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'साधारण जूते, लेकिन आंखों में बड़े सपने'; 'चाय वाली बेटी' के फुटबॉलर बनने की कहानी आप में भी भर देगी जोश

By Digital Desk Edited By: Abhishek sharma
Updated: Wed, 25 Mar 2026 03:57 PM (IST)

वाराणसी की राष्ट्रीय फुटबॉलर अंजली भारद्वाज सुबह चाय बेचकर परिवार की आर्थिक मदद करती हैं और दिन में फुटबॉल के मैदान पर अपने सपनों को आकार देती हैं।

HighLights

  1. राष्ट्रीय फुटबॉलर अंजली भारद्वाज सुबह चाय बेचकर परिवार पालती हैं।

  2. आर्थिक तंगी के बावजूद फुटबॉल के मैदान में सपने जीती हैं।

  3. 50 से अधिक गोल कर राष्ट्रीय स्तर पर खेलना चाहती हैं।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। चाय तो बनारसी लोगों की नसों में बहती है, बहती है अड़ीबाजी की बतकही और अड़‍ियों से जुड़ती तमाम कड़‍ियां। यह कहानी है हौसले, जुनून और सपनों की, एक ऐसी लड़की की जो सुबह चाय बेचती है और दिन में फुटबॉल के मैदान में अपने सपनों को आकार देती है। बात हो रही है राष्ट्रीय फुटबॉलर अंजली भारद्वाज की।

सुबह के पाँच बजते ही उसकी दिनचर्या शुरू हो जाती है। डॉ भीमराव अंबेडकर क्रीड़ा संकुल बड़ा लालपुर के पास एक छोटी-सी दुकान, उबलती केतली, चाय की खुशबू और ग्राहकों की आवाज़ें, यही उसकी दुनिया है। वह अपने परिवार की आर्थिक मदद के लिए चाय बेचती है। स्कूल या अभ्यास से पहले यह काम उसकी मजबूरी भी है और जिम्मेदारी भी। ग्राहक उसे "चाय वाली बेटी" कहकर बुलाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यही लड़की कुछ घंटों बाद फुटबॉल के मैदान में तेज़ रफ्तार स्ट्राइकर बन जाती है।

चाय की केतली से निकलकर वह सीधे मैदान पहुँचती है। पैरों में साधारण जूते, लेकिन आँखों में बड़े सपने। मैदान पर उसका आत्मविश्वास देखने लायक होता है। कोच उप क्रीड़ा अधिकारी इरशाद अहमद कहते हैं कि उसमें असाधारण प्रतिभा है। संसाधनों की कमी के बावजूद उसका खेल हर दिन बेहतर होता जा रहा है। अब तक विभिन्न प्रतियोगिताओं में 50 से अधिक गोल कर चुकी है।

अंजली की कहानी केवल उसकी व्यक्तिगत यात्रा नहीं है, बल्कि यह उन लाखों बेटियों की कहानी है जो कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने सपनों की उड़ान भर रही हैं। आर्थिक तंगी, सीमित संसाधन और समाज की सोच जैसे कई बाधाओं के बावजूद, उसका सपना है — एक दिन राष्ट्रीय स्तर पर खेलना और अपने माता-पिता का नाम रोशन करना।

अंजली बताती है, "सुबह चाय बेचती हूँ ताकि शाम को अपने सपनों को जिंदा रख सकूँ। फुटबॉल ही मेरी पहचान है।" उसकी यह बात न केवल उसके हौसले को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि कैसे वह अपने सपनों को साकार करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है।

वह सिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, अगर हौसला मजबूत हो तो मंज़िल दूर नहीं। अंजली की मेहनत और समर्पण हमें यह संदेश देती है कि सपने देखने और उन्हें पूरा करने की ताकत हमारे अंदर होती है। अंजली भारद्वाज की कहानी हमें प्रेरित करती है कि हमें अपने सपनों के पीछे भागना चाहिए, चाहे रास्ते में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएं। उसकी यात्रा एक उदाहरण है कि कैसे एक साधारण जीवन में भी असाधारण उपलब्धियाँ हासिल की जा सकती हैं।