उत्तराखंड में गहराता मानव-वन्यजीव संघर्ष: 14 सालों में गुलदार और बाघों ने 63 हजार मवेशियों को बनाया शिकार
उत्तराखंड में गहराता मानव-वन्यजीव संघर्ष ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रहा है, जिससे पशुधन और फसलों को भारी नुकसान हो रहा है। ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।

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केदार दत्त, देहरादून। विषम भूगोल और 71.05 प्रतिशत वन भूभाग वाले उत्तराखंड में गहराता मानव-वन्यजीव संघर्ष अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी भारी पड़ने लगा है। वन विभाग के अध्ययन में यह तस्वीर सामने आई है।
राज्य में वर्ष 2011 से 2025 तक के कालखंड में गुलदार, बाघ जैसे वन्यजीवों ने 63,478 मवेशियों को अपना शिकार बनाया। यानी, हर साल औसतन 4534 पशुधन ग्रामीणों के हाथ से छिन रहे हैं।
अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2021 के बाद से तो स्थिति और भी गंभीर हुई है। यही नहीं, फसल क्षति की भी सालाना औसतन 1356 घटनाएं हो रही हैं। इस परिदृश्य में पशुधन और फसल सुरक्षा एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरकर आए हैं।
प्रदेशभर में आए दिन वन्यजीवों के हमलों की घटनाएं सुर्खियां बनती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के प्रमुख साधन पशुपालन पर भी वन्यजीवों का पहरा है। वन विभाग की अध्ययन रिपोर्ट को देखें तो वर्ष 2011-12 में वन्यजीवों से पशुधन हानि के 2319 मामले आए थे, तब से यह प्रतिवर्ष बढ़ रहे हैं।
2021 से तो स्थिति यह हो चली है कि वन्यजीवों के हमले में प्रतिवर्ष पांच से साढ़े छह हजार मवेशी मारे जा रहे हैं। पशुधन पर पड़ रही इस चोट से लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है।
किसानों की मेहनत पर भी फेर रहे पानी
खेतों में खड़ी फसलें भी वन्यजीवों के निशाने पर हैं। अप्रैल 2011 से मार्च 2025 तक की अवधि में वन्यजीवों से फसल क्षति की 18994 घटनाएं हुईं। जंगली सूअर, बंदर, लंगूर, वनरोज, हाथी जैसे जानवर खेतों में धमक कर फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसे में किसानों की आय प्रभावित होने के साथ ही वे खेती से विमुख हो रहे हैं।
आधुनिक तकनीकी अपनाने की जरूरत
जानकारों का मानना है कि जंगलों के सिकुड़ते दायरे, वन्यजीवों के वासस्थलों में बढ़ते दबाव के कारण यह संघर्ष बढ़ रहा है।
इसे थामने को वन सीमा पर मजबूत बाड़, सौर ऊर्जा आधारित सुरक्षा उपाय, मुआवजा राशि का तत्काल भुगतान और वन्यजीवों की निगरानी को आधुनिक तकनीकी अपनाने की दिशा में काम करने की जरूरत है। अपर प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव विवेक पांडेय के अनुसार मानव-वन्यजीव संघर्ष थामने के लिए विभिन्न योजनाओं पर काम किया जा रहा है।
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