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वाराणसी में प्राइवेट अस्पतालों के परिसर में मेडिकल स्टोरों पर महंगी फिक्स्ड डोज काम्बिनेशन दवाएं बेचकर कमा रहे मुनाफा

By Shivam SinghEdited By: Abhishek sharma
Published: Tue, 22 Sep 2026 11:21 AM (IST)

वाराणसी के निजी अस्पतालों में महंगी फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन (FDC) दवाएं बेचकर मरीजों से मनमाना मुनाफा कमाया जा रहा है। ...और पढ़ें

वाराणसी के निजी अस्पतालों में एफडीसी दवाओं की आड़ में मरीजों से वसूली।

वाराणसी के निजी अस्पतालों में एफडीसी दवाओं की आड़ में मरीजों से वसूली।

HighLights

  1. निजी अस्पताल महंगी एफडीसी दवाएं बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं।

  2. डॉक्टर पर्चे पर ब्रांडेड दवाएं लिखते हैं, जो बाहर नहीं मिलतीं।

  3. मरीजों को मजबूरन अस्पताल स्टोर से ऊंचे दाम पर दवा खरीदनी पड़ती है।

शिवम सिंह, जागरण वाराणसी। प्राइवेट अस्पतालों के परिसर में संचालित मेडिकल स्टोरों पर महंगी फिक्स्ड डोज काम्बिनेशन (एफडीसी) दवाएं बेचकर मुनाफा कमाने का खेल अब भी जोरों पर है। मरीजों को बाध्य किया जा रहा है कि वे डाक्टर के पर्चे पर लिखी दवाएं सिर्फ अस्पताल के स्टोर से ही खरीदें।

शहर के कई प्राइवेट अस्पतालों में डाक्टर पर्चे पर दो-तीन दवाओं के मिश्रण वाली ब्रांडेड मल्टी-काम्बिनेशन दवाएं लिख रहे हैं, जो बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं। नतीजा यह है कि बाजार में 150 रुपये में मिलने वाली दवा अस्पताल स्टोर पर 350 से 400 रुपये तक वसूली जा रही है।

शहर के विभिन्न प्राइवेट अस्पतालों और उनके मेडिकल स्टोरों का जायजा लिया तो पता चला कि डाक्टर और स्टोर संचालकों के बीच सांठगांठ का आरोप आम है। मरीज जब बाहर की दुकान से दवा खरीदने जाते हैं तो स्टोर वाले या अस्पताल स्टाफ उन्हें रोकते हुए कहते हैं कि पर्चे पर लिखी दवा सिर्फ यहीं मिलेगी।

कई मरीजों ने बताया कि उन्हें बाहर भेजने से इन्कार कर दिया गया और कहा गया कि अस्पताल की जिम्मेदारी तभी पूरी होगी जब दवा यहीं से खरीदी जाए। रामनगर की मरीज मीरा देवी के तीमारदार राकेश सिंह ने बताया कि डॉक्टर ने तीन दवाओं का काम्बिनेशन लिखा। बाजार में पूछा तो कोई दुकानदार नहीं पहचान पाया। मजबूरी में अस्पताल स्टोर से 400 रुपये में खरीदनी पड़ी, जबकि जेनेरिक नाम से कहीं सस्ती मिल जाती। इसी तरह की शिकायतें कई परिवारों से मिलीं।

अस्पताल स्टोरों में बिक रही कुछ दवाओं पर एक नजर
प्रेगालीव एनटीएम (प्रीगेबालिन प्रोलान्ग्ड रिलीज, मिथाइलकोबालामिन और नार्ट्रिप्टिलाइन हाइड्रोक्लोराइड) जैसी मल्टी-काम्बिनेशन टैबलेट न्यूरोपैथिक दर्द के लिए लिखी जा रही है। कैल्सीक्विक-के-2 फोर्ट (कैल्शियम कार्बोनेट, कैल्सीट्राल, विटामिन के2-7, मैग्नीशियम और जिंक) भी ब्रांडेड काम्बिनेशन के रूप में उपलब्ध है।

इसी श्रेणी में जीरोडोल एसपी (एसिक्लोफेनाक, पैरासिटामाल, सेरेशियोपेप्टाइडेज) का एमआरपी 139 रुपये और न्यूरोबायोन अल्फा डी (अल्फा लिपोइक एसिड, पाइरिडाक्सिन, मिथाइलकोबालामिन, फोलिक एसिड और विटामिन डी-3) का एमआरपी 207 रुपये बताया जा रहा है। ये दवाएं अक्सर प्राइस कंट्रोल से बाहर होती हैं, इसलिए इनमें ज्यादा मार्जिन रखा जा सकता है।

बोले ज‍िम्‍मेदार
प्राइवेट अस्पताल में मल्टी-काम्बिनेशन दवाओं का इस्तेमाल इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि इनमें एकल दवाओं की तुलना में मुनाफा कहीं अधिक होता है। जेनेरिक नाम से लिखने पर मरीज सस्ती दवा बाजार से खरीद सकते हैं, लेकिन ब्रांडेड काम्बिनेशन लिखने से स्टोर का एकाधिकार बना रहता है। कई अस्पताल स्टोर डाक्टरों को कमीशन या अन्य सुविधाएं देते हैं, जिसके बदले में वे इन्हीं ब्रांडेड दवाओं को प्राथमिकता देते हैं। मरीजों की जेब पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। आम आदमी पहले से ही महंगी स्वास्थ्य सेवाओं से परेशान है। ऐसे में अस्पताल परिसर में ही महंगी दवा थोपना उनकी मजबूरी का फायदा उठाने जैसा है। - संजय सिंह, मंत्री, दवा विक्रेता समिति वाराणसी।

वाराणसी जैसे शहर में जहां प्राइवेट स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार तेजी से हो रहा है, वहां मरीजों के हितों की रक्षा के लिए सख्त निगरानी की जरूरत है। मल्टी-काम्बिनेशन दवाओं के नाम पर चल रहे इस मुनाफे के खेल को रोकने के लिए प्रशासन को सक्रिय होना होगा, वरना आम मरीज की जेब खाली होती रहेगी। - संदीप चतुर्वेदी, प्रदेश अध्यक्ष, केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट फेडरेशन उत्तर प्रदेश।
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निजी अस्पतालों और मेडिकल स्टोरों पर फिक्स्ड डोज काम्बिनेशन दवाओं की आड़ में मनमाना मुनाफा कमाने का खेल जारी है। डीसीजीआई द्वारा कई अतार्किक एफडीसी दवाओं पर प्रतिबंध के बावजूद लाइसेंस प्राप्त कई संचालक धड़ल्ले से बेचे जा रहे हैं। दवाओं व मेडिकल उपकरणों की वास्तविक निर्माण लागत और प्रिंट एमआरपी के बीच 2000 प्रतिशत से अधिक का भारी अंतर है। आम जनता को इस वित्तीय शोषण से बचाने के लिए नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथारिटी (एनपीपीए) से तुरंत पारदर्शी मूल्य निर्धारण नीति बनाने की मांग की गई है। - डा. अरविंद सिंह, पूर्व अध्यक्ष, आइएमए बनारस।

बोले अध‍िकारी
शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाती है, लेकिन ज्यादातर मामले सामने नहीं आ पाते क्योंकि मरीज डर या मजबूरी में चुप रह जाते हैं। - चंद्रेश द्विवेदी, ड्रग इंस्पेक्टर, जिला खाद्य एवं औषधि प्रशासन वाराणसी।