IMA पासिंग आउट परेड: चार पीढ़ियों से चली आ रही देशभक्ति की परंपरा... अब दो बेटों के कंधों पर जिम्मेदारी
आईएमए पासिंग आउट परेड में प्रणय छाबड़ा और सूर्यांश पाठक अपने परिवारों की सैन्य विरासत को आगे बढ़ाते हुए सेना ...और पढ़ें

HighLights
प्रणय छाबड़ा चार पीढ़ियों की गौरवशाली सैन्य विरासत को आगे बढ़ाएंगे
सूर्यांश पाठक के दादा, पिता, नाना भी रहे हैं सैन्य अधिकारी
आईएमए पासिंग आउट परेड में भारतीय सेना में अधिकारी बनेंगे दोनों
जागरण संवाददाता, देहरादून। आईएमए की पासिंग आउट परेड में शनिवार को सैकड़ों युवा भारतीय सेना में अधिकारी बने गए, लेकिन उनमें कुछ चेहरे ऐसे भी रह, जिनके लिए वर्दी केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक विरासत का विस्तार है।
आफिसर कैडेट प्रणय छाबड़ा व सूर्यांश पाठक ऐसे ही दो युवा हैं, जो अपने परिवारों की सैन्य परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने जा रहे हैं।
प्रणय छाबड़ा के परिवार की सैन्य विरासत चार पीढ़ियों तक फैली हुई है। उनके परदादा कैप्टन गोपालदास ब्रिटिश भारतीय सेना की मेडिकल कोर में चिकित्सक थे और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मिस्र में तैनात रहे।
चौथी पीढ़ी बनकर सेना में कदम
दादा लेफ्टिनेंट कर्नल अर्जुन देव छाबड़ा ने भारतीय सेना की आर्डनेंस कोर में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। चाचा लेफ्टिनेंट कर्नल नवीन छाबड़ा (सेनि.) आर्टिलरी में सेवाएं दे चुके हैं, जबकि पिता मेजर जनरल प्रवीण छाबड़ा वर्तमान में सेना में वरिष्ठ दायित्व निभा रहे हैं। अब प्रणय इस गौरवशाली परंपरा की चौथी पीढ़ी बनकर सेना में कदम रख रहे हैं।
सूर्यांश पाठक की कहानी भी कम प्रेरक नहीं है। उनके दादा आर्मी सर्विस कोर में रहे, जबकि पिता 11 मद्रास रेजीमेंट में अधिकारी रहे हैं और 36 वर्षों तक सेना की सेवा कर चुके हैं।
राष्ट्रीय राइफल्स में आतंकवाद-रोधी अभियानों के दौरान उत्कृष्ट नेतृत्व के लिए उन्हें सेना मेडल (गैलेंट्री) और बाद में विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। सूर्यांश के नाना ने गोरखा राइफल्स में तीन दशक से अधिक सेवा दी और 1971 के भारत-पाक युद्ध में वीरता के लिए वीर चक्र प्राप्त किया था।
कर्मों व क्षमता से बनती है पहचान
दोनों युवा मानते हैं कि सैन्य विरासत प्रेरणा जरूर देती है, लेकिन वर्दी पहनने के बाद पहचान अपने कर्मों व नेतृत्व क्षमता से बनानी पड़ती है।
शनिवार को जब उन्होंने आईएमए के ड्रिल स्क्वायर पर ‘अंतिम पग’ भरा, तब केवल अपने परिवारों की परंपरा को आगे नहीं बढ़ाया, बल्कि भारतीय सेना के भविष्य की नई जिम्मेदारियां भी संभालीं। उनकी कहानी बताती है कि राष्ट्रसेवा की भावना विरासत में मिल सकती है, लेकिन उसे सम्मान दिलाने का काम हर पीढ़ी को स्वयं करना पड़ता है।
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