भी हो गए। घाव इतने गंभीर थे कि चिकित्सकों ने भी उनके ठीक होने को लेकर निराशा जताई थी।

ऐसे कठिन समय में आयुष की मां सीमा वर्मा ने हिम्मत नहीं हारी। वह खुद बेटे की देखभाल करती थीं। घावों की मरहम-पट्टी और देखभाल में उन्हें बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। हर दो घंटे में आयुष की करवट बदलनी पड़ती थी, फिर भी घाव हो गए।

मां ने अपने हाथों से बेटे के घावों की सिलाई तक की। जिस बेटे को कभी चलना सिखाने के सपने देखे थे, उसी की जान और सेहत बचाने के लिए मां हर दिन संघर्ष कर रही थीं।

यह भी पढ़ें- एशियन पैरा गेम्स में मेरठ के आयुष वर्मा का जलवा: शॉटपुट में जीता गोल्ड मेडल, एक दिन पहले जैवलिन थ्रो में मिला था कांस्य

फिजियोथेरेपी पर खर्च हुए लाखों, आज भी आर्थिक संकट

परिवार ने आयुष को दोबारा खड़ा करने और उनकी स्थिति में सुधार लाने के लिए इलाज से लेकर फिजियोथेरेपी तक हर संभव प्रयास किया। वर्ष 2014 से फिजियोथेरेपी शुरू हुई। पिता के अनुसार एक समय दिन में दो बार फिजियोथेरेपी करानी पड़ती थी और एक सत्र के लिए करीब 400 रुपये देने होते थे।

सादर में थाने के निकट एक छोटी-सी टेलरिंग की दुकान चलाने वाले अनिल कुमार वर्मा के लिए बेटे का इलाज कराना आसान नहीं था। आमदनी सीमित थी। परिवार ने आर्थिक तंगी के बीच इलाज जारी रखा। अनिल कुमार बताते हैं कि इलाज के लिए कई जगह जाना पड़ा और एक बार महाराष्ट्र भी गए। आज भी परिवार कर्ज के बोझ से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है।

पिता की चिंता केवल इलाज तक सीमित नहीं रही। उन्हें और उनकी पत्नी को हमेशा इस बात की फिक्र सताती थी कि उनके बाद आयुष की देखभाल कौन करेगा और उनका भविष्य कैसे सुरक्षित होगा। तीन बेटों वाले परिवार में आयुष की स्थिति को लेकर दोनों बड़े भाई भी परेशान रहते थे।

अनमोल वशिष्ठ ने दिखाई खेल की राह

आयुष की जिंदगी में बदलाव का रास्ता तब खुला जब परिवार की मुलाकात पैरा खिलाड़ी अनमोल वशिष्ठ और उनके पिता से हुई। अनिल कुमार बताते हैं कि एक बार परिवार आयुष के इलाज के लिए महाराष्ट्र जा रहा था। रेलवे स्टेशन पर अनमोल के पिता से मुलाकात हुई। उन्होंने आयुष के बारे में जानने के बाद खेल की दुनिया से जुड़ने का रास्ता सुझाया।

शुरुआत में आयुष व्हीलचेयर पर लोगों के सामने जाने से झिझकते थे। उन्हें लगता था कि लोग उन्हें देखकर क्या कहेंगे। हादसे ने उनके आत्मविश्वास को भी गहरी चोट पहुंचाई थी। ऐसे में अनमोल ने उन्हें समझाया कि वह अकेले नहीं हैं और दूसरे पैरा खिलाड़ी भी अपनी परिस्थितियों के बावजूद आगे बढ़ रहे हैं।

अनमोल कभी आयुष से मिलने घर आते, कभी उन्हें किसी कार्यक्रम में लेकर जाते। वहां दूसरे खिलाड़ियों को देखकर आयुष का आत्मविश्वास धीरे-धीरे बढ़ने लगा। खेल से जुड़ने के बाद उनके जीवन को एक नई दिशा मिली। परिवार के लिए यह बदलाव किसी नई उम्मीद से कम नहीं था।

मां आज भी बेटे को अकेला नहीं छोड़तीं

आयुष की उपलब्धि पर पूरा परिवार खुश है, लेकिन उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं। अनिल कुमार बताते हैं कि आयुष को आज भी लगातार देखभाल की जरूरत पड़ती है। दैनिक जरूरतों के लिए भी उन्हें परिवार के सहारे रहना पड़ता है।

मां सीमा वर्मा ज्यादातर समय बेटे के साथ रहती हैं। वह कहीं जाती भी हैं तो कुछ घंटों में लौटने की चिंता बनी रहती है। आयुष के बड़े भाई विजय वर्मा भी जरूरत पड़ने पर अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर उनके साथ रहते हैं। परिवार के अनुसार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए भी पहले से छुट्टी और देखभाल की व्यवस्था करनी पड़ती है।

पिता बताते हैं कि परिवार में हमेशा यही चिंता रहती थी कि आयुष का आगे क्या होगा। आज बेटे को देश के लिए स्वर्ण पदक जीतते देखना उनके लिए उस लंबे संघर्ष का सबसे भावुक पल है।

चिंता की जगह अब गर्व ने ली

बेटे की उपलब्धि पर अनिल कुमार वर्मा भावुक होकर कहते हैं कि भगवान का शुक्र है कि आयुष इस मुकाम तक पहुंचे। वर्षों तक बेटे की सेहत, इलाज और भविष्य को लेकर चिंता में रहने वाले पिता के लिए यह जीत एक नई उम्मीद लेकर आई है।

उनकी खुशी में उस पिता का सुकून है, जिसने बेटे को बिस्तर पर असहाय पड़े देखा, उसके इलाज के लिए आर्थिक मुश्किलें झेलीं और हर दिन उसके बेहतर होने की प्रार्थना की। आज वही बेटा अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता है।

आयुष की जीत ने परिवार को गर्व का ऐसा अवसर दिया है, जिसका इंतजार अनिल कुमार वर्मा को कई वर्षों से था। लेकिन इस पदक के पीछे सिर्फ खिलाड़ी की मेहनत नहीं, बल्कि माता-पिता की तपस्या, भाइयों का साथ और उस दोस्त की प्रेरणा भी है, जिसने मुश्किल दौर में आयुष को खेल की दुनिया से जोड़ने का रास्ता दिखाया।

देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।