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    धर्म समाज में वैषम्य कम करने का नाम... द्वंद्व का नहीं, स्वामी मिथिलेशनंदिनी शरण का जागरण संवादी में संदेश

    Updated: Sat, 13 Jun 2026 07:10 PM (IST)

    स्वामी मिथिलेशनंदिनी शरण ने जागरण संवादी में धर्म को समाज में वैषम्य कम करने का माध्यम बताया, न कि द्वंद्व पैदा करने का। ...और पढ़ें

    देहरादून के मसूरी रोड स्थित होटल फैयरफिल्ड बाय मेरिएट में आयोजित जागरण संवादी कार्यक्रम में 'उत्तिष्ठ भारत : समाज का धर्म' विषय पर विचार रखते हुए स्वामी मिथिलेशनंदिनी शरण। साथ में  दैनिक जागरण के कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी।

    देहरादून के मसूरी रोड स्थित होटल फैयरफिल्ड बाय मेरिएट में आयोजित जागरण संवादी कार्यक्रम में 'उत्तिष्ठ भारत : समाज का धर्म' विषय पर विचार रखते हुए स्वामी मिथिलेशनंदिनी शरण। साथ में  दैनिक जागरण के कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी।

    HighLights

    1. धर्म समाज में द्वंद्व नहीं, वैषम्य कम करने का माध्यम

    2. मनुष्यता क्रोध, घृणा जैसे भावों के प्रबंधन में निहित

    3. युवाओं को वैचारिक अनुसंधान और स्वतंत्र चिंतन विकसित करना चाहिए

    गणेश जोशी, देहरादून। धर्म को लेकर बढ़ती वैचारिक संकीर्णता और संवादहीनता के दौर में समाज को आत्मबोध, सहअस्तित्व और वैचारिक उदारता का संदेश देते हुए स्वामी मिथिलेशनंदिनी शरण ने कहा कि धर्म समाज में द्वंद्व पैदा करने का नहीं, बल्कि वैषम्य कम करने का माध्यम है।

    उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो व्यक्ति धर्म के कारण समाज में द्वंद्व की स्थिति की बात करता है, उसकी जगह समाज में नहीं, बल्कि मानसिक सुधार केंद्र में होनी चाहिए।

    धर्म, समाज, संवाद, राजसत्ता और मनुष्यता के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य के भीतर क्रोध, घृणा, राग और वासना जैसे भाव उसके निर्माण के स्वाभाविक घटक हैं, लेकिन इन्हें प्रबंधित करना ही मनुष्यता है।

    शनिवार को मसूरी रोड स्थित होटल फैयरफिल्ड बाय मेरिएट में आयोजित जागरण संवादी कार्यक्रम में 'उत्तिष्ठ भारत : समाज का धर्म' विषय पर विचार रखते हुए स्वामी मिथिलेशनंदिनी शरण ने कहा कि धर्म वह तत्व है जो समस्त सृष्टि को धारण करता है।

    कण से लेकर हिमालय तक जो कुछ भी अस्तित्व में है, उसका आधार धर्म ही है। मनुष्य का धर्म उसकी मनुष्यता है और उसी के अनुरूप उसका महत्व निर्धारित है। मनुष्य की ही योग्यता यह है कि वह ज्ञान संपदा होने के कारण अपने स्वभाव को नियंत्रित व प्रबंधित कर सकता है। यही कारण है कि वह पशु से भिन्न है।

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    स्वामी ने युवाओं से वैचारिक अनुसंधान और स्वतंत्र चिंतन की क्षमता विकसित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति अपनी बुद्धि और चेतना से सत्य की खोज करेगा तो उसे केवल वस्तु ही नहीं, उसका बोध भी प्राप्त होगा। दूसरों के बताए मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति जीवनभर मिलावट और धोखे की पहचान नहीं कर पाता है।

    संस्कृत ग्रंथों की गलत व्याख्या पर भी उन्होंने तंज कसा और इसे बौद्धिक अत्याचार की संज्ञा दी। समाज की परिभाषा समझाते हुए उन्होंने कहा कि जैसे अनेक वाद्य यंत्र मिलकर एक ही राग और लय का सृजन करते हैं और श्रोता को मुग्ध कर देते हैं, उसी प्रकार विविधताओं के बीच अस्तित्व स्थापित होना ही समाज है। धर्म इसी अस्तित्व का आधार है।

    भगवान विष्णु के अवतार महाराज पृथु के उद्वरण के जरिये उन्होंने राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि बताते हुए कहा कि राजा वहीं हो सकता है जो धर्म की प्रतिज्ञाओं के भीतर जीने के लिए प्रतिबद्ध हो।

    जिसे राजसत्ता कहते हैं, वही धर्मसत्ता है

    कार्यक्रम की शुरुआत में दैनिक जागरण के कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ने स्वामी का परिचय देते हुए कहा कि वे देशभर में भ्रमण कर युवाओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

    उन्होंने धर्मसत्ता और राजसत्ता के संबंध को लेकर जिज्ञासा भी व्यक्त की। इस पर स्वामी ने कहा कि सत्ता का अर्थ किसी भाव या तत्व का बने रहना है।

    गीता के संदर्भ से उन्होंने कहा कि असत्य की सत्ता कभी नहीं होती और सत्य का कभी अभाव नहीं होता। जब समाज में सत्य का प्रभाव बढ़ता है तो उसे सतयुग कहा जाता है और जब सत्य होते हुए भी ओझल हो जाता है तो वह कलियुग कहलाता है। जिसे राजसत्ता कहते हैं, वह धर्मसत्ता ही है।

    क्योंकि धर्म से पृथक कोई राज नहीं होता है। राज शब्द दीप्ति व चमक के अर्थ में प्रयोग होता है और जहां चमक हो और जहां वस्तुओं का होना यथावत परिभाषित होता है, वह राज है।

    संवाद धर्म से प्रेरित होकर सत्य के तत्व को सुनिश्चित करने का माध्यम

    संवाद की व्याख्या करते हुए स्वामी मिथिलेशनंदिनी शरण ने कहा कि जब दो व्यक्ति बिना द्वेष, बिना जीत-हार की भावना और केवल सत्य की खोज के उद्देश्य से किसी भ्रांति को दूर करने के लिए चर्चा करते हैं, तभी वास्तविक संवाद होता है। श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि संवाद धर्म से प्रेरित होकर सत्य के तत्व को सुनिश्चित करने का माध्यम है।

    उन्होंने कहा कि अपने मत और विश्वास को स्वीकार करते हुए दूसरे विचारों का सम्मान करने की क्षमता ही संवाद है। संवादहीन समाज धीरे-धीरे यह योग्यता खो देता है और फिर अपने से भिन्न विचार रखने वालों को प्रतिद्वंद्वी मानकर उन्हें समाप्त करने की मानसिकता विकसित कर लेता है।

    दैनिक जागरण के हिंदी हैं हम को लेकर भी स्वामी ने कहा कि हिंदी भाव, भूगोल, विश्वास और भद्रता है। क्योंकि हिंदी को किसी एक पट्टी या क्षेत्र में सीमित नहीं कर सकते हैं।

    उन्होंने हिंदी के लोगों को अपनी भद्रता पर और काम किए जाने के लिए प्रेरित भी किया।साथ ही दैनिक जागरण के इस अनूठे आयोजन संवादी की सराहना भी की।

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