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    कब से शुरू हुई 'कांवड़ यात्रा'? काशी के ज्‍योत‍िषाचार्य ने बताया क‍ि स्‍कंदपुराण में है गंगा, काशी और श‍िव की महत्‍ता का वर्णन

    By Dhyan chandra sharmaEdited By: Abhishek sharma
    Updated: Thu, 09 Jul 2026 03:57 PM (IST)

    काशी में कांवड़ यात्रा का गहरा आध्यात्मिक महत्व है, जिसका वर्णन स्कंदपुराण में गंगा, काशी और भगवान शिव के अद्वितीय संबंध के साथ मिलता है। यह यात्रा के ...और पढ़ें

    काशी की कांवड़ यात्रा: स्कंदपुराण में वर्णित गंगा, शिव और मोक्ष का महत्व। (AI Image)

    काशी की कांवड़ यात्रा: स्कंदपुराण में वर्णित गंगा, शिव और मोक्ष का महत्व। (AI Image)

    HighLights

    1. काशी का कांवड़ यात्रा से गहरा आध्यात्मिक संबंध।

    2. स्कंदपुराण में गंगा, काशी, शिव की महिमा वर्णित।

    3. कांवड़ यात्रा आत्मिक उन्नति, भक्ति का प्रतीक।

    जागरण संवाददाता, वाराणसी। काशी की मह‍िमा पुराणों में दर्ज है, पौराण‍िक महत्‍ता में काशी में आद‍ि व‍िश्‍वेश्‍वर का सपर‍िवार होना भी एक अत‍िर‍िक्‍त काशी का मान माना जाता है। इस बाबत रानी पद्मावती तारा योगतन्त्र आदर्श सांस्कृतिक महाविद्यालय इंद्रपुर के प्राचार्य डॉ. कमलेश झा ने बताया क‍ि यदि सम्पूर्ण भारत में किसी स्थान का कांवड़ यात्रा से गहरा आध्यात्मिक संबंध है, तो वह काशी है।

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    बताया क‍ि स्कन्दपुराण के काशीखण्ड में भगवान शिव स्वयं काशी में निवास करते हैं, जो मोक्ष का द्वार बन जाती है। प्रसिद्ध श्लोक में कहा गया है:

    "न काशी सदृशं क्षेत्रं न गङ्गासदृशी नदी।
    न विश्वेशसमो देवो न मोक्षकरि दुर्लभा॥"

    अर्थात् काशी के समान कोई क्षेत्र नहीं, गंगा के समान कोई नदी नहीं, विश्वेश्वर के समान कोई देव नहीं और यहां मोक्ष भी दुर्लभ नहीं है। यह तथ्य विभिन्न संस्कृतियों में पाठभेद के बावजूद काशी की महिमा को निरंतर दर्शाता है।

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    गंगा और विश्वेश्वर का अद्वितीय संबंध : काशी में गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि मोक्षदायिनी माता मानी जाती है। भगवान विश्वेश्वर केवल मंदिर के देवता नहीं, बल्कि सम्पूर्ण क्षेत्र के अधिपति हैं। काशी में गंगा से जल लेकर विश्वेश्वर का अभिषेक करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। काशी की परंपरा के अनुसार, गंगा भगवान विष्णु के चरणों से प्रकट होकर शिव की जटाओं में प्रवाहित होती हैं। इस प्रकार, गंगाजल का शिव पर अर्पण भगवान और भक्त के बीच प्रेम का अद्भुत प्रतीक है।

    कांवड़ यात्रा का इतिहास : इतिहासकारों के अनुसार, कांवड़ यात्रा की कोई निश्चित शुरुआत नहीं है। तथापि, यह स्पष्ट है कि प्राचीन काल से जल का धार्मिक महत्व रहा है। पुरातन काल में शिवाभिषेक का प्रचलन था और मध्यकालीन तीर्थयात्राओं में पवित्र जल ले जाने की परंपरा भी रही है। आज यह यात्रा शिव की सबसे बड़ी धार्मिक पदयात्राओं में से एक मानी जाती है। इसलिए, यह कहना उचित नहीं होगा कि कांवड़ यात्रा किसी एक घटना से प्रारंभ हुई, बल्कि यह हजारों वर्षों की धार्मिक परंपरा का परिणाम है।

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    कांवड़ यात्रा का वास्तविक उद्देश्य: कांवड़ यात्रा केवल गंगाजल लाने का नाम नहीं है। इसका गहरा आध्यात्मिक संदेश है - शरीर से तप, मन से भक्ति, वाणी से शिवनाम, विचार में अनुशासन, समाज की सेवा, प्रकृति का सम्मान और अंततः अहंकार का त्याग। यही कारण है कि करोड़ों लोग इस यात्रा को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति का माध्यम मानते हैं।

    काशी की कांवड़ यात्रा: काशी में गंगा स्वयं मोक्षदायिनी मानी गई हैं और भगवान विश्वेश्वर इस क्षेत्र के अधिपति हैं। कांवड़ यात्रा का महत्व न केवल धार्मिक है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी है। इस यात्रा के माध्यम से श्रद्धालु न केवल अपने लिए, बल्कि समाज के लिए भी कल्याण की कामना करते हैं। काशी की कांवड़ यात्रा एक अद्वितीय धार्मिक अनुभव है, जो न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि मानवता के लिए एक प्रेरणा भी है।

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