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    शादी-शुदा को ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में रहने का अधिकार नहीं, इलाहाबाद HC हाई कोर्ट की एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी

    By Suresh pandey Edited By: Brijesh Srivastava
    Updated: Sat, 28 Mar 2026 08:24 PM (IST)

    इलाहाबाद हाई कोर्ट की एकलपीठ ने कहा है कि शादीशुदा व्यक्ति को तलाक लिए बिना ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में रहने का कानूनी अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि व्यक ...और पढ़ें

    इलाहाबाद उच्च न्यायालय की फाइल फोटो।

    इलाहाबाद उच्च न्यायालय की फाइल फोटो।

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    ‘पति या पत्नी को अपने जीवन साथी के साथ रहने का वैधानिक अधिकार है और उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर उस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है, लेकिन ऐसी मांग नहीं मानी जा सकती जो दूसरे पति या पत्नी के वैधानिक अधिकार का उल्लंघन करने वाली हो। इसलिए एक व्यक्ति की स्वतंत्रता, दूसरे व्यक्ति के कानूनी अधिकार का अतिक्रमण नहीं कर सकती।’
    - इलाहाबाद हाई कोर्ट

    विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। लिव इन रिलेशनशिप को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी सामने आई है। न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने कहा है कि यदि कोई पहले से विवाहित है और उनके पति/पत्नी जीवित हैं तो उन्हें अपने पूर्व पति/पत्नी से तलाक लिए बिना किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने की कानूनी अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्हें विवाह करने या अपने कानूनी विवाह से इतर लिव-इन रिलेशनशिप में प्रवेश करने से पहले पहले सक्षम न्यायालय से तलाक लेना होगा।

    आजमगढ़ की अनु व राहुल सिंह की याचिका निस्तारित

    आजमगढ़ के गंभीरपुर निवासी अनु तथा राहुल सिंह की याचिका निस्तारित करते हुए कोर्ट ने कहा, ‘विवाह या लिव-इन रिलेशनशिप में दो सहमति देने वाले वयस्क मनुष्य होने चाहिए। गोत्र, जाति और धर्म की अवधारणा बहुत पुरानी है। किसी को भी दो वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। यहां तक कि दो वयस्कों के माता-पिता भी उनके रिश्ते में हस्तक्षेप नहीं कर सकते, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार पूर्ण या असीमित अधिकार नहीं है, यह कुछ प्रतिबंधों द्वारा सीमित है। एक व्यक्ति की स्वतंत्रता वहां समाप्त हो जाती है जहां दूसरे व्यक्ति का वैधानिक अधिकार शुरू होता है।’

    याचीगण को परमादेश मांगने का अधिकार नहीं

    कोर्ट ने कहा, रिकार्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह दर्शाता हो कि याचीगण पति-पत्नी के रूप में रह रहे हैं अथवा उन्होंने तलाक लेने के बाद विवाह किया हो। यह स्थापित कानून है कि परमादेश रिट कानून के विपरीत या किसी वैधानिक प्रावधान, जिसमें दंडात्मक प्रावधान भी शामिल है, विफल करने के लिए जारी नहीं किया जा सकता। याचीगण को परमादेश मांगने का कोई कानूनी रूप से संरक्षित और न्यायिक रूप से लागू करने योग्य विद्यमान अधिकार नहीं है।

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    हाई कोर्ट ने कहा

    कोर्ट का कहना था कि दोनों पक्षों को सुनने के बाद वह याचीगण के पक्ष में परमादेश के रूप में कोई रिट, आदेश या निर्देश जारी करने के लिए इच्छुक नहीं है, जो सक्षम न्यायालय से तलाक की डिग्री प्राप्त किए बिना लिव-इन रिलेशनशिप में हैं। भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग और आशा देवी, भगवती पथवार और सोनम मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के आलोक में भी ऐसा नहीं किया जा सकता।

    परेशान करने व हिंसा की स्थिति में आवेदन कर सकते हैं

    कोर्ट ने कहा कि वैसे याची गण परेशान किए जाने अथवा किसी तरह की हिंसा की स्थिति में याची संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक/पुलिस अधीक्षक के समक्ष विस्तृत आवेदन/प्रतिनिधि प्रस्तुत कर सकते हैं। वह इसका सत्यापन कर जीवन और सुरक्षा के लिए कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करेंगे।

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