उत्तराखंड ने निकाला पराली से ग्रीन हाईवे बनाने का रास्ता, CSIR-IIP ने खोजा बायो-बिटुमेन बनाने की स्वदेशी तकनीक
देहरादून स्थित सीएसआईआर-आईआईपी ने पराली से सड़क निर्माण में प्रयुक्त होने वाला बायो-बिटुमेन बनाने की स्वदेशी तकनीक विकसित की है। यह तकनीक पराली जलाने ...और पढ़ें

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण
HighLights
सीएसआईआर-आईआईपी ने पराली से बायो-बिटुमेन तकनीक विकसित की।
यह तकनीक पराली जलाने से प्रदूषण घटाएगी, किसानों को लाभ।
भारत ने एक वर्ष में लैब से उद्योग तक तकनीक पहुंचाई।
अश्वनी त्रिपाठी, देहरादून। अब फसल कटाई के बाद खेतों में बची पराली किसानों के लिए बोझ नहीं बनेगी और न ही धुएं से हवा को जहरीला करेगी। वही पराली अब देश की सड़कों का मजबूत आधार बनेगी। देहरादून स्थित सीएसआइआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (सीएसआइआर-आइआइपी) ने ऐसी स्वदेशी तकनीक विकसित की है, जिससे धान की पराली से सड़क निर्माण में उपयोग होने वाला बिटुमेन तैयार किया जा सकता है। बुधवार को इस तकनीक का प्रौद्योगिकी हस्तांतरण केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को किया गया। इसके साथ ही स्वच्छ, हरित और आत्मनिर्भर राजमार्गों के नए युग की शुरुआत हो गई है।
अब तक सड़क निर्माण में प्रयुक्त बिटुमेन का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता रहा है, जबकि खेतों में बची पराली हर वर्ष वायु प्रदूषण की बड़ी वजह बनती रही है। देहरादून स्थित सीएसआईआर-आईआईपी और नई दिल्ली के वैज्ञानिकों ने इन दोनों समस्याओं का एक साथ समाधान खोज निकाला है।
नई तकनीक के तहत पराली को एकत्र कर विशेष प्रक्रिया पायरोलिसिस से गुजारा जाता है, जिससे बायो-आयल प्राप्त होता है। इसी से बायो-बिटुमेन तैयार किया जाता है। वैज्ञानिक परीक्षणों में यह सिद्ध हो चुका है कि सड़क निर्माण में पारंपरिक बिटुमेन के 20 से 30 प्रतिशत हिस्से को बिना गुणवत्ता से समझौता किए बायो-बिटुमेन से बदला जा सकता है।
सीएसआइआर की महानिदेशक एवं डीएसआइआर की सचिव एन. कलाइसेल्वी ने कहा कि भारत दुनिया का पहला देश बन गया है, जिसने बायो-बिटुमेन जैसी तकनीक को एक ही वर्ष में प्रयोगशाला से उद्योग और वाणिज्यिक स्तर तक पहुंचाया है। यह भारतीय विज्ञान की बड़ी उपलब्धि है।
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प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के दौरान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान के केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और सीएसआइआर के उपाध्यक्ष डाॅ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह नवाचार किसानों, पर्यावरण और देश की अर्थव्यवस्था तीनों के लिए बड़ा समाधान है। उन्होंने बताया कि इस तकनीक से बनी सड़कें कम खर्चीली होंगी, अधिक समय तक टिकेंगी और प्रदूषण का खतरा भी कम होगा।
डॉ. सिंह ने बताया कि इस तकनीक का सफल प्रयोग मेघालय के जोरबाट-शिलांग एक्सप्रेस वे (एनएच-40) पर किया जा चुका है, जहां बायो-बिटुमेन से 100 मीटर लंबा सड़क खंड बनाया गया है। इस नवाचार के लिए पेटेंट आवेदन किया जा चुका है और अब इसे उद्योगों के साथ जोड़कर बड़े पैमाने पर अपनाने की तैयारी है।
भारत अपनी कुल बिटुमेन जरूरत का लगभग 50 प्रतिशत आयात करता है। यदि बायो-बिटुमेन को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया गया तो इससे 25,000 से 30,000 करोड़ रुपये प्रति वर्ष की विदेशी मुद्रा बचाई जा सकेगी।