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अडिग संकल्पों की परंपरा पर खड़ी रामनगर की मुक्‍ताकाशीय मंच वाली रामलीला

By Pramod Kumar Edited By: Abhishek sharma
Published: Fri, 18 Sep 2026 04:22 PM (IST)

वाराणसी की रामनगर रामलीला 225 साल पुरानी परंपराओं को सहेजे हुए एक अद्वितीय अनुष्ठान है। यह बिना बिजली और ध्वनि ...और पढ़ें

रामनगर रामलीला: वाराणसी की 225 साल पुरानी अद्भुत परंपरा और अनुष्ठान।

रामनगर रामलीला: वाराणसी की 225 साल पुरानी अद्भुत परंपरा और अनुष्ठान।

HighLights

  1. 225 साल पुरानी परंपराओं का पालन करती है रामनगर रामलीला।

  2. बिना बिजली, ध्वनि विस्तारक के होता है अद्भुत रामलीला मंचन।

  3. अनंत चतुर्दशी से शुरू होकर 31 लीलाओं का मंचन होता है।

प्रमोद यादव, जागरण, वाराणसी। रामजी की लीला तो देश-दुनिया में हर कहीं होती है, लेकिन रामनगर की रामलीला का अलग ही वैशिष्ट्य है। इसका संकल्प वाक्य- ‘यत कृत्वा चाथ दृष्टवा हि मुच्यते पात कैर्नरे’ अर्थात् इसके करने और देखने से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। इस कारण ही यह अभिनय की बजाय अनुष्ठान कहा जाता है।

लीक से न डिगने का ग्रह सहेजे इस रामलीला में आज भी सवा दो सौ साल पहले आरंभ काल की परंपरा को यथावत स्थिति में पाएंगे। अनंत चतुर्दशी से शुरू होने जा रही रामनगर की रामलीला का वैशिष्ट्य क‍िसी भी मायने में आज तक कम नहीं हुआ है। 

काशी के दक्षिण-पूर्वी छोर पर गंगा के दूसरे किनारे एक उपकाशी बसती है जिसका आधार देवाधिदेव महादेव नहीं अवधेश प्रभु श्रीराम हैं। इसे रामनगर कहते हैं, काशी का रामनगर। यहां गंगा तट पर स्थापित विशाल दुर्ग से ही कभी काशी संचालित होती थी। यहां की रामलीला का कोई क्रमबद्ध इतिहास तो नहीं मिलता लेकिन कई किवदंतियों के आधार पर कहा जाता है उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में तत्कालीन काशिराज (सन् 1796-1835) महाराज उदित नारायण सिंह ने इसका शुभारंभ कराया।

उन्होंने उस समय एक लाख रुपये खर्च कर चित्रमय भावपूर्ण रामचरितमानस का चित्रण कराया। अंग्रेज अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने 1830 में मुद्रित अपनी पुस्तक न्यूज आफ बनारस में रामनगर की रामलीला का आंखों देखा वर्णन किया। उसमें रामलीला का एक शिलाचित्र भी प्रकाशित कराया। महाराजा उदित नारायण के शासन काल में कुछ लीलाएं रामनगर दुर्ग और कुछ वहां स्थित अयोध्या स्थल पर होती थीं।

महाराज ईश्वरी नारायण सिंह (1835-1898) ने रामलीला को वर्तमान स्वरूप में परिवर्तित व परिवर्धित किया। गोस्वामी तुलसीदास कृत रामायण के आधार पर रामलीला कराने के लिए अपने गुरु काष्ठ जिह्वा स्वामी से शोधन कराया। उनके द्वारा पिरोये गए शब्दों की माला रामलीला के संवादों के रूप में परिणित हुई। शायद ही कोई ऐसा मंचन अपने मूल स्वरूप में इतना दीर्घजीवी रहा हो।

चुप रहो सावधान की एक आवाज कई हजार भीड़ को आज भी इस लीला में नियंत्रित करती है। कृत्रिमता इस अद्भुत लीला से दूर है। न तो यहां रोशनी के लिए बिजली का इस्तेमाल होता है और न ही पात्रों के संवाद के दौरान ध्वनि विस्तारक का प्रयोग। इसके बाद भी बोले जाने वाले संवाद नेमी-प्रेमी के दिलों में उतर जाते हैं।

कुछ संवाद तो इतने सरल, मार्मिक, प्रचलित हैं कि बहुतायत की जुबान पर छाए रहते हैं। राम लीला का मंचन स्थल रामनगर दुर्ग से लेकर चार किलोमीटर दूर लंका तक विस्तारित-प्रसारित है। विभिन्न स्थानों पर अयोध्या, जनकपुर, पंचवटी, लंका, चित्रकूट, निषादराज आश्रम, अशोक वाटिका, सनक सनंदन

रामबाग आदि स्थान हैं जहां रामचिरत मानस में वर्णित घटनाक्रम अनुसार लीलाएं मंचित की जाती हैं। इनका दिशा-दूरी अनुपात अनुसार शोधन काष्ठ जिह्वा स्वामी के नेतृत्व में सप्तर्षि विद्वत मंडल ने किया। परिणाम ये स्थान आज रामलीला में वर्णित स्थानों के नाम से जाने जाते हैं।

