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    उत्तराखंड: जोशीमठ में भू-धंसाव के बाद अब धंसने लगी हेलंग और कल्पेश्वर की पहाड़ियां, सेटेलाइट से रखी गई नजर

    Updated: Fri, 07 Aug 2026 06:47 AM (IST)

    जोशीमठ में भू-धंसाव के बाद अब हेलंग और कल्पेश्वर की पहाड़ियों में भी धीमी गति से खिसकाव देखा गया है। सात वर्षों के उपग्रह अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। ...और पढ़ें

    चमोली में जोशीमठ के बाद हेलंग की पहाड़ियां भी धंस रही हैं। हेलंग क्षेत्र का नजारा।

    चमोली में जोशीमठ के बाद हेलंग की पहाड़ियां भी धंस रही हैं। हेलंग क्षेत्र का नजारा।

    HighLights

    1. हेलंग और कल्पेश्वर की पहाड़ियों में धीमा खिसकाव।

    2. सात वर्षों के उपग्रह अध्ययन से पुष्टि हुई।

    3. नदी कटाव, वर्षा, वन कमी मुख्य कारण।

    सुमन सेमवाल, देहरादून। सरकारी मशीनरी जोशीमठ में भूधंसाव की चुनौती से जूझ रही है और अब उसी क्षेत्र में हेलंग और कल्पेश्वर की पहाड़ियों के धीमी चाल से खिसकने की बात सामने आई है। जिसे अध्ययन के रूप में 22 जुलाई 2026 को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका फ्रंटियर्स इन अर्थ साइंस में प्रकाशित किया गया है।

    अध्ययन राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), राउरकेला के विज्ञानी प्रोहेलिका दलाल और प्रो. भास्कर कुंडू ने किया है। जिसमें वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डा विनीत गहलोत ने जोशीमठ क्षेत्र में स्थापित 'जोश' निरंतर जीपीएस स्टेशन का टाइम सीरीज डेटा उपलब्ध कराया और अध्ययन के निष्कर्षों की पुष्टि हो गई।

    सात वर्षों तक उपग्रह से रखी गई नजर

    शोधकर्ताओं ने वर्ष 2017 से 2023 के बीच यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल-1 उपग्रह से प्राप्त 314 रडार चित्रों का विश्लेषण किया। इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार (इनसार) तकनीक की मदद से जमीन की सतह में मिलीमीटर से लेकर सेंटीमीटर स्तर तक होने वाले बदलाव मापे गए।

    इसके साथ वर्षा के आंकड़ों, ग्रेस उपग्रह से प्राप्त भूजल एवं जल भंडारण संबंधी जानकारी तथा लैंड सरफेस डिस्चार्ज माडल (एलएसडीएम) के आंकड़ों की भी तुलना की गई।

    अलकनंदा और कल्पगंगा घाटियों की ओर खिसक रही हैं पहाड़ियां

    अध्ययन में विज्ञनियों ने पाया कि हेलंग और कल्पेश्वर की ढलानें अपने-अपने नदी तंत्र की दिशा में धीरे-धीरे सरक रही हैं। हेलंग क्षेत्र का खिसकाव मुख्य रूप से अलकनंदा नदी की घाटी की ओर, जबकि कल्पेश्वर क्षेत्र का खिसकाव कल्पगंगा घाटी की ओर दर्ज किया गया।

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    वर्ष 2017 से 2023 के बीच हेलंग में लगभग 40 सेंटीमीटर और कल्पेश्वर में करीब 20 सेंटीमीटर तक संचयी विस्थापन दर्ज किया गया। विज्ञानियों के अनुसार नदियों द्वारा ढलान के निचले हिस्से का लगातार कटाव, वर्षा और पहाड़ के भीतर जमा होने वाला पानी मिलकर इस धीमे लेकिन लगातार जारी खिसकाव को बढ़ा रहे हैं।

    धीमा भूस्खलन या धंसाव दिया गया नाम

    विज्ञानियों के अनुसार हर भूस्खलन अचानक नहीं होता। कई पहाड़ियां वर्षों तक बेहद धीमी गति से खिसकती रहती हैं। इसे धीमा भूस्खलन कहा जाता है। इसकी शुरुआत में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता, लेकिन समय के साथ जमीन में दरारें पड़ने लगती हैं, भवन झुकने लगते हैं और सड़कें क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। यदि यह प्रक्रिया तेज हो जाए तो यही धीमा खिसकाव बड़े भूस्खलन का रूप ले सकता है।

    हर साल दोहराता है एक जैसा चक्र

    अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि जोशीमठ के साथ ही हेलंग और कल्पेश्वर क्षेत्रों में भूस्खलन का लगभग 12 महीने का नियमित चक्र पाया गया। मानसून के दौरान होने वाली वर्षा का पानी पहाड़ के भीतर रिसता है और चट्टानों तथा मिट्टी की परतों पर अतिरिक्त दबाव डालता है। यही दबाव पहाड़ी को धीरे-धीरे खिसकाने लगता है। वैज्ञानिकों ने स्पेक्ट्रल विश्लेषण के माध्यम से इस वार्षिक चक्र की पुष्टि की।

    वर्षा रुकने के बाद भी बना रहता है खतरा

    अध्ययन में यह भी सामने आया कि वर्षा और भूस्खलन के बीच तत्काल संबंध नहीं होता। वर्षा का असर सतह पर होने वाले खिसकाव पर लगभग तुरंत दिखाई देता है। पहाड़ के भीतर पानी जमा होने में लगभग एक महीने का समय लगता है।

    गहराई में जमा पानी का प्रभाव भूस्खलन की गति पर दो से तीन महीने बाद स्पष्ट दिखाई देता है। यानी वर्षा समाप्त होने के बाद भी पहाड़ के भीतर पानी जमा रहता है और कई सप्ताह तक ढलानों को कमजोर करता रहता है। यही वजह है कि कई बार बड़े भूस्खलन भारी बारिश रुकने के काफी समय बाद भी हो जाते हैं।

    जंगल घटे, निर्माण बढ़ा

    शोध में भूमि उपयोग में हुए बदलावों का भी विश्लेषण किया गया। इसके अनुसार 2000 से 2022 के बीच जोशीमठ, हेलंग और कल्पेश्वर क्षेत्र में निर्मित क्षेत्र लगभग 0.7 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 3 वर्ग किलोमीटर हो गया। वहीं, वन क्षेत्र 8.5 वर्ग किलोमीटर से घटकर 7.5 वर्ग किलोमीटर रह गया।

    विज्ञानियों ने पाया कि जहां वनस्पति कम हुई, वहां जमीन में विकृति भी अधिक दर्ज की गई। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि यह भूस्खलन का अकेला कारण नहीं है, बल्कि कई कारकों में से एक है।

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