मुरादाबाद का विकास 'राम भरोसे': MDA में एक अफसर के पास 3-3 कुर्सियां, आखिर जनता कब तक झेलेगी ये जुगाड़?
मुरादाबाद विकास प्राधिकरण (एमडीए) कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रहा है, जिससे विकास कार्य और जनसेवाएं प्रभावित हो रही हैं। तकनीकी व प्रशासनिक पदों के ...और पढ़ें

मुरादाबाद विकास प्राधिकरण
HighLights
संपत्ति और नक्शा स्वीकृति प्रक्रिया में बढ़ी मुश्किलें
एमडीए में एक अधिकारी पर कई पदों की जिम्मेदारी
जागरण संवाददाता, मुरादाबाद। एमडीए इन दिनों अफसरों और कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है। हालात ऐसे हो गए हैं कि प्राधिकरण का कामकाज ‘जुगाड़ सिस्टम’ के सहारे चलता नजर आ रहा है। तकनीकी और प्रशासनिक पदों पर लंबे समय से भर्ती न होने के कारण विकास योजनाएं प्रभावित हो रही हैं। जबकि आम जनता नक्शा पास कराने से लेकर संपत्ति संबंधी कार्यों के लिए महीनों चक्कर काटने को मजबूर है।
एमडीए में अधिकारियों की कमी का असर केवल दफ्तरों तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों रुपये की परियोजनाएं भी लटक गई हैं। कई विकास योजनाएं कागजों में ही सिमटकर रह गई हैं, जिससे शहर के विस्तार और आधारभूत सुविधाओं के विकास पर भी असर पड़ रहा है।एमडीए में संपत्ति विभाग की स्थिति सबसे अधिक प्रभावित हो रही है।
पहले इस विभाग की जिम्मेदारी डिप्टी सेक्रेटरी या अधिशासी अभियंता स्तर के अधिकारी संभालते थे, लेकिन वर्तमान में यह दायित्व अकाउंट अफसर के पास है। स्थिति यह है कि बैंक में जमा धनराशि को खातों में दर्शाने और रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी कराने के लिए लोगों को 15 से 30 दिनों तक प्राधिकरण के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। नक्शा स्वीकृति प्रक्रिया भी स्टाफ की कमी से प्रभावित है।
एमडीए ने दो सेवानिवृत्त सिविल एई और एक सेवानिवृत्त टाउन प्लानर को संविदा पर सलाहकार नियुक्त किया है, जो फाइल तैयार करते हैं। लेकिन अंतिम निर्णय प्रभारी टाउन प्लानर के हस्ताक्षर पर निर्भर होने के कारण फाइलें लंबित रहती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि संविदा पर तैनात अधिकारी प्रशासनिक निर्णय लेने में सीमित भूमिका निभाते हैं, जिससे जनता को राहत नहीं मिल रही है।
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एक अधिकारी पर तीन-तीन पदों का बोझ, योजनाएं ठप
एमडीए में प्रमुख तकनीकी पदों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। चीफ इंजीनियर, सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर और बिजली अधिशासी अभियंता के पद लंबे समय से खाली हैं। वर्तमान में अधिशासी अभियंता पंकज पांडे के पास ही सीई और एसई का अतिरिक्त चार्ज है। अधिकारियों की कमी का सीधा असर विकास योजनाओं पर पड़ रहा है।
करीब 22 साल बाद प्रस्तावित गोविंदपुरम टाउनशिप को रेरा से मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन 110 एकड़ की योजना में अभी तक करीब 100 एकड़ भूमि ही खरीदी जा सकी है। लगभग 500 करोड़ रुपये की इस परियोजना की बुकिंग शुरू नहीं हो पा रही है। इसके अलावा रामपुर रोड स्थित हनुमान मूर्ति, काशीपुर दोराहा और जीरो प्वाइंट के सुंदरीकरण का चार करोड़ रुपये का कार्य पिछले दो वर्षों से लंबित है।
इस परियोजना में पीडब्ल्यूडी की आपत्तियों के कारण काम शुरू नहीं हो सका है। वहीं, एकता विहार, कबीर नगर और रामपुर रोड क्षेत्र में जल निकासी की 24 करोड़ रुपये की परियोजना भी बजट होने के बावजूद शुरू नहीं हो सकी है। स्टाफ की कमी को पूरा करने के लिए एमडीए ने करीब एक वर्ष पहले एक निजी एजेंसी से अनुबंध किया था।
इस एजेंसी को हर महीने लगभग 13 लाख रुपये का भुगतान किया जा रहा है। अनुबंध के तहत एजेंसी के चार कर्मचारी कार्यालय में तैनात हैं, जिनका मुख्य कार्य एमडीए बोर्ड बैठकों की तैयारी बताया जाता है। हालांकि, कर्मचारियों के बीच चर्चा है कि एजेंसी के कर्मचारी दफ्तर-दफ्तर घूमते नजर आते हैं और उनकी भूमिका को लेकर स्पष्टता नहीं है। इससे प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं।
संविदा मेट कर्मचारियों की भूमिका पर उठ रहे सवाल
एमडीए में लगभग 120 संविदा मेट कर्मचारी कार्यरत हैं। आरोप है कि इन कर्मचारियों की भूमिका अवैध निर्माण पर कार्रवाई से अधिक नोटिस जारी करने और वसूली तक सीमित है। प्रशासनिक विशेषज्ञों और शहरवासियों का कहना है कि यदि एमडीए में स्थायी नियुक्तियां जल्द नहीं की गईं तो विकास योजनाएं और अधिक प्रभावित होंगी। तकनीकी पदों की शीघ्र भरपाई, स्पष्ट जिम्मेदारी तय करना और नक्शा व संपत्ति संबंधी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता लाना जरूरी है।
अधिकारियों की कमी है। लेकिन, शासन स्तर से भर्ती होनी है। यह शासन के संज्ञान में लाया जा चुका है। तैनाती होने की संभावना है। कुछ पदों पर संख्या भी बढ़ सकती है। एमडीए स्तर से जितने अधिकारी हैं, उसमें विकास कार्यों को कराया जा रहा है।
- पंकज वर्मा, सचिव, एमडीए