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Allahabad HC का बड़ा फैसला, कहा- परीक्षा में बैठने का अधिकार जीवन के अधिकार में शामिल

By Digital Desk Edited By: Brijesh Srivastava
Published: Mon, 19 Jan 2026 09:02 PM (IST)

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि परीक्षा में बैठने का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में शामिल ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि परीक्षा में उपस्थित होने का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि परीक्षा में उपस्थित होने का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है।

HighLights

  1. कहा- तकनीकी खामी के चलते विद्यार्थी का भविष्य खतरे में नहीं डाल सकते

  2. पोर्टल की गड़बड़ी के कारण वंचित बीएससी छात्रा के लिए विशेष परीक्षा कराने का आदेश

  3. प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) रावि प्रयागराज से संबद्ध पीजी कालेज की छात्रा ने याचिका दायर की 

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि परीक्षा में बैठने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए मानवीय गरिमा के साथ जीने के मूल अधिकार के समान है। कोर्ट ने कहा, किसी विद्यार्थी का भविष्य संस्था की ‘तकनीकी खामियों’ या प्रशासनिक सुस्ती के कारण खतरे में नहीं डाला जा सकता। यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति विवेक सरन की एकलपीठ ने बीएससी की छात्रा श्रेया पांडेय के लिए विशेष परीक्षा आयोजित करने का निर्देश दिया है। याची छात्रा को प्रवेश पत्र नहीं दिया गया, क्योंकि विश्वविद्यालय पोर्टल उसके प्रवेश संबंधी प्रविष्टि को अपडेट नहीं कर पाया था।

प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) राज्य विश्वविद्यालय प्रयागराज से संबंद्ध उर्मिला देवी पीजी कालेज, हंडिया में बीएससी (बायोलॉजी) प्रथम वर्ष की छात्रा श्रेया पांडेय ने याचिका दायर की है। उसने 16 जुलाई, 2025 को फीस जमा कर दी थी और शैक्षणिक सत्र 2025-2026 के लिए कक्षाओं में उपस्थित रहीं। हालांकि, जब परीक्षा कार्यक्रम प्रकाशित हुआ तो प्रवेश पत्र जारी नहीं मिला।

उसके रिकॉर्ड विश्वविद्यालय के समर्थ पोर्टल पर तय तारीख तक अपडेट नहीं थे। हालांकि आवेदन पोर्टल पर ड्राफ्ट स्वरूप में था। इस गलती के संबंध कालेज ने विश्वविद्यालय को प्रत्यावेदन दिया, जिसमें कहा गया कि याची सहित लगभग 30 छात्रों का रिकॉर्ड अपडेट नहीं हैं। इस पर 25 छात्रों का रिकॉर्ड अपडेट हो गया, लेकिन याची का रिकॉर्ड दोबारा अपडेट नहीं हुआ।

ऐसे में याची को परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं मिला, क्योंकि विश्वविद्यालय उसे प्रवेश पत्र जारी नहीं कर सका था। कोर्ट ने विश्वविद्यालय के रुख पर कड़ी आपत्ति जताई, क्योंकि अधिकारियों को रिकॉर्ड अपडेट न होने की पूरी जानकारी थी और डेटा ड्राफ्ट के रूप में मौजूद था। इसके बावजूद उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।

विश्वविद्यालय के वकील कोर्ट को यह बताने में विफल रहे कि जब ऐसी तकनीकी त्रुटियां उनके संज्ञान में आती हैं तो वे किस मानक प्रक्रिया का पालन करते हैं। कोर्ट ने राहुल पांडे बनाम यूनियन आफ इंडिया मामले में अपने हालिया आदेश पर भरोसा किया, जिसमें यह माना गया कि ‘संबंधित परीक्षा में शामिल होना भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत एक मौलिक अधिकार है।’ कोर्ट ने अंतरिम निर्देश जारी करते हुए कहा है कि विश्वविद्यालय आदेश के दो सप्ताह के भीतर शैक्षणिक सत्र 2025-2026 के लिए याची की बीएससी (बायोलॉजी) पहले सेमेस्टर की परीक्षा आयोजित करे और परिणाम उचित समय के भीतर प्रकाशित कराए ताकि याची आगे की पढ़ाई जारी रख सके।

कोर्ट ने कहा, ‘याची के रिकॉर्ड को उचित समय के भीतर अपडेट करने के लिए सभी उचित कदम उठाए जाएं ताकि उसका 'भविष्य' सुरक्षित हो सके।’ विश्वविद्यालय के वकील को याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है। मामले में अगली सुनवाई 10 फरवरी को होगी।

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