Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    श्रीहरि को समर्पित पुरुषोत्तम मास आज से, पूजा-अर्चन के साथ लगेगा मालपुआ का भोग; 15 जून तक रहेगा अधिक ज्येष्ठ मास

    Updated: Sun, 17 May 2026 06:30 AM (IST)

    ज्येष्ठ मास इस बार 60 दिन का है, जिसमें 17 मई से 15 जून तक अधिक ज्येष्ठ मास (पुरुषोत्तम मास) रहेगा। इस पवित्र मास में निष्काम भाव से किए गए व्रत और दा ...और पढ़ें

    News Article Hero Image
    timer icon

    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    जागरण संवाददाता, वाराणसी। ज्येष्ठ मास इस बार 60 दिन का है। इसमें शुद्ध कृष्ण पक्ष का शनिवार को समापन हो गया। अब 17 मई से अधिक ज्येष्ठ मास का शुक्ल पक्ष शुरू हो रहा है। इस अधिक मास का समापन 15 जून को अधिक ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अमावस्या को होगा। इसके बाद 16 जून से शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष आरंभ हो जाएगा। जिन दो अमावस्याओं के बीच सूर्य संक्रांति नहीं होती, उसे कोई नाम न मिल पाने से उसे अधिमास कहते हैं।

    काल गणना क्रम में यह स्थिति औसत मान से लगभग प्रत्येक तीसरे वर्ष में 32 महीने, 16 दिन और 1 घंटा 36 मिनट के अंतर से उत्पन्न होती है। अधिमास को अधिकमास, मलमास, मलिम्लुचमास व पुरुषोत्तममास आदि नामों से जाना जाता है। ख्यात ज्योतिषाचार्य पं. ऋषि द्विवेदी बताते हैं कि शास्त्रीय मान्यता अनुसार इस मास विशेष में निष्काम भाव से किए गए व्रत का अक्षय फल होता है।

    व्रती के संपूर्ण अनिष्ट हो जाते है नष्ट 

    व्रती के संपूर्ण अनिष्ट नष्ट हो जाते हैं। इसके विषय में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि इस मास का फलदाता, भोक्ता और अधिष्ठाता सब कुछ मै हूं। अतः इस महीने के कृत्य का अक्षय फल होता है। इस काल में ब्राह्मण व साधुओं सहित दीन-दुखियों की सेवा सर्वोत्तम सेवा है। इससे तीर्थस्नानादि समान फल होता है। अधिमास के मुख्य कृत्य रूप में 33 मालपुआ बनाकर भगवान विष्णु की 33 नामों से कांसे की थाली में अर्पित कर कांसे के पात्र में रखे घी के साथ दान से अनंत फल की प्राप्ति बताई गई है।

    खरीद बिक्री पर नहीं कोई रोककाशी विद्वत परिषद के संगठन मंत्री प्रो. विनय कुमार पांडेय के अनुसार अधिमास के 30 दिनों में क्या करना चाहिए या क्या नहीं करना चाहिए को लेकर शास्त्रों में स्पष्ट व्यवस्था है।

    क्या करना होगा शुभ?

    अधिमास में फल प्राप्ति की कामना से किए जाने वाले प्रायः सभी काम जैसे-प्रथम बार तीर्थयात्रा आरंभ, गृहारंभ, गृहप्रवेश, विवाहादि, कुएं, बावली, तालाब (बोरिंग) खोदना और उनकी प्रतिष्ठा करना, बाग आदि का आरंभ और प्रतिष्ठा, किसी व्रत का आरंभ और उद्यापन, जन्म के छह माह बाद होने वाले सभी संस्कार जैसे कर्णवेध, मुंडन, यज्ञोपवीत, समावर्तन, विवाह, वधुप्रवेश, द्विरागमन, पृथ्वी, तुला आदि के 16 महादान, सोमादि यज्ञ, अष्टका श्राद्ध, गोदान, प्रथम उपाकर्म, वेदारंभ, नियत कल में बालकों के न किए हुए संस्कार, देवप्रतिष्ठा, प्रथम बार की तीर्थयात्रा एवं देव दर्शन, संन्यास ग्रहण, अग्निपरिग्रह, राज्याभिषेक, प्रथम बार राजा का दर्शन, अभिषेक, प्रथम यात्रा वर्जित हैं। वहीं अलभ्य योगों के प्रयोग, अनावृष्टि के अवसर पर वर्षा हेतु विहित पुरश्चरण, ग्रहण कालिक स्नान, दान, श्राद्ध, और जपादि, पुत्र जन्म के कृत्य और पितृमरण के श्राद्धादि और गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण और अन्नप्राशन संस्कार, वस्त्र-आभूषण खरीद या धारण करना, फ्लैट-मकान, इलेक्ट्रानिक सामान, वाहन समेत नित्य उपयोग की वस्तुओं की खरीद और प्रथम बार उपयोग शुभ होता है।

    खबरें और भी