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पहाड़ में बदलती तस्वीर: होमस्टे बने रोजगार का नया आधार, 'देवभूमि' में लौट रही रौनक

Published: Tue, 22 Sep 2026 02:16 PM (IST)

उत्तराखंड में होमस्टे संस्कृति ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही है और पलायन रोकने में सहायक सिद्ध हो रही है। ...और पढ़ें

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HighLights

  1. उत्तराखंड में 5000 से अधिक होमस्टे सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं।

  2. 6500 से अधिक प्रवासी युवा गांव लौटकर स्वरोजगार अपना रहे हैं।

  3. सरकार की योजनाएं होमस्टे संचालकों को आर्थिक सहायता प्रदान कर रही हैं।

डिजिटल टीम, देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड के दूर-दराज और खूबसूरत पहाड़ी गांवों में शुरू हुई होमस्टे संस्कृति आज राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए वरदान साबित हो रही है। कभी पलायन के दंश से वीरान हो रहे गांव अब पर्यटकों की चहल-पहल से गुलजार हैं। राज्य सरकार की नीतियों और स्थानीय युवाओं की मेहनत के बल पर आज प्रदेश में 5000 से अधिक पंजीकृत होमस्टे संचालित हो रहे हैं। इस पहल ने न केवल पर्यटन को नई दिशा दी है, बल्कि 6,500 से अधिक प्रवासी युवाओं को वापस अपने गांव लौटकर स्वरोजगार अपनाने की प्रेरणा भी दी है।

उत्तराखंड में होमस्टे की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए सीएम पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि उत्तराखंड के ग्रामीण अंचलों में होमस्टे स्वरोजगार का एक मजबूत और सशक्त माध्यम बन चुके हैं। हमारी सरकार का संकल्प है कि पहाड़ के युवाओं को उनके घर और गांव में ही सम्मानजनक आजीविका के साधन मिलें, ताकि पलायन पर प्रभावी अंकुश लग सके। 5,000 से अधिक होमस्टे का सफल संचालन और 6,500 से अधिक प्रवासियों की अपने गांव वापसी इस बात का प्रमाण है कि हमारी नीतियां धरातल पर रंग ला रही हैं। हम गांव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और उत्तराखंड को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान दिलाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

होमस्टे योजना के तहत मिल रही सरकारी सुविधाएं

उत्तराखंड सरकार द्वारा 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय गृह आवास (होमस्टे) विकास योजना' के अंतर्गत ग्रामीणों और युवाओं को कई तरह की आर्थिक व ढांचागत सुविधाएं दी जा रही हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में नया होमस्टे बनाने या पुराने घर के नवीनीकरण के लिए लागत का 33% से 50% तक (अधिकतम ₹1.5 लाख से ₹10 लाख तक) कैपिटल सब्सिडी दी जा रही है। पहले कुछ वर्षों के लिए बैंक लोन के ब्याज पर भी 50% तक की छूट दी जा रही है। होमस्टे संचालकों पर व्यावसायिक कर का बोझ न पड़े, इसके लिए बिजली और पानी के बिल घरेलू दरों पर ही लिए जाते हैं। इसके अलावा, शुरुआती वर्षों में SGST की प्रतिपूर्ति भी की जाती है।
 
पर्यटन विभाग द्वारा होमस्टे स्वामियों को आतिथ्य, स्वच्छता, खाना बनाने और विदेशी पर्यटकों से संवाद के लिए भाषा का मुफ्त प्रशिक्षण दिया जाता है। राज्य पर्यटन विकास परिषद के आधिकारिक पोर्टल के जरिए होमस्टे की ऑनलाइन लिस्टिंग और वैश्विक स्तर पर मुफ्त प्रचार की सुविधा मिलती है। 

 
पलायन कर दिल्ली-एनसीआर में छोटी-मोटी नौकरी करने वाले कई युवा अब अपने गांव लौटकर होमस्टे चला रहे हैं और महीने के लाखों रुपये कमा रहे हैं। पौड़ी गढ़वाल के खिर्सू गांव में होमस्टे चलाने वाले रमेश उनियाल ने कहा कि मैं 8 साल तक दिल्ली में नौकरी कर रहा था, जहां बचत के नाम पर कुछ नहीं बचता था। सरकार की सब्सिडी योजना के बारे में पता चला तो मैंने गांव के अपने पुराने पैतृक मकान को सजा-संवारकर होमस्टे में बदल दिया। आज मेरे पास देश-विदेश से पर्यटक आते हैं। मैं न केवल खुद अच्छा कमा रहा हूं, बल्कि गांव के दो अन्य युवाओं को भी काम दिया है। अपने घर पर रहकर काम करने का सुकून अलग ही होता है।
 
उत्तरकाशी की सुनीता देवी ने कहा कि होमस्टे से महिलाओं को सबसे बड़ा सहारा मिला है। हम पर्यटकों को स्थानीय पहाड़ी व्यंजन जैसे गहत की दाल, मंडुवे की रोटी और झंगोरे की खीर खिलाते हैं। पर्यटकों को हमारा यह पारंपरिक खाना और अपनत्व बहुत पसंद आता है।
 
उत्तराखंड के इन होमस्टे में ठहरने वाले पर्यटक यहां के शांत वातावरण और स्थानीय संस्कृति के मुरीद हो रहे हैं। मुंबई से पिथौरागढ़ घूमने आईं नेहा शर्मा ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि हम अमूमन बड़े होटलों में ठहरते हैं, लेकिन इस बार हमने गांव के एक होमस्टे में रुकने का फैसला किया। यहां की सुबह पक्षियों की चहचहाहट और हिमालय की पहाड़ियों के दृश्य के साथ होती है। मकान मालिक के परिवार ने हमें अपने परिवार के सदस्य की तरह रखा। चूल्हे पर बना ताजा खाना और स्थानीय कहानियां सुनना एक ऐसा अहसास है, जो किसी भी महंगे सितारा होटल में नहीं मिल सकता।
 
होमस्टे योजना ने उत्तराखंड में पर्यटन की अवधारणा को 'होटल' से हटाकर प्राकृतिक परिवेश की ओर मोड़ा है। यह पहल न केवल रिवर्स पलायन को बढ़ावा दे रही है, बल्कि उत्तराखंड की लोक-संस्कृति, हस्तशिल्प और पारंपरिक खान-पान का संरक्षण भी कर रही है। सरकार के निरंतर सहयोग और स्थानीय लोगों के प्रयास से उत्तराखंड के गांव आज आत्मनिर्भरता और समृद्धि की नई कहानी लिख रहे हैं।