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करवाचौथ पर नहीं द‍िखा चांद, अर्नब चक्रवात से बादलों ने ढंका आसमान, बादलों की ओर नि‍हार कर की पूजा

By Pramod Kumar Edited By: Abhishek sharma
Published: Thu, 29 Oct 2026 03:43 PM (IST)Updated: Fri, 30 Oct 2026 10:42 AM (IST)

करवा चौथ का व्रत 29 अक्टूबर को अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा गया। चंद्रोदय शाम 7.57 बजे हुआ ...और पढ़ें

HighLights

  1. करवा चौथ व्रत 29 अक्टूबर को, अखंड सौभाग्य कामना हेतु।

  2. चंद्रोदय शाम 7.57 बजे, गौरी-गणेश पूजन करें।

  3. पति की दीर्घायु के लिए इस मंत्र से करें पूजा।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि शास्त्रों में करक चतुर्थी के नाम से प्रसिद्ध है। लोक व्यवहार में इसे करवा चौथ नाम से जाना जाता है। अखंड सौभाग्य कामना का यह व्रत-पर्व इस साल 29 अक्टूबर को रखा गया।

चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर की भोर 4.45 बजे प्रारंभ होकर 29 अक्टूबर की देर रात 2.30 बजे तक रही। चंद्रोदयव्यापिनी चतुर्थी 29 अक्टूबर को प्राप्त होने से इसी दिन करवा चौथ का व्रत किया जाएगा। चंद्रोदय काल शाम 7.57 बजे हुआ। सूर्यास्त से चंद्रोदय कालपर्यंत पूजन कर चंद्रदर्शन होने पर चंद्रमा का पूजन व अर्घ्यदान किया गया। 

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काशी हिंदू विश्वविद्यालय में ज्योतिष विभाग के अध्यक्ष रहे प्रो. विनय पांडेय के अनुसार करक चतुर्थी में सुखद दांपत्य जीवन के लिए पति के आरोग्यता पूर्ण दीर्घायु की कामना करते हुए स्थिर सौभाग्य हेतु सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी गौरी की ‘शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं सन्ततिं शुभाम्। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे।।’

बताया क‍ि इस मंत्र से पूजा की जाती है। जीवन में अमृतत्व प्रदान करने वाले भगवान चंद्रमा सहित विघ्न विनाशक भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय व शिव का पूजा किया जाता है ताकि जीवन में सौभाग्य एवं संततिपूर्ण सर्वविध अनुकूलता बनी रहे।

श्रीकाशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी के अनुसार इस व्रत को करने का अधिकार केवल स्त्री को है। व्रतराज ग्रंथ में स्पष्टतया वर्णित है ‘अत्र स्त्रीणामेवाधिकार:’। किसी भी आयु, जाति, वर्ण, संप्रदाय की हो, सबको इस व्रत को करने का अधिकार शास्त्रों में प्राप्त है। शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी में यह व्रत होता है।

इस व्रत में भी संकष्टीगणेश चतुर्थी की तरह ही दिन भर उपवास रखकर चंद्रोदय काल में माता गौरी, विघ्नहर्ता गणेश, रिद्धि प्रदाता कार्तिकेय एवं भगवान शिव का पूजन करके चंद्रमा को अर्घ्‍य देने के उपरांत ही व्रत के पारन का विधान है।

यह व्रत कुछ क्षेत्रों में अपनी क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार विभिन्न रीति से भी मनाया जाता है। अतः इसे अपनी कुल और क्षेत्र परंपरा अनुसार ही मनाना चाहिए। सामान्यतया अधिकतर स्त्रियां चंद्रोदयकाल पर्यंत व्रत रखकर पूजनोपरांत पारन करती हैं।

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