महाराज ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह ने काशी, मिथिला व अयोध्या के रामायणविदों से रामचरितमानस का शोधन करा कर शुभारंभ तिथि और कौन सी लीला कितने दिन किस स्थान पर हो आदि का निर्धारण कराया।तद्नुसार रामलीला का शुभारंभ भाद्रपद (भादो) मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि में अनंत चतुर्दशी पर क्षीरसागर का रूप लिए रामबाग से होता है।

स्वरूप चयन से प्रशिक्षण तक अनुशासन
लीला की तैयारी लगभग चार माह पहले रथयात्रा के बाद पड़ने वाले रविवार को स्वरूप चयन प्रक्रिया आरंभ कर हो जाती है। रामलीला के सभी पात्र ब्राह्मण होते हैं। केवल रावण की सेना में सबकी भागीदारी होती है। पंच स्वरूप चयन में बालसुलभ आवाज को प्राथमिकता दी जाती है। उनकी कमनीयता व रंग-रूप का भी ध्यान रखा जाता है। स्वर परीक्षा काशिराज परिवार के समक्ष दुर्ग में होती है। प्रमुख स्वरूपों का हर साल क्रमानुसार परिवर्तन किया जाता है।

दो मास पहले सावन मास के कृष्ण पत्र की चतुर्थी पर गणेश-पूजन कर पात्रों का प्रशिक्षण आरंभ होता है। इसके लिए दो व्यास होते हैं, एक प्रमुख पंचपात्रों को और दूसरे व्यास अन्य पात्रों को प्रशिक्षित करते हैं। प्रशिक्षण काल से ही रामादि की भावना और गौरव का प्रारंभ हो जाता है।

पंच स्वरूपों को उनके नाम से यथा-रामजी, जानकीजी, लक्ष्मणजी, भरतजी, शत्रुघ्नजी पुकारा जाता है। परस्पर वैसा ही व्यवहार भी किया जाता है। उदाहरण के रूप में जैसे राम के उठ खड़े होने पर अन्य सभी पात्र भी खड़े हो जाते हैं। यही नहीं श्रीराम और सीता विवाह के पूर्व व हरण के बाद तक अलग-अलग रहते हैं। लीला स्थल तक भी अलग-अलग रथों से जाते हैं। वनगमन के बाद भरत-शत्रुघ्न को भी श्रीराम, सीता और लक्ष्मण से अलग रखा जाता है।

मंचन न होने वाले प्रसंगों का गायन
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विराट गणेश की मूर्ति के साथ ही श्रीरामचरित मानस की पूजा व संकल्प किया जाता है। साथ ही चौक पक्की पर 12 रामायणियों के स्वरों में मानस की चौपाइयां गूंज उठती हैं। इसमें बालकांड के प्रारंभ से लेकर 175 दोहों का 10 दिनों तक पाठ किया जाता है। इसमें वे प्रसंग होते हैं जिनका मंचन नहीं किया जाता। लीला समापन के बाद भी उत्तरकांड के 79 दोहों का गायन दुर्ग में किया जाता है। दशरण मरण का भी मंचन न कर उसका भी गायन ही होता है।

कोट विदाई समेत 31 लीलाएं
दोहा गायन के ग्यारहवें दिन भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी अनंत चतुर्दशी पर गायन-पारायण के साथ लीला मंचन आरंभ हो जाता है। कोट विदाई समेत कुल 31 लीलाएं होती हैं और समापन आश्विन शुक्ल चतुर्दशी को होता है। रामलीला के दौरान समाज में प्रचलित मान्यताओं को विशेष स्थान दिया जाता है। यथा- श्रीराम के जन्म पर गवनहारिनों द्वारा सोहर गायन, राम बरात, विवाह, खिचड़ी आदि के समय भी संबंधित गीतों को बड़े भाव से महिलाएं स्वर देती हैं। विशेष यह कि लीला के निर्विघ्न आयोजन के लिए अनंत चतुर्दशी से आश्विन पूर्णिमा तक दुर्गा मंदिर में सप्तशती का पाठ चलता रहता है।

आरती का बड़ा मान
रामनगर की रामलीला का नित्य-प्रति विराम आरती से होता है। इसकी महत्ता यह कि कुछ लोग सिर्फ आरती के लिए ही रामनगर की रामलीला में आते हैं। दोपहर से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है। आरती स्वरूपों के समक्ष दीप जलाकर की जाती है। इससे पहले स्वरूपों को गजरा पहनाने के साथ कमल का फूल दिया जाता है। रामलीला का ही कोई पात्र आरती उतारता है।

अयोध्या में सभी आरतियां माता कौशल्या करती हैं। जनकपुर जाते समय रास्ते में दो दिन कोई साधु आरती करता है। जनकपुर में सुनयना आरती करती हैं। वनगमन के समय निषादराज, सुग्रीव तो कभी विभीषण आरती उतारते हैं। इस तरह कुल 31 आरती होती है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण आरती रामराज्याभिषेक की भोर की आरती होती है।

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