पटरी पर दौड़ती यादें, कानपुर और प्रयागराज के उस 'रेल सफर' की दास्तां...जिसने उत्तर भारत की बदल दी तकदीर
3 मार्च 1859 को इलाहाबाद से कानपुर के बीच पहली ट्रेन चली थी, जिसने उत्तर भारत में आधुनिकता की नींव रखी। 10 किमी प्रति घंटे की गति से चलने वाली इस मालग ...और पढ़ें

प्रयागराज-कानपुर के बीच पहली ट्रेन ने 10 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से सफर पूरा किया था।
HighLights
प्रयागराज-कानपुर के बीच 10 की रफ्तार से 160 किमी प्रति घंटे तक का सुहाना सफर
3 मार्च 1859 को इलाहाबाद से चलकर पहली मालगाड़ी 'पुराना कानपुर' स्टेशन पहुंची थी
10 किमी प्रति घंटे की गति से रेंगती पहली मालगाड़ी को देखने उमड़ पड़ी थी हजारों की रूप।
अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज। समय का पहिया जब पीछे की ओर घूमता है तो यादों के झरोखे से भाप के इंजनों की वह सीटी सुनाई देती है, जिसने 19वीं सदी के उत्तर भारत में आधुनिकता की नींव रखी थी। आज हम जिस बुलेट ट्रेन के लिए पटरियां बिछा रहे हैं और 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार वाली वंदे भारत की बात कर रहे हैं उसकी जड़ें वर्ष 1850 के उस दौर में छिपी हैं, जब 'लोहे के पथ' पर 'अग्नि रथ' का दौड़ना किसी चमत्कार से कम नहीं था।
जब इलाहाबाद से कानपुर की ओर बढ़ा पहला कदम
भारत में रेल का श्रीगणेश 16 अप्रैल 1853 को मुंबई से ठाणे के बीच हो चुका था, लेकिन उत्तर भारत की धरती को इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने के लिए थोड़ा इंतज़ार करना पड़ा। ईस्ट इंडिया कंपनी की नजरें प्रयागराज यानी तत्कालीन इलाहाबाद पर थी, क्योंकि उत्तर भारत पर शासन करने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण स्थान था। छावनी के अलावा अवध क्षेत्र पर शिकंजा कसने में यह इलाका सबसे अहम था। यहां पर तेजी से अंग्रेज आवागमन कर सके इसके लिए रेलवे लाइन का प्रस्ताव हुआ था। उस समय कानपुर भी बहुत ही महत्वपूर्ण था। अपनी सैन्य छावनी और उभरते उद्योगों के कारण सामरिक रूप से यह अंग्रेजों की पहली पसंद में था। वर्ष 1855 में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से कानपुर के बीच पटरियां बिछाने का काम शुरू हुआ।
आसान नहीं थी यह राह...
हालांकि, इतिहास के पन्ने बताते हैं कि यह राह आसान नहीं थी। वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की धधकती ज्वाला ने रेल परियोजनाओं की गति रोक दी। ठेकेदारों के विवाद और सामग्री की कमी ने भी रोड़े अटकाए। आखिरकार, तमाम बाधाओं को पार करते हुए 3 मार्च 1859 को वह ऐतिहासिक सवेरा आया, जब इलाहाबाद से पहली ट्रेन 'पुराना कानपुर' स्टेशन पहुंची।
10 किमी की चाल की पहली मालगाड़ी देखने को थी भीड़
रेलवे के पुराने पत्रत्राचार में इस बात का जिक्र है कि 10 किलोमीटर प्रति घंटे की कछुआ चाल से रेंगती उस पहली मालगाड़ी को देखने के लिए रेल लाइन के किनारे हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। अंग्रेज अफसरों के लिए उस कौतूहल भरी भीड़ को नियंत्रित करना किसी चुनौती से कम नहीं था।
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औद्योगिक क्रांति और रेल का विस्तार
1860 के दशक तक मुंबई एक बड़े औद्योगिक केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका था। कच्चे माल की मांग बढ़ी, तो रेलवे ने भी अपनी रफ्तार तेज की। इसी कड़ी में कानपुर से मुंबई तक 962 मील लंबी लाइन का जाल बिछाया गया और 1860 में कानपुर से मुंबई के लिए पहली ट्रेन रवाना हुई। लेकिन दिल्ली से हावड़ा के सीधे जुड़ाव में एक बड़ी बाधा थी यमुना नदी। बिना पुल के यह सफर अधूरा था। रेलवे इंजीनियरों के अथक प्रयास के बाद 15 अगस्त 1865 को यमुना पुल बनकर तैयार हुआ और इसी के साथ 1020 मील लंबा दिल्ली-हावड़ा रूट पूरी तरह क्रियाशील हो गया।
