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    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 09, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    वे दिन वे लोग: खां साहब कहते थे, बनारस से सुरीली जगह दुनिया में कोई नहीं

    Updated: Thu, 09 Jan 2025 02:39 PM (IST)

    पिता जी ने पहली बार उस्ताद पर पुस्तक लिखने के लिए मुझे प्रेरित किया। उनके जीवनकाल में ही हमने पुस्तक की रचना कर दी। पुस्तक लेखन के संदर्भ में उस्ताद स ...और पढ़ें

    शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की कहानी। जागरण
    शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की कहानी। जागरण

     मुरली मनोहर श्रीवास्तव। दुनिया के किसी कोने में जाउं पर मुझे बनारस और गंगा अपनी ओर खिंचती हैं, इसके बगैर मैं कहीं नहीं रह पाता हूं। अक्सर मुझसे ये बातें कहा करते थे भारत रत्न शहनाई नवाज उस्ताद बिस्मिल्ला खां साहब। बिहार के डुमरांव राज के मुलाजिम पैगंबर बख्श मियां के घर जन्में बालक कमरुद्दीन अपनी अम्मी के इंतकाल के बाद अपने मामू अली बख्श के साथ दस वर्ष की अवस्था में उनके शागिर्द बनकर बनारस आए और यहीं के होकर रह गए।

    राजदरबारों तक सिमटी रहने वाली शहनाई पर उस्ताद ने शास्त्रीय धुन बजाकर उसे भी शास्त्रीय वाद्य की श्रेणी में स्थापित कर सुरों की मलिका बना दिया। उस्ताद से मेरी पहली मुलाकात डुमरांव स्थित मेरे घर पर बचपन में हुई थी। उस दौरान पिताजी डा.शशि भूषण श्रीवास्तव भी मौजूद थे। तब बस मुझे इतना ही पता था कि मेरे मुहल्ले के एक किराए के मकान में 21 मार्च 1916 को जन्में यह सज्जन शहनाई वादक हैं।

    पहली बार मेरे पिता जी ने उस्ताद पर पुस्तक लिखने के लिए मुझे प्रेरित किया, नतीजा हमने ‘शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां’ पुस्तक की रचना उनके जीवनकाल में ही कर दी। पुस्तक लेखन के संदर्भ में उस्ताद से मेरा मिलना-जुलना शुरू हो गया। उस्ताद को जब मैंने पुस्तक के कुछ अंश सुनाए तो उन्होंने कहा कि मेरे बारे में मुझसे ज्यादा तो तू ही जानता है। हमने एक बार उस्ताद से पूछा कि आखिर कमरुद्दीन आगे चलकर बिस्मिल्ला खां कैसे हो गए?

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    इस पर उन्होंने बड़े सहज भाव से कहा, कहानी बहुत लंबी है। हम तीन भाई शम्सुद्दीन (बड़े), मैं (कमरुद्दीन) और मेरे सौतेले भाई पंचकौड़ी मियां थे। मामू के इंतकाल के बाद हम लोगों के समक्ष रोजी-रोटी की समस्या खड़ी हो गई। उसके बाद हम दो भाईयों ने बैंड पार्टी बनाई। इसका नाम दिया ‘बिस्मिल्ला एंड पार्टी’। हम मांगलिक समारोहों में वादन किया करते थे।

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    इसी बीच बड़े भाई शम्सुद्दीन, जो रीवा स्टेट में शहनाई वादन करने चले गए थे, असमय काल के गाल में समा गए। मैं भी अंदर से टूट गया। मेरे ऊपर दो परिवारों की जिम्मेदारी आ गई। इसी बीच खुदा का करम हुआ और धीरे-धीरे मेरी शहनाई का जलवा पूरी दुनिया में बिखरने लगा। वर्ष 1962 में आयी फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ ने संगीत जगत के कई रिकार्ड तोड़ दिए।

    शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की कहानी। जागरण


    फिल्म में शहनाई वादक कमरुद्दीन खां की जगह बिस्मिल्ला एंड पार्टी में से बिस्मिल्ला खां नाम दे दिया गया। आगे चलकर कमरुद्दीन ही उस्ताद बिस्मिल्ला खां कहलाने लगे। सौतेले भाई पंचकौड़ी मियां से भी उस्ताद बेइंतहां प्यार करते थे। उन्हें कई बार आबाई गांव डुमरांव को छोड़कर बनारस आकर रहने के लिए कहा। मगर उन्होंने अब्बा की सांगीतिक विरासत को संभालते हुए भले ही गरीबी में अपना जीवन बिताया, लेकिन गांव नहीं छोड़ा।

    अपने छात्र जीवन में पुस्तक लेखन के लिए मैं महीने में कम से कम दो बार उस्ताद बिस्मिल्ला खां से मिलने के लिए वाराणसी जरुर आया करता था। उस्ताद अपने पुत्र की तरह मुझे स्नेह देते थे। मुझे याद है कि उनके पास एक कप था। मैं जब भी जाता तो उसी कप में चाय आती और हम दोनों लोग उसी में बिस्कुट डुबोकर खाते थे।

    एक किस्सा सुनाते हुए उन्होंने एक बार कहा था कि सुर से किसी ने अगर छेड़छाड़ की, तो वो मेरा सबसे बड़ा दुश्मन है। एकबार की बात बताउं तो मैं अपने बड़े बेटे महताब हुसैन को शहनाई का प्रशिक्षण दे रहा था। उसने जानबूझकर शहनाई की धुन से छेड़छाड़ की। यह मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ। उसी समय मैंने उसे जोर से अपने पैरों से मार दिया। वो छत से गिर गया और उसका एक पैर टूट गया।

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    इस नजारे को डुमरांव से आए मेरे बचपन के मित्र एक्कनी राम ने देखा, फिर क्या था वो वहां से भाग खड़ा हुआ। बाद में उसने कहा कि सुर के मामले में जब ये अपने पुत्र को नहीं बख्शते तो हमें कहां से छोड़ते। वाराणसी कलाकारों का कुंभ है, इससे सुरीली पूरी दुनिया में कोई जगह नहीं है।

    हिंदुस्तानी तहजीब की मिसाल है यह शहर वाराणसी। यहां की आबोहवा में सात सुरों की महफिल सजती है। यहां की हर गलियां कभी संगीत की पाठशाला हुए करती थीं। साहित्य और संगीत यहां कि फिजां में ऐसी घुली हुई है, जैसे कहीं कोई मतभेद नहीं है। अंत में वो अक्सर कहा करते थे कि ‘संगीत सीखो सब एक हो जाओगे।’

    (लेखक साहित्यकार हैं। इन्होंने उस्ताद बिस्मिल्ला खां पर एक किताब भी लिखी है।)