मजरूह सुलतानपुरी अपने घर में ही हो गए 'पराए', जयंती पर सुल्तानपुर प्रशासन और साहित्यकारों को नहीं आई याद
महान गीतकार मजरूह सुलतानपुरी की जयंती पर सुलतानपुर में प्रशासन या साहित्यकारों द्वारा कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया।

अपने घर में पराए हो गए मजरूह सुलतानपुरी।
HighLights
मजरूह सुलतानपुरी की जयंती पर सुलतानपुर में कोई कार्यक्रम नहीं।
प्रशासन और साहित्यकारों ने महान गीतकार को याद नहीं किया।
साहित्य प्रेमियों ने उनकी स्मृति में कार्यक्रम आयोजित करने की मांग की।
प्रदीप शर्मा, सुलतानपुर। शायरी के सम्राट और गीतकार मजरूह सुलतानपुरी ने कई दशक तक फिल्मी दुनिया में राज किया। पीपल झूमे मोरे आंगना ठंडी-ठंडी छांव रहे, चाहूंगा तुझे शाम सबेरे, जब दिल ही टूट गया, मैं अकेला चला था जानिब-ए-मंजिल मगर लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।
दशकों बीत जाने के बाद भी उनके रचे गीत आज भी लोगों की जुबां पर हैं। जिले का देश दुनिया में नाम रोशन करने वाले मजरूह को उनके जन्मदिन पर गुरुवार को उनकी याद में न तो प्रशासन की तरफ से और न ही साहित्यकारों और जनप्रतिनिधियों की तरफ से कोई कार्यक्रम आयोजित किया गया। ऐसे में ये कहना अनुचित नहीं होगा कि अपने ही घर में वो पराए हो गए।
एक अक्टूबर 1919 को कुड़वार के गजेहड़ी गांव में पैदा हुए मजरूह का असली नाम असरार उल हसन खान था। मदरसा में उन्होंने अरबी और फारसी की शिक्षा ली। इसके बाद लखनऊ से हिकमत (यूनानी मेडिसिन) की पढ़ाई की।
काफी समय तक उन्होंने शहर के पल्टन बाजार में मरीजों को दवाइयां भी दीं। वह वहीं गंगेव हाउस में निवास करते थे जो जहां पर आज एक गैस एजेंसी संचालित हो रही है। समाजसेवी जियाउल हसनैन बताते हैं कि वह सुबह के समय अक्सर गोमती नदी के किनारे घूमने जाते थे। शाम को गंगेव हाउस पर साहित्यकारों व कवियों का जमावड़ा लगता था। वहीं पर वो शायरी और गीत लिखा करते थे।

वह बताते हैं कि एक मुशायरे में मुंबई पहुंचे, जहां इनको सुनकर प्रोड्यूसर एआर. कारदार इतने प्रभावित हुए कि उनके गुरु जिगर मुरादाबादी के पास जाकर सिफारिश किया कि मजरूह हमारी फिल्मों के लिए गीत लिखें। उस समय मजरूह ने इंकार कर दिया था, लेकिन बाद में गीत व शायरी उन्हें प्रसिद्धि दिलाई।
सन् 1945 में ''चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे'' और 1946 में ''जब दिल ही टूट गया'' से मजरूह सुल्तानपुरी की खूब प्रसिद्धि हुई थी। 24 मई 2000 को अनंत मंजिल की ओर बढ़ चले। गीतकार के तौर पर उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1993 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
याद में केवल एक गेट
सुल्तानपुर-हलियापुर मार्ग पर गंजेहड़ी गांव के पास उनके नाम से एक गेट बनाया गया है पहले उनके नाम से एक विद्यालय जूनियर हाई-स्कूल चलाया जाता था, लेकिन अब वह भी बंद हो गया।
नहीं याद आए मजरूह
छोटे से छोटे कवि सम्मेलन में शिरकत कर सुर्खियां बटोरने वाले कवियों व शायरों को एक अक्टूबर मजरूह सुलतानपुरी का जन्मदिन याद नहीं रहा और न ही जिला प्रशासन की तरफ से उनकी याद में कोई कार्यक्रम आयोजित किया गया। कवि सम्मेलन एवं मुशायरे की कौन कहे शहर से लेकर उनके गांव गंजेहड़ी तक उनके चित्र पर किसी ने श्रद्धा के दो फूल भी नहीं चढ़ाए।
जिला प्रशासन को उनकी याद में आयोजित करना चाहिए कार्यक्रम
वरिष्ठ कवि डॉ. डीएम मिश्रा कहते हैं कि कुछ साल पहले तक मजरूह सुलतानपुरी की याद में उनके जन्मदिन व पुण्यतिथि पर जिला पंचायत सभागार में सरकारी आयोजन होता था। जिसमें कवि सम्मेलन, मुशायरा और परिचर्चा होती थी। जिसमें साहित्यकारों और कवियों को सम्मानित किया जाता था।
इसके अलावा साहित्यिक संगठन भी कार्यक्रम आयोजित करते थे। कई सालों से उनकी याद में कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जा रहा है। उनकी याद को जीवंत रखने के लिए जिला प्रशासन की तरफ से कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए।
देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।