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    बंदर के काटने के 20 साल बाद रेबीज का असर, पानी पीते ही अजीब हरकतें कर रहा मरीज, डॉक्टरों ने खड़े किए हाथ

    Updated: Wed, 08 Jul 2026 06:23 AM (GMT+05:30)

    गाजीपुर के अजय कुमार राय को 20 साल पहले बंदर के काटने से हुए रेबीज संक्रमण के कारण सरकारी अस्पतालों में भर्ती नहीं किया जा रहा है। ...और पढ़ें

    प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए तस्वीर को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।

    प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए तस्वीर को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।

    HighLights

    1. 20 साल पहले बंदर के काटने से रेबीज संक्रमण।

    2. अस्पतालों ने आइसोलेशन वार्ड न होने पर भर्ती से मना किया।

    3. घर में मरीज की हालत बिगड़ रही, परिवार चिंतित।

    जागरण संवाददाता, वाराणसी। गाजीपुर के ताजपुर माझा गांव के 48 वर्षीय अजय कुमार राय इन दिनों रेबीज संक्रमण से जूझ रहे हैं। करीब 20 साल पहले बंदर के काटने का असर अब जानलेवा साबित हो रहा है।

    मंडलीय चिकित्सालय और बीएचयू समेत विभिन्न सरकारी अस्पतालों में भर्ती के लिए दर-दर भटकने के बावजूद उन्हें कहीं जगह नहीं मिली। आइसोलेशन वार्ड न होने का हवाला देकर दोनों जगह से रेफर कर दिया गया। फिलहाल परिवार ने उन्हें घर में ही एक कमरे में रखा है। असहनीय दर्द मरीज की हालत खराब होती जा रही है।

    तीमारदार प्रमोद कुमार राय ने बताया कि सीएमओ साहब को फोन किया तो पहले आश्वासन दिया कि भर्ती करा देंगे, लेकिन घंटों इंतजार के बाद फोन रिसीव ही नहीं कर रहे थे। दो दिन में हालत बहुत बिगड़ गई है। पानी पीने की कोशिश करते ही अजीब हरकतें शुरू हो जाती हैं।

    अजय की दो छोटी बेटियां हैं। परिवार परेशान है। बीएचयू और मंडलीय चिकित्सालय में चक्कर काटने के बाद कई और सरकारी अस्पताल में भी संपर्क किया, लेकिन गंभीर मरीजों के लिए स्पेशल वार्ड या सपोर्टिव केयर की कमी बताकर रेफर कर दिया गया।

    स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि लक्षण शुरू होने के बाद रेबीज का इलाज सीमित होता है, लेकिन परिवार का आरोप है कि पैलिएटिव केयर (गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को दर्द, तनाव और अन्य शारीरिक-मानसिक लक्षणों से राहत दिलाने वाली एक विशेष चिकित्सा सेवा) भी नहीं मिल रहा है।

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    रेबीज प्रबंधन में बड़ी खामी

    कुत्ते, बिल्ली या बंदर के काटने के तुरंत बाद पोस्ट एक्सपोजर प्रोफिलेक्सिस (पीईपी) उपलब्ध है और एंटी रेबीज वैक्सीन (एआरवी) कई केंद्रों पर मिल जाती है, लेकिन लक्षण प्रकट होने के बाद रेबीज लगभग 100 प्रतिशत घातक हो जाता है।

    ऐसे में दर्द निवारक दवाएं, वेंटिलेटर सपोर्ट और आइसोलेशन वार्ड की जरूरत पड़ती है, जो पूर्वांचल के वाराणसी, मीरजापुर और आजमगढ़ मंडल के सरकारी अस्पतालों में नदारद है।

    रेबीज इम्यूनोग्लोबुलिन (आरआइजी) भी गंभीर मामलों में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होता। बीएचयू ट्रामा सेंटर में बाइट के शुरुआती मामलों के लिए सुविधा है, मगर सिम्पटोमैटिक मरीजों के लिए अलग व्यवस्था नहीं है। बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के चलते ऐसे मरीजों को अक्सर रेफर किया जाता है।

    रेबीज संक्रमित मरीजों के लिए व्यवस्था बनाई जा सके। इसके लिए उच्च अधिकारियों को पत्राचार किया जा रहा है जिससे आगे चलकर कम से कम मरीज को भर्ती कर कुछ राहत प्रदान किया जा सके।

    - डाॅ. मुकेश कुमार, सीएमओ वाराणसी