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    विश्व धरोहर बना सारनाथ, अब यूनेस्को के मानकों पर खरा उतरने की चुनौती

    Updated: Mon, 27 Jul 2026 10:38 AM (GMT+05:30)

    सारनाथ को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है, जिसके बाद अब इसके संरक्षण और मानकों का पालन सुनिश्चित करने की बड़ी चुनौती है। ...और पढ़ें

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    जेपी पांडेय, वाराणसी। भगवान बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने के साथ ही इस ऐतिहासिक उपलब्धि को बनाए रखने की बड़ी जिम्मेदारी भी है।

    भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ), जिला प्रशासन, नगर निगम, वाराणसी विकास प्राधिकरण, बिजली, वन, प्रदूषण, परिवहन और पुलिस विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यूनेस्को के संरक्षण मानकों का लगातार पालन सुनिश्चित करने की होगी। यूनेस्को की टीम समय-समय पर संरक्षण मानकों की समीक्षा करेगी और उसी के आधार पर इस दर्जे का मूल्यांकन भी होगा।

    उत्तर प्रदेश के चौथे विश्व धरोहर स्थल के रूप में मिली इस मान्यता से काशी ही नहीं, पूरे देश में खुशी का माहौल है। विश्व धरोहर घोषित होने के दूसरे दिन रविवार को सारनाथ में भी उत्साह दिखाई दिया।

    स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि पर्यटकों की संख्या बढ़ने से कारोबार को गति मिलेगी। पुरातत्व खंडहर परिसर के आसपास कई दुकानदार सफाई करते और भविष्य में बढ़ने वाले पर्यटन को लेकर चर्चा करते नजर आए। हालांकि, नए नियमों और प्रतिबंधों को लेकर उनके मन में कई सवाल भी हैं।

    विश्व धरोहर बनने के बाद स्मारकों के संरक्षण, प्रतिबंधित और बफर जोन में अवैध निर्माण पर प्रभावी रोक, स्वच्छता, अतिक्रमण हटाने, यातायात प्रबंधन तथा पर्यटकों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। संरक्षित क्षेत्र में नए निर्माण या मूल संरचनाओं में बदलाव पर कड़े नियम लागू रहेंगे।

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    आसपास बनने वाले भवनों की ऊंचाई, डिजाइन, रंग, व्यावसायिक गतिविधियां और यातायात व्यवस्था भी धरोहर की गरिमा के अनुरूप नियंत्रित करनी होगी। विकास कार्यों में भी सुनिश्चित करना होगा कि सारनाथ का मूल स्वरूप प्रभावित न हो।

    एएसआइ के मौजूदा नियमों के अनुसार भी पुरातत्व खंडहर परिसर और धमेख स्तूप की चारदीवारी से 100 मीटर के दायरे में किसी प्रकार की खुदाई या निर्माण नहीं किया जा सकता।

    धमेख स्तूप, चौखंडी स्तूप, अशोक स्तंभ अवशेष, मूलगंध कुटी विहार सहित सभी पुरातात्विक धरोहरों का वैज्ञानिक संरक्षण, नियमित मरम्मत और प्राकृतिक प्रभावों से सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही ठोस कचरा प्रबंधन, नियमित सफाई, प्लास्टिक पर नियंत्रण, हरियाली का संरक्षण, ध्वनि और प्रदूषण नियंत्रण जैसे मानकों पर विशेष ध्यान देना होगा।

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    बढ़ते पर्यटन को देखते हुए पार्किंग, ट्रैफिक प्रबंधन और पैदल भ्रमण को बढ़ावा देने की दिशा में भी प्रभावी व्यवस्था करनी होगी। स्थानीय लोगों, व्यापारियों, होटल संचालकों, गाइड और सामाजिक संगठनों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण होगी। यूनेस्को का यह सम्मान जितना गौरवपूर्ण है, उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित बनाए रखना उससे कहीं अधिक बड़ी जिम्मेदारी भी है।

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