'पुराना कानपुर' स्टेशन: एक वास्तुकला का अजूबा
शुरुआती दौर में कानपुर से केवल मालगाड़ियां चलती थीं, इसलिए भव्य स्टेशनों की जरूरत महसूस नहीं हुई। लेकिन जब यात्री सेवाओं का विस्तार हुआ तो वर्ष 1883 में कानपुर में एक शानदार स्टेशन की रूपरेखा तैयार की गई। वर्ष 1885 में बनकर तैयार हुई यह इमारत अपनी 'डोम वास्तुकला' और भव्यता के लिए जानी गई। इस स्टेशन ने 47 वर्षों तक अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 1932 में 'कानपुर सेंट्रल' के अस्तित्व में आने के बाद इसे बंद कर दिया गया। वर्तमान में यह उत्तर मध्य रेलवे के अधिकारियों का प्रशिक्षण संस्थान है और वर्ष 2002 से एक 'हेरिटेज बिल्डिंग' के रूप में संरक्षित है। चर्चा है कि जल्द ही इसे एक भव्य रेलवे संग्रहालय में तब्दील किया जाएगा।
प्रयागराज की पुरानी बिल्डिंग भी अब हो रही खत्म
तत्कालीन इलाहाबाद रेलवे स्टेशन अब पहले जैसे नहीं रहा। सबकुछ बदल चुका है। हालांकि जो नींव रखी गई थी वह अभी है लेकिन जल्द ही वह भी बदल जाएगी। क्योंकि प्रयागराज जंक्शन का पुनर्विकास हो रहा है और इसके बाद यह स्टेशन पूरी तरह से आधुनिक बिल्डिंग में आकार ले लेगा। इलाहाबाद जंक्शन को उस समय 37 लाख रुपये में बनाया गया था। स्टेशन भवन की डिजाइन वास्तुकार नरीमन श्राफ ने बनाई थी । वर्तमान प्रयागराज रेलवे जंक्शन जो हम देखते हैं इसकीनींव 22 मार्च 1955 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरू ने खुद आकर रखी थी। इलाहाबाद उनका घर था ऐसे में इस स्टेशन से उनका विशेष लगाव भी था। स्टेशन भवन को बनने में पांच साल का समय लगा और वर्ष 1960-61 में यह बनकर तैयार हुआ।
ईस्ट इंडियन रेलवे से उत्तर मध्य रेलवे तक का सफर
रेलवे का यह सफर केवल पटरियों तक सीमित नहीं था, बल्कि प्रशासनिक बदलावों की भी एक लंबी कहानी है। 1952 से पहले यह पूरा क्षेत्र 'ईस्ट इंडियन रेलवे' के अधीन था। आजादी के बाद पुनर्गठन हुआ और यह 'उत्तर रेलवे' का हिस्सा बना। 1 अप्रैल 2003 को एक नया अध्याय जुड़ा, जब उत्तर मध्य रेलवे (NCR) की स्थापना हुई और प्रयागराज को इसका मुख्यालय बनाया गया।,
वर्तमान में रफ्तार और आधुनिकता का संगम
आज का इलाहाबाद मंडल, जो पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन से गाजियाबाद तक फैला है, भारतीय रेल की जीवनरेखा है। दैनिक आवाजाही को देखतें इस रूट पर आज यह भारत के सबसे व्यस्ततम रूट में शामिल है। रफ्तार का रोमांच भी इसी रूट पर है। पूरे भारत में सबसे तेज औसत गति से इसी रूट पर ट्रेन चलती है। जो सफर कभी 10 किमी प्रति घंटे से शुरू हुआ था, वह आज 130 किमी प्रति घंटे तक पहुंच चुका है।
भविष्य की तैयारी
रेलवे अब इस रूट की रफ्तार को 160 किमी प्रति घंटे तक ले जाने के लिए ट्रैक और उपकरणों को आधुनिक बना रहा है। प्रयागराज और कानपुर के बीच का यह रेल इतिहास केवल ईंटों और पटरियों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह उन संघर्षों और सपनों की कहानी है जिसने उत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ा। आज उस यात्रा को याद करने का दिन है, क्योंकि आज के ही दिन पहली ट्रेन प्रयागराज से कानपुर के बीच में चली थी। रेलवे इसे अपनी उपलब्धि की तौर पर देखता है।