विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

पीलीभीत में चौखट तक पहुंचे तेंदुए: गन्ने के खेतों में पानी भरा तो गांवों में बढ़ा खतरा, 12 फीट ऊंची फेंसिंग भी फेल

Published: Thu, 03 Sep 2026 11:00 PM (IST)

पीलीभीत में गन्ने के खेतों में पानी भरने से तेंदुए गांवों की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे ग्रामीणों में खतरा ...और पढ़ें

एआई जेनरेटेड इमेज है।

एआई जेनरेटेड इमेज है।

HighLights

  1. पीलीभीत में जंगल के आसपास गांवों में पालतू पशुओं को बना रहे शिकार

  2. बच्चों व बुजुर्गों पर खतरा बढ़ा, विचरण कर रहे एक दर्जन से ज्यादा तेंदुए

पीयूष दुबे, पीलीभीत। तेंदुआ...एकांतप्रिय और मूक शिकारी। ये बाघ के वर्चस्व के सामने जंगल छोड़ देते हैं। यदि सामने दूसरा तेंदुआ जा जाए तो रास्ता बदलकर चल देते हैं। इस स्वभाव ने इन्हें जंगल से सटे गांवों में ठिकाना तलाशने को मजबूर कर दिया। ग्रामीण भी सहअस्तित्व को स्वीकारने की स्थिति में आ चुके थे, मगर खतरा...।

खेतों में छिपे तेंदुए अब ग्रामीणों की चौखट तक पहुंचने लगे। पिछले सप्ताह सबलपुर रमपुरा गांव में विजय कुमार जिसे पालतू कुत्ते को टह रहे थे, तेंदुआ उसे खींच ले गया। कंजा हरैया गांव में किसान गुरुसेवक के आवासीय परिसर में बंधे कुत्ते का भी इसी तरह शिकार किया गया।

टाइगर रिजर्व व सामाजिक वानिकी के जंगल में दर्जनों तेंदुए हैं। इनकी आवाजाही बनी रहती है, मगर दो महीने से कई तेंदुए गांवों में अधिक दिखने लगे। ऐसा क्यों हुआ, इसके जवाब में वन्यजीव विशेषज्ञ तेंदुआ के स्वभाव-शिकार-संघर्ष को आधार बनाते हैं।

तेंदुए जंगल में अपना क्षेत्र तय कर पेड़ों पर खरोंच के निशान बना देते हैं। ऐसा होने पर दूसरा तेंदुआ उस क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करता, मगर बाघ आ जाए तो उसे क्षेत्र छोड़कर भागना पड़ता है। उस स्थिति तेंदुआ जंगल के बाहर ऊंची झाड़ियों या गन्ने के खेत में छिप जाता है।

जंगल में हिरण, जंगली सुअर आदि का शिकार मिल जाता, परंतु गांव के आसपास रहने के दौरान कुत्ते, बकरी, बंदर आदि को निवाला बनाना पड़ता है। दो महीने से तेंदुए गांवों में अधिक दिखने का कारण है कि वे जिन खेतों में छिपे रहते थे, उनमें वर्षा का पानी भरने से बाहर आना पड़ा।

छिपने के दौरान खेतों की ओर जाने वाले छोटे पशुओं का शिकार कर लेते थे, अब ऐसा करने के लिए गलियों में जाना पड़ रहा। वैसे, तेंदुए को भारी भरकम शिकार की जरूरत नहीं होती। उनके लिए प्रतिदिन एक-सवा किलो मांस ही पर्याप्त होता है।

इनसे मानव को कितना खतरा...? इस पर विशेषज्ञ कहते हैं कि यदि लंबे समय शिकार न मिले तो छोटे बच्चों पर हमला कर सकते हैं। तेंदुए वयस्क पुरुष-महिलाओं को देखते ही खुद रास्ता बदल देते हैं, हमला तो दूर की बात है।

सह अस्तित्व क्यों, पकड़कर जंगल में क्यों न छोड़ जाएं

वन अधिकारी बार-बार ग्रामीणों से कहते हैं कि सतर्कता के साथ तेंदुओं से सह अस्तित्व स्वीकार लें। रात में समूह बनाकर खेतों पर जाएं। तेंदुए रात से तड़के तक, यानी अंधेरे में शिकार करते हैं।

ग्रामीण ऐसा खतरा क्यों उठाएं, तेंदुओं को पकड़कर जंगल में क्यों न छोड़ा जाए...? इस सवाल पर वन अधिकारी कहते हैं कि तेंदुए प्रतिदिन 20-25 किमी विचरण करते हैं।

इन्हें कितनी बार जंगल में दोबारा भेजा जाए, परिस्थितिवश बार-बार बाहर आएंगे। टाइगर रिजर्व में 12 फीट ऊंची चेनलिंक फेंसिंग है। उससे भी तेंदुओं को रोका नहीं जा सकता, क्योंकि वे आसानी से छलांग लगाकर बाहर आ जाते हैं। पेड़ों पर चढ़कर दूसरी ओर कूद जाते हैं।

इन गांवों में अधिक खतरा

इस समय बहादुरगंज, धनकुनी, दियूरा, बहादुरपुर हुक्मी, पिपरिया दुलई, रूरिया में तेंदुओं के मूवमेंट अधिक होने पर छह पिंजरे लगाए गए हैं। बीसलपुर और पूरनपुर रेंज में भी तेंदुओं की चहलकदमी देखी जा चुकी। ग्रामीणों के अनुसार, क्षेत्र में एक दर्जन से ज्यादा तेंदुए घूम रहे हैं।

समाधान के करीब प्रशासन

तेंदुओं को बार-बार रेस्क्यू कर जंगल में छोड़ना फलीभूत नहीं होता। ऐसे में गोपालपुर के जंगल में तेंदुआ सफारी बनाई जा रही है। शासन ने इसके लिए 49 करोड़ रुपये का बजट दिया है। तेंदुआ सफारी के चारों ओर 15 फीट की दीवार बनाई जाएगी।

बीच में सुरंगनुमा रास्ता होगा, जिस पर सफारी वाहन चलाकर पर्यटकों को भ्रमण कराया जाएगा। गांवों में घूमने वाले तेंदुओं को इसी सफारी क्षेत्र में रेस्क्यू कर रखा जाएगा। उनकी भोजन चेन भी उपलब्ध कराई जाएगी।

यह भी पढ़ें- पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बारिश का कहर: रास्ते बंद, गिरे पेड़... फिर भी जान जोखिम में डालकर गश्त कर रहे वनकर्मी