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गंगा के पलट प्रवाह से वरुणा में बाढ़, कोनिया क्षेत्र में नीचे बाढ़ और ऊपर जिंदगी तो कहीं नाव के सहारे कट रहे दिन

By Vns Arun Mishra Edited By: Abhishek sharma
Published: Fri, 04 Sep 2026 05:44 PM (IST)

वाराणसी के कोनिया क्षेत्र में गंगा के पलट प्रवाह से वरुणा नदी में आई बाढ़ ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया ...और पढ़ें

वाराणसी के कोनिया में बाढ़ का कहर, घरों में पानी और नावों पर निर्भर जिंदगी।

वाराणसी के कोनिया में बाढ़ का कहर, घरों में पानी और नावों पर निर्भर जिंदगी।

HighLights

  1. कोनिया में गंगा के पलट प्रवाह से वरुणा में बाढ़।

  2. घरों में 5-6 फीट पानी, लोग पहली मंजिल पर।

  3. सड़कें डूबीं, आवागमन के लिए नावों का सहारा।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। नाव धीरे-धीरे पानी को चीरती हुई आगे बढ़ती है। दोनों तरफ घर हैं, लेकिन उनके दरवाजे दिखाई नहीं दे रहे। पांच से छह फीट गहरे पानी ने गलियों और रास्तों को निगल लिया है। कहीं खिड़की से झांकता चेहरा है तो कहीं पहली मंजिल की बालकनी में खड़ी महिलाएं नीचे पानी का मंजर देख रही हैं। गैरेज में खड़ी कारें पानी में डूबी हैं और घरों की सीढ़ियां पानी के भीतर गायब हो चुकी हैं। जिस गली में रोज बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब नाव के चप्पुओं की आवाज सुनाई देती है।

एक नाव किनारे लगती है। कोई हाथ में दवा की पुड़िया लिए उतरता है, कोई राशन का थैला संभालता है। कुछ कदम चलने के बाद फिर सीढ़ियां हैं और ऊपर वही घर, जहां अब पूरी आबादी ने अपना ठिकाना बना लिया है। नीचे पांच-छह फीट पानी, ऊपर पहली मंजिल पर सिमटी जिंदगी और दोनों के बीच बेबसी की एक लंबी सीढ़ी, यही इस समय कोनिया की तस्वीर है।

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वरुणा में उफान के बाद तटवर्ती कोन‍िया क्षेत्र में पानी तेजी से फैल रहा है। - जागरण 

वार्ड 43 में कोनिया घाट से कोनिया पुल तक बाढ़ का पानी लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को निगल चुका है। दर्जनों घर पानी में डूबे हैं। घरों के निचले हिस्से में रखे पलंग, गद्दे, कपड़े, अनाज, बर्तन और दूसरे जरूरी सामान को लोग किसी तरह ऊपर पहुंचा रहे हैं। जिनके घरों में पहली मंजिल है, उनके लिए वही अब रसोई, कमरा और सुरक्षित ठिकाना है। पूरी आबादी पहली मंजिल पर रह रही है। जिनके पास यह सुविधा नहीं है, उनकी चिंता और ज्यादा है।

सड़क गायब, नाव बनी रास्ता
कोनिया घाट से कोनिया पुल तक आने-जाने के लिए फिलहाल दो नावें चल रही हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार 31 अगस्त से नावों का संचालन हो रहा है। नाविक मनोज, बाबू और विमल लोगों को पानी के बीच एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचा रहे हैं। नाव में बैठने वालों की जरूरतें अलग-अलग हैं, लेकिन परेशानी एक ही है। किसी को दवा लेने जाना है तो किसी को राशन लाना है। किसी को जरूरी काम से बाहर निकलना है तो किसी को रिश्तेदार का हाल जानना है। बाढ़ ने हर छोटे काम को भी नाव पर निर्भर कर दिया है।

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कोन‍िया क्षेत्र में कई मकानों का प्रथम तल आधा वरुणा की बाढ़ में डूबा हुआ है। - जागरण

