विकसित भारत के निर्माण के लिए वैज्ञानिक नवाचार पर देना होगा ध्यान, विज्ञान भारती अधिवेशन में बोले प्रो. अभय करंदीकर
नीति आयोग के सदस्य प्रो. अभय करंदीकर ने विज्ञान भारती के अधिवेशन में विकसित भारत के लिए वैज्ञानिक नवाचार पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि स्वदेशी नवाचार क ...और पढ़ें

विकसित भारत के निर्माण के लिए वैज्ञानिक नवाचार पर देना होगा विशेष ध्यान: प्रो. अभय करंदीकर।
HighLights
विकसित भारत हेतु वैज्ञानिक नवाचार पर विशेष ध्यान आवश्यक।
नई भारत केंद्रित विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार नीति का प्रस्ताव।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नियमन और भारत-विशिष्ट मॉडल पर चर्चा।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्व तेजी से परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। अब तकनीकी प्रगति का परिणाम सालों की बजाय महीनों में आ रहा है। विकसित भारत के निर्माण के लिए वैज्ञानिक नवाचार पर विशेष ध्यान देना होगा। इसमें स्वदेशी नवाचार का अर्थ दुनिया से अलग-थलग होना नहीं है, क्योंकि विज्ञान सम्पूर्ण वैश्विक समुदाय की साझा धरोहर है।
यह विचार नीति आयोग के सदस्य प्रो. अभय करंदीकर ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के स्वतंत्रता भवन में रविवार को आयोजित विज्ञान भारती के सातवें राष्ट्रीय अधिवेशन के समापन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि भारत को अपनी प्राचीन वैज्ञानिक परंपराओं का अध्ययन आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ करते हुए चुनौतियों के अनुरूप समाधान निकालने चाहिए। यह कार्य व्यवहार पूरे विश्व के लिए भी मार्गदर्शक बनेगा। विशिष्ट अतिथि नीति आयोग के सदस्य प्रो. गोवर्धन दास ने कहा कि भारत का गौरवशाली अतीत एक सशक्त और समृद्ध भविष्य के निर्माण की प्रेरणा देता है।
महाराणा प्रताप और महाराजा रणजीत सिंह जैसी विभूतियों का जीवन आज भी देशवासियों को प्रेरित करता है। प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों और ज्ञान-विज्ञान के विकास में भारत के ऐतिहासिक योगदान को वैश्विक स्तर पर स्वीकार किया जा रहा है।
बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत गौरव का विषय है। नई पीढ़ी को प्रेरित करने के लिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवाचार और उद्योग के क्षेत्र में ठोस उपलब्धियां हासिल करना होगा।
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विज्ञान भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. शेखर सी मांडे ने कहा कि अधिवेशन में विशिष्टजनों के विचारों और निष्कर्षों के आधार पर समकालीन चुनौतियों के समाधान के लिए भारतीय दृष्टिकोण पर आधारित व्यावहारिक कार्ययोजना विकसित की जाए।
इस अवसर पर प्रो. डीपी सिंह, प्रो. अविनाश चंद्र पांडेय, प्रो. आरएस दुबे, प्रो. भारतेंदु कुमार सिंह, प्रो. अरविंद रानाडे, प्रो. बलदेव कंबोज, प्रो. विनय कुमार पांडेय, प्रो. रामनारायण द्विवेदी, प्रो. सौरभ सिंह, प्रो. संजय शर्मा सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, निदेशक, वैज्ञानिक व शिक्षाविद उपस्थित रहे।
भारत केंद्रित विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार नीति तैयार करने पर सहमति
विज्ञान भारती के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. शिव कुमार शर्मा ने कहा कि अधिवेशन के नौ सत्रों में स्वास्थ्य, ऊर्जा और पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर मंथन हुआ। विज्ञान भारती ने विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नई भारत केंद्रित विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार नीति तैयार करने का प्रस्ताव पारित किया।
विज्ञान भारती की राष्ट्रीय सचिव प्रो. रंजना अग्रवाल ने भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक संचार, पारंपरिक ज्ञान व आधुनिक विज्ञान के समन्वय तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप शोध एवं नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने का आह्वान किया।
भारतीय ज्ञान सार्वभौम, इसका उद्देश्य सिर्फ धनोपार्जन नहीं: डॉ. कृष्ण गोपाल
अधिवेशन के प्रथम सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह- सरकार्यवाह डा. कृष्ण गोपाल ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में विज्ञान और अध्यात्म एक- दूसरे के पूरक रहे हैं। काशी विश्व की प्राचीनतम जीवित नगरी है, यहां आज भी हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक एवं ज्ञान परंपराएं जीवित हैं।
भारतीय चिंतन में विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि संगीत, नृत्य, व्याकरण, आयुर्वेद, गणित और दर्शन सहित सभी ज्ञान-विधा विज्ञान के व्यापक स्वरूप का हिस्सा हैं।
भारतीय ज्ञान सार्वभौम है, इसका उद्देश्य सिर्फ धनोपार्जन नहीं है। उन्होंने कहा कि विज्ञान मानवता के कल्याण का साधन बने, इसके लिए उसे भारतीय ज्ञान, नैतिक मूल्यों और लोकहित की भावना से जोड़ना आवश्यक है।
एआई के नियमन की बढ़ रही आवश्यकता
अधिवेशन के दूसरे सत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं नैतिकता विषय पर पैनल परिचर्चा हुई। इसमें भारती राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के अध्यक्ष प्रो. आशुतोष शर्मा ने कहा कि नैतिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, निष्पक्षता व गोपनीयता की सुरक्षा आवश्यक है।
डॉ. मनीष सिंह ने पारदर्शी, समावेशी, बहुभाषी व नागरिक केंद्रित कृत्रिम बुद्धिमत्ता तंत्र विकसित करने का सुझाव दिया। प्रो. मयंक वत्स ने कहा कि स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विज्ञान में एआई को सहायक उपकरण के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि चिकित्सकीय विशेषज्ञों के विकल्प के रूप में।
राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान के महानिदेशक डॉ. मदन मोहन त्रिपाठी ने कहा कि एआई का तीव्र विस्तार हुआ है, इसके नियमन की आवश्यकता बढ़ रही है। एआई के अधिकांश वैश्विक माडल भारतीय संदर्भ के लिए विशिष्ट नहीं हैं इसलिए भारत-विशिष्ट एआई डल विकसित करना आवश्यक हैं।
वरिष्ठ नीति सलाहकार, सीएसईपी दीपक महेश्वरी ने कहा कि एआई स्थानीय आवश्यकताओं व संस्कृति के अनुरूप होने चाहिए। संचालन कर रहे डॉ. विवेक कुमार सिंह ने भारतीय संदर्भ में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास पर चर्चा की।
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