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काशी विश्वनाथ धाम: गर्भगृह से बैकुंठ मंदिर तक हुई लेजर सेंसर से जांच, IIT मद्रास की टीम का सर्वे पूरा

By Jagran NewsEdited By: Shiv Govind Mishraa
Published: Sat, 07 Nov 2026 05:30 AM (IST)Updated: Sat, 07 Nov 2026 06:10 AM (IST)

आईआईटी मद्रास की टीम ने काशी विश्वनाथ मंदिर में पत्थरों के क्षरण और मजबूती के लिए सर्वेक्षण पूरा किया। टीम ...और पढ़ें

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

HighLights

  1. आईआईटी मद्रास टीम ने काशी विश्वनाथ मंदिर में पत्थरों का सर्वेक्षण किया।

  2. क्षरण रोकने और मजबूती जांचने के लिए मिट्टी, पत्थर के नमूने लिए।

  3. टीम 20 दिनों में मंदिर प्रशासन को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपेगी।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में पत्थरों का क्षरण रोकने और उनकी मजबूती बनाए रखने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन करने आई आइआइटी मद्रास की तकनीकी टीम अपना सर्वेक्षण पूरा कर शुक्रवार को चेन्नई लौट गई। डा. अरुण मेनन के नेतृत्व में आई टीम अपने साथ मंदिर परिसर के पत्थरों और आसपास की मिट्टी के आवश्यक नमूने (सैंपल) जांच के लिए साथ ले गई है।

प्रयोगशाला परीक्षणों और विस्तृत विश्लेषण के बाद टीम 20 दिनों में अपनी रिपोर्ट मंदिर प्रशासन को सौंपेगी।टीम में शामिल विशेषज्ञों ने अत्याधुनिक लेजर और सेंसर युक्त मशीनों के जरिये मंदिर के मुख्य गर्भगृह, दंडपाणि मंदिर और बैकुंठ मंदिर का गहन तकनीकी सर्वे किया। इस दौरान पत्थरों की भार वहन क्षमता, नमी का स्तर और जमीन की गहराई से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े दर्ज किए गए।

टीम न ली ये जानकारी

टीम ने मंदिर प्रशासन से पत्थरों की नियमित सफाई, रखरखाव और पूर्व में कराए गए स्वर्णमंडन की तकनीकी प्रक्रियाओं की जानकारी भी ली। अधिकारियों ने पत्थरों के संरक्षण और क्षरण रोकने के लिए किए गए प्रयासों के बारे में भी टीम को बताया। इस दौरान श्रीकाशी विद्वत परिषद के पदाधिकारी भी उपस्थित रहे। मंडलायुक्त एस. राजलिंगम ने बताया कि टीम 20 दिनों में रिपोर्ट के साथ लौटेगी।

इसमें मूल स्वरूप से छेड़छाड़ किए बिना पत्थरों के क्षरण के कारण जगह-जगह से ढीले हो रहे स्वर्ण पत्तर के स्थायी समाधान के साथ शिखर से गिरे स्वर्णमंडित कलश को पुनः सुरक्षित रूप से स्थापित करने की कार्ययोजना प्रस्तुत करेगी।आइआइटी मद्रास की टीम ने बीती 27 व 28 मई को प्राथमिक स्तर पर परीक्षण कर मंदिर के स्ट्रक्चर में लगे पत्थरों के विस्तृत तकनीकी परीक्षण और विश्लेषण का सुझाव दिया था।

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श्रीकाशी मंदिर का जीर्णोद्धार व निर्माण वर्ष 1777-1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने करवाया था। इसमें मुख्य रूप से विंध्य पर्वतमाला (मीरजापुर-चुनार बेल्ट) का गुलाबी बलुआ पत्थर इस्तेमाल किया गया है।

यह पत्थर नक्काशी के लिए अनुकूल होने के साथ ही काफी मजबूत होता है। 1835 में महाराजा रणजीत सिंह ने इसके शिखरों पर स्वर्ण पत्तर जड़वाए थे।

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