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सावन में जब रामपुर रियासत में गूंजते थे नवाब के लिखे गीत, बेगम अख्तर की सुरीली आवाज और 20 साल पुराना वो मेला...

Updated: Thu, 13 Aug 2026 04:17 PM (IST)

"उमंग घटाएं घिर घिर आएं..." रामपुर के नवाब रजा अली खां खुद सावन के गीत लिखते और खड़ताल बजाते थे। बेगम अख्तर के सुरों से सजा 20 साल पुराना ऐतिहासिक 'सावनी मेला' और रियासत का दिलचस्प संगीत सफर पढ़ें।

नवाब रजा अली खां।

नवाब रजा अली खां।

HighLights

  1. नवाब रजा अली खां लिखते थे सावन के गीत, दरबार में गुनगुनाती थीं गायिकाएं

  2. पहले सावनी मेले का आयोजन करवाया था नवाब रजा अली खां ने

संवाद सहयोगी, रामपुर। रियासत काल में रामपुर में सावन को बहुत महत्व दिया जाता था। नवाब रजा अली खां सावन के गीत लिखते थे। उन्हें दरबार की गायिका गाती थीं। नवाब रजा अली खां ने रियासत की ओर से पहली बार नगर में सावनी मेले का आयोजन भी करवाया था। वक्त के साथ रामपुर रियासत का विलय हुआ तो सावनी मेले की परंपरा भी बंद हो गई।

नवाब रजा अली खां ने सावन पर कई गीत लिखे थे। जिनमें कुछ के बोल यूं हैं... सासुल सावनी लाई बाबुल हिंडोला गढ़ाओ, आहो बहनों मिल जुल के बनरे बनी को झुलाओ। सुंदर मुख चूरन धानी, झूलें पी संग टीका रानी। मोरा हिंडोला गढ़ा दो रे बाबुल, पहला सावन तुम्हरे आंगन। आओ सखी री तनिक पैंगे बढ़ाऐं, रानी को जरा झूला झुलाए। हां बढ़े पैंगें दुल्हन धीरे धीरे, नाजुक पवन कटारी कमल मुख चीरे। आज दुल्हन को झूला झुलायें, काली काली बदरी घिर घिर आएं।

नवाब रजा अली खां द्वारा लिखे गए सावन गीत रजा लाइब्रेरी में संग्रहित नफीस सिद्दीकी द्वारा रचित पुस्तक रामपुर दरबार का संगीत एवं नवाबी रस्में में भी शामिल हैं।

वहीं, दरबार का संगीत एवं नवाबी रस्में पुस्तक में रियासत काल में सावन माह की गतिविधियों का जिक्र किया गया है। जिसमें लिखा गया है कि कोठी शाहबाद स्थित शीशमहल में सावन में झूले पड़ जाते थे।

नवाब रजा अली खां के शासन काल में इस शीशमहल में मशहूर गायिका बेगम अख्तर ने सावनी गाई थी। जिसके बोल छा रही काली घटा, जिया मोरा लहराए है..। इसके अलावा बेगम माहपारा भी दरबार में गीत गाती थीं।

खड़ताल के माहिर थे नवाब रजा अली खां

अंतिम शासक के पौत्र व पूर्व मंत्री नवाब काजिम अली खां उर्फ नवेद मियां ने बताया कि नवाब रजा अली खां के दौरे हुकूमत में विभिन्न धार्मिक आयोजन होते थे। मेले भी इसी का हिस्सा थे। सावनी मेला भी लगाया जाता रहा, लेकिन यह परंपरा कब और क्यों खत्म हुई, इसकी जानकारी नहीं है।

भारतीय गणराज्य में विलय के बाद रियासतकालीन आयोजन बंद होना शुरू हो गए थे। भारतीय सांस्कृतिक निधि (इंटैक) रुहेलखंड चैप्टर के सह-संयोजक काशिफ खां बताते हैं कि अंतिम शासक नवाब रजा अली खां सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल हैं। वह खड़ताल के माहिर थे। हिंदी और ब्रज भाषा में शायरी करते थे। उन्होंने गीत भी लिखे थे। संगीत सागर की अहमियत है।

रियासत काल से धार्मिक सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए हुए थे कई काम

रियासत काल से ही धार्मिक सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए काम किए गए। रामपुर रियासत के अंतिम नवाब रजा अली खां ने खुसरो बाग में सावन माह में ही पहली बार रियासत की ओर से 11 दिवसीय सावनी मेले का आयोजन करवाया था। मेले में दूर-दराज से कलाकार और लोग शामिल हुए थे।

20 से 31 जुलाई 1931 तक इस मेले का आयोजन खुसरो बाग में किया गया था। जिसमें दूर दराज के गायक, नर्तक और अन्य लोक कलाओं से संबंधित कलाकार आए थे। कई दुकानें सजी थीं और लोगों को इस मेले में 11 दिन तक मनोरंजन के साथ शुरुआत में यह सावनी मेला खरीदारी का मौका मिला था।

तीन साल तक खुसरो बाग में आयोजित किया गया। इसके बाद इसे बेनजीर कोठी में शिफ्ट किया गया, जहां पर अगले करीब दो दशक तक इस मेले का आयोजन हुआ था। इससे पहले साल 1912 में भी रियासत काल में कोठी बेनजीर में सावनी पर कार्यक्रम का आयोजन हुआ था।

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