17 मई से 15 जून तक रहेगा पुरुषोत्तम मास, जान लें क्यों आता है यह विशेष महीना
हिन्दू पंचांग में चंद्र और सूर्य वर्ष के अंतर को संतुलित करने के लिए हर 32-33 महीने में अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) आता है। यह मास जप, दान और स्वाध्याय ...और पढ़ें

पुरुषोत्तम मास: जानें क्यों आता है यह विशेष महीना और इसका धार्मिक महत्व।
HighLights
चंद्र-सूर्य वर्ष के अंतर को संतुलित करता है अधिक मास।
हर 32-33 महीने में आता है, जैसे 2026 में अधिक ज्येष्ठ।
जप, दान, स्वाध्याय के लिए पुरुषोत्तम मास का विशेष महत्व।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। हमारा हिन्दू पंचांग मुख्यतः चंद्रमा की गति पर आधारित है। एक चंद्रमास अमावस्या से अगली अमावस्या तक होता है, जिसकी अवधि लगभग 29.5 दिन होती है। इस प्रकार 12 चंद्रमास मिलकर 354 दिन बनाते हैं, लेकिन समस्या यह है कि पृथ्वी को सूर्य का चक्कर पूरा करने में लगभग 365 दिन लगते हैं। यानी सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष में लगभग 11 दिन का अंतर बन जाता है, जो आगे चलकर बड़ा बन जाता है।
यदि यह अंतर ठीक नहीं किया जाए तो धीरे-धीरे ऋतु और त्योहार बदलने लगेंगे। कुछ वर्षों बाद जैसे होली गर्मी में आने लगेगी और दिवाली वर्षा ऋतु में। इसीलिए भारतीय पंचांग समय को संतुलित रखता है।
अब समझते हैं "संक्रांति"। जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, उसे संक्रांति कहते हैं, जैसे मेष संक्रांति, सिंह संक्रांति आदि। इससे हिंदू महीनों का क्रम तय होता है।
अधिक मास कब बनता है? कभी-कभी ऐसा होता है कि एक अमावस्या से अगले अमावस्या तक पूरा चंद्र मास बीत जाता है, लेकिन उस दौरान सूर्य किसी नई राशि में प्रवेश नहीं करता है। यानी उस महीने में कोई संक्रांति नहीं होती है। तब जोड़ा जाता है अधिक मास। जिस चंद्र मास में कोई संक्रांति नहीं होती, उसे "अधिक मास" कहा जाता है, जैसे अधिक श्रावण, अधिक ज्येष्ठ आदि।
यह लगभग हर 32/33 महीने में क्यों आता है? हर वर्ष लगभग 11 दिन का अंतर जुड़ा रहता है। जब यह अंतर लगभग पूरे एक महीने जितना हो जाता है, तब अधिक मास जोड़ा जाता है। 30/11= 2.7 वर्ष= 32/33 महीने।
2026 में अधिक ज्येष्ठ मास आने वाला है। पंचांग परंपरा के मुताबिक तिथि में थोड़ा अंतर हो सकता है। अधिक मास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है क्योंकि भगवान विष्णु ने इस मास को अपना स्वरूप प्रदान किया है। जप, दान, स्वाध्य इस मास में बहुत महत्वपूर्ण माना गया है।
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हमारा हिन्दू धर्म केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि ग्रह, ऋतु और प्रकृति का गहरा ज्ञाता भी है। इस प्रकार, पुरुषोत्तम मास का महत्व न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से है, बल्कि यह हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं को भी प्रभावित करता है। मान्यता है कि इस मास में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ सकते हैं।