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राखी का धागा नहीं, जिंदगी की डोर: नोएडा में बहनों ने स्टेम सेल देकर भाइयों को दी नई जिंदगी

Published: Thu, 27 Aug 2026 05:30 AM (IST)

नोएडा के चाइल्ड पीजीआई में बहनों ने स्टेम सेल दान कर अपने गंभीर रूप से बीमार भाइयों को नई जिंदगी ...और पढ़ें

नोएडा में बहनों ने स्टेम सेल दान कर भाइयों को दिया जीवनदान।

नोएडा में बहनों ने स्टेम सेल दान कर भाइयों को दिया जीवनदान।

HighLights

  1. बहनों ने गंभीर बीमारियों से जूझते भाइयों को बचाया।

  2. चाइल्ड पीजीआई नोएडा में सफल स्टेम सेल ट्रांसप्लांट।

  3. रक्षाबंधन पर भाई-बहन के रिश्ते की अनूठी मिसाल।

जागरण संवाददाता, नोएडा। रक्षाबंधन पर बहन जब भाई की कलाई पर राखी बांधती है तो भाई उसकी रक्षा का वादा करता है, लेकिन नोएडा के चाइल्ड पीजीआई में इलाज के बाद स्वस्थ हुए इन भाइयों की कहानी इस रिश्ते का सबसे भावुक चेहरा सामने लाती है। बहनों ने भाई की कलाई पर राखी बांधने के साथ उसकी जिंदगी बचाने का वादा निभा दिया।

बीमारी से जूझते भाइयों को और माता-पिता की आंखों से हर दिन बेटे को खोने का डर झलकने लगा, तब बहनें उनके लिए उम्मीद बनकर खड़ी हुईं। गंभीर बीमारी से जूझते भाईयों को नई जिंदगी दी।

पीडियाट्रिक हेमेटोलाजी-आन्कोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. नीता राधाकृष्णन की निगरानी में इन बच्चों के स्टेम सेल ट्रांसप्लांट सफल हुए। चाइल्ड पीजीआइ के निदेशक डा. अरुण कुमार सिंह के अनुसार, ऐसे बच्चों में समय पर बीमारी की पहचान, उपयुक्त डोनर, ट्रांसप्लांट की सुविधा और लंबे समय तक फालोअप बेहद अहम हैं।

अहान की जिंदगी बचाने आगे आइ बहन त्रिशा

आठ साल का अहान चौहान आज स्कूल जाता है, खेलता है और दूसरे बच्चों की तरह जिंदगी जी रहा है। लेकिन कुछ साल पहले उसका बचपन अस्पताल के बिस्तर और ब्लड ट्रांसफ्यूजन के बीच सिमट गया था। पांच साल की उम्र में थैलेसीमिया मेजर ने उसके शरीर को इतना कमजोर कर दिया था।

खून चढ़ाने पर कुछ राहत मिलती। उसके बाद अगली बार खून चढ़ाने के लिए उसकी व्यवस्था करने की चिंता होने लगती। अहान पांच और बहन त्रिशा 12 वर्ष की थी। त्रिशा ने भाई को हौसले के साथ अपना स्टेम सेल देकर उसकी जिंदगी बचाई। 2023 में अहान का मैच्ड सिबलिंग डोनर ट्रांसप्लांट हुआ।

आज वह बिना नियमित ट्रांसफ्यूजन और दवाओं के सामान्य जीवन की ओर लौट चुका है। सेक्टर-73 में किराए के मकान में रहने वाले ई-रिक्शा चालक विक्रम चौहान और गृहिणी प्रीति चौहान के लिए बेटे की बीमारी ने जिंदगी की सारी प्राथमिकताएं बदल दी थीं।

बीमारी से छाया अंधेरा तो बहन रुकय्या बनी रोशनी

बी-सेल एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया से आमिर हमजा शुरूआती चरण में जूझ रहे थे। दिल्ली में उसका इलाज शुरू हुआ, लेकिन बीमारी ने बोन मैरो और मस्तिष्क को प्रभावित किया। हालत बिगड़ती गई और आंखों की रोशनी चली गई। मेरठ के नंगला गांव से कारपेंटर पिता मोहम्मद शमीम अपने पांच साल के बेटे को लेकर नोएडा पहुंचे।

एक तरफ कैंसर दोबारा लौट आया था, दूसरी तरफ बेटे की रोशनी चली गई थी। ट्रांसप्लांट से पहले गंभीर फंगल संक्रमण जैसी चुनौती भी सामने थी। तब आमिर की 12 वर्ष की बहन रुकय्या उनकी सबसे बडी उम्मीद बनीं। उन्होंने अपना स्टेम सेल दान किया। 2021 में आमिर का पूर्ण रूप से मेल खाने वाला सिबलिंग स्टेम सेल ट्रांसप्लांट सफल हुआ। आज वह दृष्टि सहायक उपकरणों की मदद से सामान्य जीवन की ओर बढ़ रहा है।

इलाज ने जवाब दिया तो बहन निधि बनी आखिरी उम्मीद

लकी उर्फ चिंटू जब गंभीर अप्लास्टिक एनीमिया से जूझ रहा था, तब उसके परिवार के सामने भी उम्मीद धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी थी। बीमारी ने उसके बोन मैरो को प्रभावित कर दिया था। शुरुआती स्टैंडर्ड इम्यूनोसप्रेसिव थेरेपी का भी अपेक्षित असर नहीं हुआ। करीब एक साल तक परिवार इलाज और डोनर की उम्मीद में रहा। उस समय लकी आठ साल का था और उसकी बहन निधि करीब पांच साल की।

पिता अनिल कश्यप निजी नौकरी करते हैं और परिवार नोएडा के सेक्टर-45 में किराए पर रहता है। परिवार के लिए इलाज की चिंता के साथ आर्थिक दबाव भी बड़ी चुनौती था। आखिरकार सरकारी फंडिंग मिलने के बाद 2021 में लकी का उसकी बहन से एलोजेनिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट किया गया। बहन ने अपने भाई के लिए वह किया जिसकी उम्मीद शायद परिवार ने सबसे मुश्किल दिनों में भी नहीं छोड़ी थी। अब लकी 14 साल का है और सामान्य जिंदगी जी रहा है।

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