गढ़वाल राइफल्स: पहाड़ों से भी मजबूत हौसला, ये है देश की सबसे ताकतवर और तेज तर्रार सेना
Garhwal Rifles: उत्तराखंड के लैंसडौन में स्थित यह रेजिमेंट अपनी अडिग हिम्मत और अनुशासन के लिए जानी जाती है, जिसने हर युद्ध में देश का मान बढ़ाया है।

HighLights
गढ़वाल राइफल्स: देश की सबसे ताकतवर, फुर्तीली और सम्मानित रेजिमेंट
स्थापना 5 मई 1887 को हुई, रेजिमेंटल सेंटर लैंसडौन में
पहाड़ों जैसी अडिग हिम्मत और अटूट अनुशासन से देश का मान बढ़ाया
र्मला बोहरा, उत्तराखंड। Garhwal Rifles History: पहाड़ों जैसी अडिग हिम्मत और अटूट अनुशासन वाले इस रेजिमेंट ने हर युद्ध में देश का मान बढ़ाया है। गढ़वाल राइफल्स देश की सबसे ताकतवर, फुर्तीली और सम्मानित रेजिमेंटों में से एक है। इसकी स्थापना 5 मई 1887 को हुई थी। रेजिमेंटल सेंटर उत्तराखंड के लैंसडौन में है।
गढ़वाल राइफल्स, सेना में एक ऐसी रेजिमेंट है, जिसमें सिर्फ गढ़वाली युवाओं को भर्ती किया जाता है। बदरीनाथ धाम में विराजमान भगवान बदरी विशाल गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट के आराध्य देव हैं। रेजिमेंट का कोई भी काम भगवान बदरी विशाल के जयघोष के बिना पूरा नहीं माना जाता।
हर वर्ष बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने और बंद होने के मौके पर गढ़वाल रेजिमेंट का बैंड विग्रह डोलियों की अगुआई करता है। यह यह परंपरा 138 वर्ष से चली आ रही है और तभी रेजिमेंट की स्थापना हुई थी।
वर्तमान में गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट सेंटर में 21 बटालियन, तीन राष्ट्रीय राइफल्स, दो प्रादेशिक सेना व एक गढ़वाल स्काउट समेत 27 बटालियन हैं।

गढ़वाल राइफल्स की स्थापना कब हुई?
- अफगान युद्ध के दौरान सूबेदार बलभ्रद सिंह की वीरता को देख कमांडर इन-चीफ मार्शल एफएस राबर्ट्स ने अलग से गढ़वाली रेजिमेंट बनाई।
- अप्रैल 1887 में दूसरी बटालियन तीसरी गोरखा रेजिमेंट की स्थापना के आदेश दिए गए। इसमें छह कंपनियां गढ़वालियों की और दो कंपनियां गोरखाओं की थी।
- पांच मई 1887 को चौथी गोरखा को बटालियन क्षेत्र के कालौडांडा (लैंसडौन का पुराना नाम), पहुंची।
- 1891 में 2-3 गोरखा रेजिमेंट की दो कंपनियों से एक गोरखा पलटन 2-3 क्वीन अलेक्टजेन्टास आन (बटालियन का नाम) खड़ी की गई।
- शेष बटालियन को दोबारा नए बंगाल इन्फैंट्री की 39 वीं गढ़वाल रेजिमेंट के नाम से जाना गया।
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कब, कहां और कैसे गठित हुई बटालियन?
- प्रथम गढ़वाल राइफल्स-05 मई 1887 को अल्मोड़ा में गठित और 04 नवंबर 1887 को लैंसडौन में आगमन
- द्वितीय गढ़वाल राइफल्स-01 मार्च 1901 को लैंसडौन में गठित
- तृतीय गढ़वाल राइफल्स- 20 अगस्त 1916 को लैंसडौन में
- चौथी गढ़वाल राइफल्स - 28 अगस्त 1918 को लैंसडौन में
- पांचवीं गढ़वाल राइफल्स - एक फरवरी 1941 को लैंसडौन में
- छठवीं गढ़वाल राइफल्स 15 सितंबर 1941 को लैंसडौन में
- सातवीं गढ़वाल राइफल्स- एक जुलाई 1942 को लैंसडौन में
- आठवीं गढ़वाल राइफल्स- एक जुलाई 1948 को लैंसडौन में
- नौवीं गढ़वाल राइफल्स- एक जनवरी 1965 को कोटद्वार में
- 10वीं गढ़वाल राइफल्स- 15 अक्टूबर 1965 को कोटद्वार में
- 11वीं गढ़वाल राइफल्स- एक जनवरी 1967 को बैंगलौर में
- 12वीं गढ़वाल राइफल्स- एक जून 1971 को लैंसडौन में
- 13वीं गढ़वाल राइफल्स- एक जनवरी 1976 को लैंसडौन में
- 14वीं गढ़वाल राइफल्स- एक सितंबर 1980 को कोटद्वार में
- 16वीं गढ़वाल राइफल्स - एक मार्च 1981 को कोटद्वार में
- 17वीं गढ़वाल राइफल्स- एक मई 1982 को कोटद्वार में
- 18वीं गढ़वाल राइफल्स- एक फरवरी 1985 को कोटद्वार में
- 19वी गढ़वाल राइफल्स- एक मई 1985 को कोटद्वार में
- गढ़वाल स्काउट्स - आठ अप्रैल 1964 को कोटद्वार में
- 121 इन्फ्रैंट्री बटालियन - एक अप्रैल को कोलकाता में
- 121 टीए - एक दिसंबर 1982 को लैंसडौन में
- चौदह राष्ट्रीय राइफल्स - 14 जून 1994 को कोटद्वार में
- 36 राष्ट्रीय राइफल्स - एक सितंबर 1994 में
- 48 राष्ट्रीय राइफल्स - पंद्रह सितंबर 2001 को कोटद्वार में
कारगिल युद्ध में 56 सपूतों ने दिया था सर्वोच्च बलिदान
कारगिल युद्ध में गढ़वाल राइफल्स की 10वीं, 17वीं, 18वीं बटालियन और गढ़वाल स्काउट्स ने अदम्य शौर्य का प्रदर्शन किया, जिसमें 2 अधिकारी, 1 जेसीओ और 53 जवान बलिदान हुए। युद्ध में बटालियनों ने दुश्मनों कई बंकरों को ध्वस्त किया। भारत के वीरों ने भारी मात्रा में हथियार कब्जाने में भी सफलता हासिल की। युद्ध में पराक्रम के लिए गढ़वाल राइफल्स को सात वीर चक्र, 16 सेना मेडल समेत कई पदकों से सम्मानित किया गया।

वीर चक्र विजेता
- मेजर राजेश शाह : 18 गढ़वाल
- कप्तान जिंटू गोगोई (मरणोपरांत) : 17 गढ़वाल
- कप्तान सुमित राय (मरणोपरांत) : 18 गढ़वाल
- कप्तान एमवी सूरज : 18 गढ़वाल
- नायक कश्मीर सिंह (मरणोपरांत) : 18 गढ़वाल
- राइफलमैन कुलदीप सिंह (मरणोपरांत) : 18 गढ़वाल
- राइफलमैन अनुसूया प्रसाद (मरणोपरांत) : 18 गढ़वाल
दो बार सेना मेडल
- कर्नल एसके चक्रवर्ती : शौर्य चक्र, सेना मेडल
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