काशी में मुंंशी प्रेमचंद के 'मैकू' का मोहल्ला जितना बदहाल उस दौर में था उससे कम आज भी नहीं
मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'मैकू' से जुड़े वाराणसी के 'मैकू मोहल्ले' की बदहाली आज भी बरकरार है, जहाँ बुनियादी सुविधाओं ...और पढ़ें

प्रेमचंद के मैकू का मोहल्ला वाराणसी में आज भी बदहाल बुनियादी सुविधाओं का इंतजार।
HighLights
मुंशी प्रेमचंद के मैकू मोहल्ले में बुनियादी सुविधाओं की कमी।
बारिश में जलभराव, सीवर जाम से लोग परेशान।
कहानी के विपरीत मोहल्ले की स्थिति नहीं बदली।
अरुण कुमार मिश्र, जागरण, वाराणसी। कभी एक तमाचा मैकू का जीवन बदल देता है। आज करीब एक सदी बाद उसी मैकू के नाम से जुड़ी बस्ती में बारिश की कुछ बूंदें व्यवस्था की पोल खोल देती हैं। मुंशी प्रेमचंद की चर्चित लघुकथा ‘मैकू’ का मुख्य पात्र ताड़ीखाने में लठैत बनकर पहुंचता है, लेकिन एक स्वयंसेवक की अहिंसा और निष्ठा उसके भीतर ऐसा बदलाव लाती है कि वह ताड़ी छोड़ देता है।
प्रेमचंद की कहानी का उद्देश्य भी यही था, हिंसा के बीच अहिंसा की ताकत और व्यक्ति के हृदय परिवर्तन को सामने लाना। प्रेमचंद का जन्म लमही में हुआ था। आसपास के ग्रामीण जीवन, संघर्ष और आम आदमी के चरित्रों को उन्होंने अपनी रचनाओं में जीवंत किया। ‘मैकू’ भी उसी दौर की सामाजिक और राजनीतिक हलचल की कहानी है, जब असहयोग आंदोलन और शराबबंदी का अभियान चल रहा था।
कहानी का लठैत मैकू पहले ताकत और हिंसा का प्रतीक है, मगर स्वयंसेवक की विनम्रता उसे भीतर तक झकझोर देती है। वह ताड़ीखाने से लौटकर अपने रास्ते बदलने का फैसला करता है। कोहिराना नई बस्ती में कहानी के इस मैकू से परिवार की स्मृति जुड़ी होने का दावा है। यहां रहने वाले जीतू प्रजापति बताते हैं कि उनके पिता मैकू लाल दफ्तरी का नाम प्रेमचंद के मुख्य पात्र से जुड़ा रहा।
वर्ष 2011 में उनका निधन हुआ। पंद्रह साल बाद भी परिवार को उस पहचान से कोई खास लाभ नहीं मिला। कमिनरी में सम्मान जरूर मिला, लेकिन जिस गली में परिवार रहता है, वहां आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। मुख्य मार्ग से मैकू का मोहल्ला करीब सौ मीटर अंदर है। जीतू बताते हैं कि गली की कभी नियमित सफाई नहीं हुई। करीब 20 वर्ष पहले लोगों ने पैसे जुटाकर सीवर डलवाया था।
अब यही सीवर जाम होकर बारिश में मुसीबत बन जाता है। महज 20 मिनट की बारिश में गली में पानी भर जाता है। लोगों के अनुसार सीवर और जलनिकासी की एक ही लाइन होने से समस्या और गंभीर हो जाती है। गलियों के पत्थर भी उखड़ चुके हैं। सुजीत कुमार प्रजापति बताते हैं कि बस्ती में पानी की आपूर्ति तक नहीं है, फिर भी जलकल की ओर से 17 हजार रुपये का बिल भेज दिया गया। कभी पानी आता भी है तो सीवर से टकराकर आने की शिकायत है। मजबूरी में लोगों ने अपने खर्च पर सबमर्सिबल लगवा लिए।
वार्ड सात में करोड़ों रुपये के विकास कार्य स्वीकृत होने की बात कही जा रही है। कूड़ा उठाने के लिए ट्राली आती है और परिवारों से 50 रुपये लिए जाते हैं। मगर लोगों की सबसे बड़ी चिंता आज भी सीवर और जलभराव है। प्रजापति बहुल इस बस्ती में बारिश से कुम्हारों का काम भी प्रभावित है। मिट्टी गूंथाई और चाक का काम ठंडा पड़ा है। अब लोगों को धूप निकलने का इंतजार है।
प्रेमचंद की कहानी में मैकू ने खुद को बदला था और दूसरों को बदलने की कोशिश की थी। विडंबना यह है कि कहानी का मैकू बदल गया, मगर उसके नाम से जुड़ी गली की तस्वीर वर्षों बाद भी नहीं बदल सकी। साहित्य ने पात्र को अमर कर दिया, लेकिन बस्ती आज भी विकास की प्रतीक्षा में है।