गैरेज में गाड़ियां, घर में डूबी गृहस्थी
पानी की मार सिर्फ घरों तक सीमित नहीं है। कई गैरेज में खड़ी चार पहिया गाड़ियां भी पानी में डूब गई हैं। वाहन मालिक उन्हें निकाल नहीं पा रहे हैं। घरों में नीचे रखा सामान खराब हो रहा है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, फर्नीचर, कपड़े, खाद्य सामग्री और रोजमर्रा की चीजों को सुरक्षित रखने के लिए लोग पहली मंजिल का सहारा ले रहे हैं।

सबसे बड़ी दिक्कत महिलाओं और बुजुर्गों को है। पानी के बीच शौचालय तक पहुंचना, पीने का पानी जुटाना, खाना बनाना और बच्चों की जरूरतें पूरी करना चुनौती बन गया है। घर से बाहर निकलने के लिए हर बार पानी और नाव का सामना करना पड़ता है।

स्कूल खुले, बच्चे घरों में कैद
बाढ़ के बीच एक और चिंता बच्चों की पढ़ाई को लेकर है। स्कूल खुल गए हैं, लेकिन बच्चे घरों से निकल नहीं पा रहे हैं। अभिभावकों के सामने सवाल है कि पांच-छह फीट पानी के बीच बच्चों को स्कूल कैसे भेजें। पानी कम होने तक उनकी पढ़ाई प्रभावित होने की चिंता भी परिवारों को सता रही है।

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वरुणा के पास मकान बनवाने वाले लोगों के सामने अब बाढ़ व‍िकराल हो चली है। - जागरण

स्थानीय निवासी औतीक कुमार गुप्ता कहते हैं, अब परेशानी बढ़ती जा रही है। स्कूल खुले हैं, लेकिन बच्चे घर से निकल नहीं पा रहे हैं। सामान्य जिंदगी पूरी तरह रुक गई है।

'बसंता कालेज के पास बंधा बन जाता तो...'
बाढ़ की वजह और स्थायी समाधान को लेकर लोगों में नाराजगी भी है। इंदु गुप्ता कहती हैं, बसंता कॉलेज के पास बंधा बन जाता तो कोनिया में पानी नहीं आता। अगर समय रहते यह व्यवस्था हो जाती तो आज लोगों को इस तरह परेशानी नहीं झेलनी पड़ती।
उषा केशरी बताती हैं कि बाढ़ में समस्याएं कई स्तर पर बढ़ जाती हैं। घर से निकलना मुश्किल है। खाने-पीने का सामान लाने से लेकर दवा और दूसरी जरूरी चीजों तक के लिए परेशानी है। घर का सामान बचाना अलग चुनौती है। बच्चों और बुजुर्गों को लेकर परिवार ज्यादा चिंतित हैं।

सन्नाटे में पानी के घटने का इंतजार
शाम होते-होते कोनिया की गलियों में सन्नाटा और गहरा जाता है। पानी में डूबी सड़क पर आवाजाही थम जाती है। घरों की पहली मंजिलों और बालकनी से लोग नीचे पानी को देखते रहते हैं। किसी को पानी घटने का इंतजार है तो किसी को इस बात की चिंता कि अगर जलस्तर और बढ़ा तो परिवार को कहां ले जाएंगे।

कोनिया में बाढ़ ने सिर्फ रास्ते नहीं डुबोए हैं, उसने लोगों की पूरी दिनचर्या डुबो दी है। रोजगार, पढ़ाई, बाजार, आवागमन और गृहस्थी, सब कुछ पानी के भरोसे है। फिलहाल दो नावें इस डूबती जिंदगी की कड़ी बनी हुई हैं।

लोगों को तत्काल राहत के साथ स्थायी समाधान चाहिए। उनका कहना है कि हर साल बाढ़ आने पर राहत और नाव की व्यवस्था करने के बजाय जलनिकासी का स्थायी इंतजाम और बसंता कॉलेज के पास बंधे जैसी व्यवस्था की जाए, ताकि अगली बार कोनिया में घरों की पहली मंजिल जिंदगी का आखिरी सहारा न बने। नीचे पानी है, ऊपर परिवार हैं और दोनों के बीच सिर्फ एक सवाल, आखिर कब उतरेगा पानी और कब लौटेगी कोनिया की सामान्य जिंदगी?

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