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Bhagwati Charan Verma Jayanti 30 Aug: सफीपुर की धरती से निकले महान साहित्यकार, कानपुर से भी रहा गहरा रिश्ता

Published: Sat, 29 Aug 2026 09:52 PM (IST)

बाबू भगवती चरण वर्मा, सफीपुर के गौरव, हिंदी साहित्य के एक महान स्तंभ थे, जिनका जन्म 30 अगस्त 1903 को ...और पढ़ें

सफीपुर स्थित पार्क में लगी बाबू भगवती चरण वर्मा की प्रतिमा। जागरण

सफीपुर स्थित पार्क में लगी बाबू भगवती चरण वर्मा की प्रतिमा। जागरण       

HighLights

  1. बाबू भगवती चरण वर्मा का जन्म सफीपुर में हुआ था

  2. उनकी जयंती पर सफीपुर में विशेष आयोजन की तैयारियां

  3. साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता, राज्यसभा सदस्य भी रहे

संवाद सहयोगी, सफीपुर(उन्नाव)। उपन्यास सम्राट बाबू भगवती चरण वर्मा का हिंदी साहित्य में सर्वोच्च स्थान है। उनकी लेखनी ने कविता, कहानी, उपन्यास और नाटक सहित विभिन्न साहित्यिक विधाओं को समृद्ध किया। सफीपुर नगर को गौरवांवित करने वाले इस महान साहित्यकार का जन्म 30 अगस्त 1903 को यहां एक संभ्रांत कायस्थ परिवार में हुआ था।

नगर के साहित्य प्रेमियों ने उनकी स्मृति को संजोने के लिए अर्चना परिषद का गठन कर उनके नाम पर पार्क का निर्माण कराया है। इसी पार्क में नगरवासी प्रतिवर्ष उनका जन्मदिन धूमधाम से मनाते हैं। इस वर्ष भी आयोजन को लेकर तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। भगवती चरण वर्मा के पिता देवीचरण कानपुर में वकालत करते थे। दो संतानों के जन्म के बाद उनके जीवित न रहने पर लोगों की सलाह पर उन्होंने सफीपुर आकर वकालत शुरू की। यहीं उनकी तीसरी संतान के रूप में भगवती बाबू का जन्म हुआ।

करीब सात-आठ माह बाद उनके पिता दोबारा कानपुर लौट गए और वकालत करने लगे। पांच वर्ष की उम्र में भगवती बाबू का दाखिला कानपुर के पटकापुर स्थित पाठशाला में कराया गया। कक्षा तीन तक पढ़ाई के बाद उन्हें आर्य समाज स्कूल भेजा गया। कक्षा चार में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर उन्हें सीधे कक्षा छह में प्रवेश दिया गया, लेकिन गणित में कमजोर होने और शिक्षक की मार से उनकी मां ने स्कूल से नाम कटवा लिया।

इसके बाद उनका दाखिला थियोसोफिकल स्कूल में कराया गया। यहां शिक्षकों ने उन्हें ज्ञानवर्धक पत्रिकाएं पढ़ने के लिए प्रेरित किया। पत्रिकाओं के अध्ययन से उनके भीतर काव्य प्रतिभा विकसित हुई और कक्षा आठ में लिखी उनकी कविता एक मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुई। इसके बाद प्रभा, प्रताप, शारदा सहित तत्कालीन प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित होने लगीं।

उच्च शिक्षा प्रयागराज विश्वविद्यालय से साहित्य एवं विधि में स्नातक के रूप में पूरी की। उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं में रचनाएं कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की। गणेश शंकर विद्यार्थी के संरक्षण में उन्होंने समाचार पत्र 'प्रताप' में संपादन कार्य भी किया। इसके अलावा वह लंबे समय तक रेडियो से भी जुड़े रहे साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1961 में साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा 1969 में साहित्य वाचस्पति की उपाधि से सम्मानित किया गया।

वर्ष 1978 में वह राज्यसभा के लिए चुने गए। राज्यसभा की सदस्यता के दौरान ही पांच अक्टूबर 1981 को दिल्ली में उनका निधन हो गया। उनकी रचनाएं तत्कालीन सामाजिक विसंगतियों पर मार्मिक प्रहार करने के साथ ही समाज को नवयुग के सृजन की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं।